धर्म-अध्यात्म

रामचरितमानस : श्रीराम नाम का जप-तप

डॉ. नीरज भारद्वाज

भगवान श्रीराम का चरित्र हम सभी को नवविचार, नवऊर्जा और संचार से भर देता है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस का जितनी बार भी पाठ होता है, उसकी गहराई अधिक होती चली जाती है। विचार करें तो स्वयं को जानने का केवल एक ही माध्यम है और वह रामचरितमानस है। मानस में भगवान श्रीराम के चरित्र जीवन की कथा और उसका भाव अंतर्मन को निर्मल, पावन, पवित्र कर देता है। भगवान श्रीराम के नाम को लेकर गोस्वामी तुलसीदास ने कितने ही पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग कर दिया है। साहित्य की दृष्टि से देखे समझे तो हर नाम के पीछे एक कथा है। गोस्वामी जी ने लिखा भी है,राम जन्म के हेतु अनेकापरम बिचित्र एक तें एका।। अर्थात भगवान श्रीराम जन्म के पृथ्वी पर प्रकट होने के बहुत सारे कार्य, कारण, सिद्धियाँ आदि हैं।

कई बार मन-मस्तिष्क में यह प्रश्न भी उठता है कि श्रीरामचरितमानस का विश्व भर की भाषाओं में अनुवाद हुआ है। विचार करें मानस में गोस्वामी जी ने भगवान श्रीराम के नाम को लेकर कितने ही पर्याय शब्दों प्रयोग किया है। क्या अनुवाद करते समय वह न्यायसंगत हो पाया होगा? भगवान श्रीराम को रघुराई, रघुपति, रघुनाथ, ब्रह्म, दीनदयाल, कृपा निधि, कृपा सिंधु, करुणा निधान आदि कितने ही शब्दों का प्रयोग किया गया है। जहां गोस्वामी जी को जितना सुंदर भाव लगा, वहां वही शब्द प्रयोग कर दिया। हमारे संत, महात्मा, साधु, ज्ञानी आदि इनकी जितनी भी व्याख्या करते हैं उतनी ही कम लगती है। भगवान श्रीराम के नाम का जप और कीर्तन अलग-अलग भक्ति भाव के साथ होता रहता है। श्रीराम नाम का गुणगान जितना किया जाए उतना ही कम लगता है।

श्रीराम जब भी मन-मस्तिष्क में आते हैं, वह एक नया विषय और शब्द चेतना दे देते हैं। मन उन्हीं में रम जाता है। कलम स्वयं लिखने लगती है, भाव आस-पास तैरने लगते हैं। मन भक्ति रस में डूब जाता है, तन पुलकित हो जाता है। शब्द ब्रह्म बनकर कागज पर उतर आते हैं। आंखों का जल शब्दों को निहारता रहता है।भक्ति भाव अंतर्मन की गहराई में जाकर स्वच्छता का बीजांकुरित करता है। मन का मैल कटने लगता है। आप स्वयं में होते हुए भी स्वयं से दूर नजर आते हैं। व्यक्ति बैठा कहीं है और पहुंच कहीं और जाता है। मन की यात्रा प्रभु के चरणों में लग जाती है। श्रीराम नाम का जप, तप और कीर्तन  इहलोग और परलोक दोनों को पार कराने वाला है। श्रीराम को जिसने भी गाया, पढ़ा, सुना, लिखा आदि उन सभी ने प्रभु को कहीं ना कहीं पाया है। वह स्वयं राममय हो गए हैं,सियराम में सब जग जानी।हर स्थान पर प्रभु ही दिखाई देते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के स्वरूप, गुणों और लीलाओं के अनुसार सुंदर पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग किया है। रघुपति, रघुराई, रघुनाथ, रघुबरये शब्द केवल नाम नहीं हैं, बल्कि श्रीराम के विराट व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को दर्शाते हैं।”रघुपति चरण सरोज सहरुह। करि मुनि मुनिस मंजु मुकुट मनि सोह॥”कहने का भाव है कि रघुकुल के स्वामी श्रीराम के चरण कमल भक्तों के हृदय में खिलने वाले हैं। बालकांड में गोस्वामी जी लिखते हैं कि, “गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्पकाल विद्या सब आई”। इसका अर्थ है कि श्रीराम ने गुरु के आश्रम में रहकर बहुत ही कम समय में संपूर्ण विद्या प्राप्त कर ली,जो एकाग्रता और विनम्रता का प्रतीक है।बालकाण्ड में गोस्वामी जी लिखते हैं कि,”सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा”।सुंदरकाण्ड में लिखते हैं कि “यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा“।उत्तरकाण्ड में “एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरवासी सब आए”। अयोध्याकाण्ड में रघुबर शब्द भी मिलता है, “बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि”।

