धर्म और समाज में तालमेल जरूरी

विमल कुमार सिंह

पूर्ण मानव समाज, चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में रहता हो, किसी न किसी धार्मिक विश्वास या मान्यता से अवश्य जुड़ा रहा है। यद्यपि कुछ लोग ऐसे भी रहे हैं जो धार्मिक विश्वास के सभी रूपों को नकारने में लगे रहे, परंतु इतिहास के पन्ने पलटने पर हमें ज्ञात होता है कि ऐसे लोग कभी भी एक संगठित जनसमुदाय के रूप में लंबे समय तक अपना अस्तित्व बना कर नहीं रख सके।अपने सहस्रों वर्ष के लंबे कालक्रम में भारतभूमि ने धार्मिक कर्मकांडों एवं परंपराओं की एक लंबी शृंखला देखी है। यहां के लोगों को वैदिक दर्षन के साथ-साथ समय-समय पर विभिन्न पंथों और संप्रदायों का भी मार्गदर्शन मिलता रहा है। मूल भावना में एकरूपता होने के बावजूद भारत में धर्म के बाह्य स्वरूप को लेकर कभी भी ठहराव की स्थिति नहीं रही। विभिन्न पंथों एवं संप्रदायों ने अपने धार्मिक विष्वास को प्रकट करने के विविध रूप अपनाए। उन्होंने तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं को देखते हुए धार्मिक कर्मकांडों एवं मान्यताओं की स्थापना की। समाज में बदलाव के साथ ही धार्मिक कर्मकांड एवं मान्यताओं का रूप भी बदलता रहा। स्वस्थ समाज संचालन के लिए आवश्यक नियमों को धार्मिक मान्यताओं एवं कर्मकांडों का रूप देने और समय-समय पर उनमें आवष्यकतानुसार परिवर्तन करने की अद्भुत क्षमता के कारण ही भारत की संस्कृति जीवित और गतिशील बनी रही।

तथापि, भारत की यह अद्भुत क्षमता हजार वर्षों की गुलामी, विशेष रूप से पिछले दो सौ वर्षो से पाश्चात्य संस्कृति के निरंतर बढ़ रहे दुष्प्रभावों के कारण षिथिल पड़ गई है। वर्तमान सामाजिक परिवेश से तालमेल न होने के कारण अधिकतर धार्मिक मान्यताएं एवं कर्मकांड रुढियों का रूप लेते जा रहे हैं। उदाहरण-स्वरूप तुलसी के विलक्षण औषधीय गुणों के कारण हमारे मनीषियों ने उसे पूजनीय बताया। आज प्राय: देखने में आता है कि घरों में तुलसी की पूजा तो होती है, परंतु उसके औषधीय गुणों से लाभ उठाने की इच्छाशक्ति का अभाव है। इसी प्रकार गाय की पूजा आज भी होती है, परंतु गोधन की वर्तमान दुर्दशा को लेकर लोगों में कोई विशेष चिंता नहीं है। हम यदि ध्यान से अपने चारों ओर देखें तो ऐसे कई उदाहरण दिख जाएंगे, जहां धार्मिक श्र)ा सामाजिक सरोकारों से दूर होकर धार्मिक अंधविश्वास और रूढ़ि का रूप धारण कर चुकी है।

समाज की वर्तमान स्थिति और धार्मिक मान्यताओं के बीच तालमेल की कमी निश्चय ही हमारी संस्कृति के लिए चिंता का विषय है। हमें अपनी धार्मिक मान्यताओं एवं परंपराओं के मूल में झांकना होगा। प्रतीकों के माध्यम से कही गई बातों के निहितार्थ समझने होंगे। धर्म अपने आप में सनातन है। उसका मूल तत्व आज भी वही है, जो हजारों वर्ष पहले था, इसलिए वह कभी अप्रासंगिक नहीं होता। परंतु धर्म के बाह्य स्वरूप – कर्मकांड, परंपराएं एवं उनसे जुड़ी मान्यताएं शाश्वत नहीं होतीं। आज आवष्यकता इस बात की है कि हम इनकी युगानुकूल व्याख्या करें और धार्मिक श्रद्धा को समाजोपयोगी दिशा प्रदान करें। समाज के एक प्रबुद्ध वर्ग ने इस चुनौती को समय रहते पहचान लिया है और उसने अपने स्तर पर इस दिशा में प्रयास भी प्रारंभ कर दिए हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करें और इस दिशा में एक संगठित प्रयास के लिए अवश्यक वातावरण का निर्माण करें।

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