आर्थिकी

संयम और स्वदेशी ही है भारत का सनातन आर्थिक मंत्र और यंत्र

पंकज जायसवाल  
ईरान अमेरिका इजराइल द्वारा शुरू किये गए युद्ध, होर्मुज स्ट्रेट में डबल नाकाबंदी और उससे उपजे वैश्विक मंदी और इकोनॉमिक्स के मेटा इफ़ेक्ट के कारण दुनिया के हालात संकट में हैं. इन संकटों के बीच भारत आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शूरू किये गए आर्थिक राष्ट्रवाद, आत्मनिर्भरता और जिम्मेदार उपभोग केवल नारे नहीं बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुके हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से सोना खरीदने में संयम बरतने, पेट्रोलियम उत्पादों के उपयोग को कम करने, स्वदेशी को बढ़ावा देने और अनावश्यक आयात पर निर्भरता घटाने की जो अपील की गई, वह केवल एक सामान्य आर्थिक सलाह नहीं है बल्कि एक कुटुंब प्रबोधन की तरह भारत की दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा, विदेशी मुद्रा संतुलन और आत्मनिर्भर विकास मॉडल का महत्वपूर्ण संकेत आवाहन था। हालांकि जनमानस में यह प्रश्न दौड़ रहा है कि होर्मुज की नाकाबंदी अगर मार्च में ही शूरू हुई थी तो इसका आवाहन इतना देर से क्यों और बीते २ माह में सरकार ने इससे लड़ने के लिए कौन सी नीतियां बनाई क्या तैयारियां कीं ? बंगाल और आसाम चुनाव की शोर में कहीं इस संकट की आहट सुनने में विलम्ब तो नहीं हुआ? फिर भी देर आये दुरुस्त आये की तर्ज पर हमें इस आवाहन को गंभीरता से लेना चाहिए।

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन इसके बावजूद हमारी कई बुनियादी जरूरतें अभी भी आयात पर आधारित हैं। विशेष रूप से कच्चा तेल, खाद्य तेल और सोना ये तीन ऐसे क्षेत्र हैं जो भारत के आयात बिल पर भारी दबाव डालते हैं। ऊर्जा के मामले में तो हम लगभग ८५ फीसदी दूसरों पर निर्भर है और इस समय ऊर्जा का ही सप्लाई चेन संकट में आ गया है. यदि देश को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है तो केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा; उपभोग की संस्कृति और आर्थिक व्यवहार में भी परिवर्तन लाना पड़ेगा।

जैसे भारत में सोना केवल धातु नहीं बल्कि परंपरा, सामाजिक प्रतिष्ठा और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। विवाह, त्योहार और पारिवारिक निवेश का बड़ा हिस्सा सोने में जाता है लेकिन आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है क्या अत्यधिक सोना खरीदना राष्ट्र की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी है? मेरे विचार से यदि सोना अर्थव्यवस्था में सक्रिय रूप से उपयोग नहीं हो रहा, उत्पादन या व्यापार में नहीं लग रहा, बैंकिंग प्रणाली में नहीं आ रहा और केवल लॉकरों में बंद पड़ा है तो वह एक प्रकार का “मृत निवेश” बन जाता है क्योंकि वह पूंजी अर्थव्यवस्था में गति नहीं पैदा करती। जब कोई व्यक्ति सोना खरीदता है, तो उसका बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से विदेशों से आता है। इसका अर्थ है कि देश की विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। दूसरी ओर यदि वही पैसा उद्योग, स्टार्टअप, शेयर बाजार, कृषि प्रसंस्करण, विनिर्माण या इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश हो, तो वह रोजगार पैदा करता है, उत्पादन बढ़ाता है और कर राजस्व भी उत्पन्न करता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अत्यधिक निष्क्रिय सोना भारतीय अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता को सीमित करता है। इसलिए सरकार द्वारा गोल्ड बॉन्ड, डिजिटल गोल्ड और गोल्ड मोनेटाइजेशन जैसी योजनाएँ लाने का उद्देश्य भी यही है कि सोना आर्थिक परिसंचरण में आए और जब संकट का समय हो तो आभूषण से ज्यादा यह चीज मायने रखती है कि हम सेविंग और उत्पादकीय निवेश बढ़ाएं, सोने का वह हिस्सा जो सिर्फ आभूषण के लिए है उसे कुछ दिनों तक टाला जा सकता है. हालांकि सोने के कारीगरों का क्या होगा, यह भी एक चिंता खड़ी है.