भगवान श्रीराम को रामचरितमानस में पग-पग पर ‘कृपा सिंधु’ (कृपा के सागर) और ‘कृपा निधि’ (कृपा के भंडार) जैसे विशेषणों से पुकारा गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इन शब्दों के माध्यम से उनके दयालु स्वभाव को दिखाया, बताया, समझाया है।कृपा सिंधु (कृपा के सागर)जैसे सागर की कोई सीमा नहीं होती, वैसे ही प्रभु श्रीराम की कृपा भी अगाध और अनंत है।जब भगवान श्रीराम वनवास के समय निषादराज गुह से मिलते हैं या भक्तों पर दया करते हैं, तब इस शब्द का प्रयोग मिलता है।बालकांड में गोस्वामी जी लिखते हैं कि”बिहसि रामु तब कहि मृदु बानी। अनुजहि समुझावहु बरज्ञानी॥अस कहि कृपा सिंधु रघुराई गयउ जहाँ मुनि बसत सुहाई॥”एक उदाहरण और लिया जा सकता है- गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥

कृपा निधि (कृपा के भंडार)यह शब्द प्रार्थना और विनय के प्रसंगों में आता है।कृपानिधि का अर्थ होता है ‘खजाना’। श्रीराम जी कृपा के ऐसे खजाने हैं, जो कभी खाली नहीं होता। श्रीराम नाम का जप हमेशा बढ़ता रहता है। सुंदरकांड में गोस्वामी जी लिखते हैं कि,”सुनि प्रभु बचन हरषि हनुमाना। अंतर्यामी प्रभु सब जाना॥तब बोलेउ करि जोरि पनारी। सुनहु देव सचराचर धारी॥प्रभु अचरज कछु नाहिं बिसेषी। मो पर कृपा निधि कीन्ही देखी॥”मानस के उत्तरकांड में काकभुशुण्डि जी भी प्रभु को इन नामों से पुकारते हैं,”सुनु खगपति अस समुझि प्रसंसा। करहिं सदा मुनि मनस उतंशा॥अस मानस जेहि बिनु अवगाहे। नहिं छूटहिं भव जाल बिगाहे॥एहि बिधि राम कृपा निधि गाई। कहि निज कथा रामु मन लाई॥”

करुना निधान (करुणा के घर या भंडार) शब्द का प्रयोग गोस्वामी तुलसीदास जी ने प्रभु श्रीराम की असीम दयालुता को दर्शाने के लिए कई स्थानों पर किया है।‘‘कहा करुना निधान रघुराई। भरत सुभाउ को कहै बनाई॥”सुंदरकांड में गोस्वामी जी लिखते हैं- “राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥”

दीनदयाल शब्द का भी प्रयोग किया है। भगवान के जन्म के समय गोस्वामी जी की चौपाई प्रासंगिक है।”भय प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥” इस दृष्टि से भगवान श्रीराम के अनेक नामों और विशेषणों का प्रयोग हमें श्रीरामचरितमानस में दिखाई दे जाता है। हमें उसकी गहराई में उतरने की जरूरत है।