भारत अपने कुल पेट्रोलियम उपभोग का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ते ही भारत का आयात बिल बढ़ जाता है, रुपया दबाव में आता है और महंगाई भी बढ़ती है। पेट्रोल-डीजल केवल वाहन चलाने तक सीमित नहीं हैं; परिवहन महंगा होने से खाद्यान्न, निर्माण सामग्री और दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी महंगी हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री की यह अपील कि देशवासी पेट्रोलियम उत्पादों का विवेकपूर्ण उपयोग करें, अत्यंत व्यावहारिक और दूरदर्शी है। यह केवल ईंधन बचाने का प्रश्न नहीं बल्कि आर्थिक संप्रभुता का विषय भी है।

यदि प्रत्येक परिवार छोटी-छोटी आदतें बदल दे जैसे अनावश्यक वाहन उपयोग कम करना, सार्वजनिक परिवहन अपनाना, कार पूल करना, इलेक्ट्रिक वाहन की ओर बढ़ना, स्थानीय वस्तुओं का उपयोग करना तो इसका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। मान लीजिए देश के करोड़ों परिवार यदि प्रतिदिन थोड़ी मात्रा में ईंधन बचाएँ, तो सालाना अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है। यही धन देश के इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य और रक्षा क्षेत्र में लगाया जा सकता है।

भारत में लंबे समय तक उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा विदेशी ब्रांडों और आयातित वस्तुओं की ओर झुकता गया लेकिन अब विश्व व्यवस्था बदल रही है। अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष, वैश्विक सप्लाई चेन संकट और महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी देश के लिए अत्यधिक आयात निर्भरता खतरनाक हो सकती है। ऐसे समय में “स्वदेशी” का अर्थ केवल भावनात्मक राष्ट्रवाद नहीं बल्कि रणनीतिक आर्थिक सुरक्षा होनी चाहिए।

जब हम स्थानीय उत्पाद खरीदते हैं, तो केवल वस्तु नहीं खरीदते; हम किसी भारतीय किसान, छोटे उद्योग, मजदूर, ट्रांसपोर्टर और व्यापारी की आय को मजबूत करते हैं। स्थानीय उत्पादन बढ़ने से रोजगार बढ़ता है और आर्थिक शक्ति देश के भीतर घूमती रहती है। यदि भारतीय उपभोक्ता स्वदेशी वस्तुओं को प्राथमिकता देंगे, तभी भारतीय उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत हो पाएँगे।

वैसे भी भारतीय सभ्यता का मूल दर्शन अनियंत्रित उपभोग नहीं बल्कि संतुलित जीवन रहा है। पश्चिमी मॉडल में अत्यधिक उपभोग को आर्थिक विकास का आधार माना गया, लेकिन भारतीय चिंतन हमेशा “जरूरत आधारित जीवन” पर बल देता रहा। आज पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की सीमाएँ यह सिद्ध कर रही हैं कि असीमित उपभोग का मॉडल टिकाऊ नहीं है। यदि भारत अपनी पारंपरिक मितव्ययिता और आधुनिक आर्थिक रणनीति को जोड़ दे, तो वह दुनिया को एक वैकल्पिक विकास मॉडल दे सकता है ऐसा मॉडल जिसमें विकास हो लेकिन संसाधनों का संतुलित उपयोग भी हो।

कोरोना काल में भी हमने देखा कि अनावश्यक खर्च कम होने पर परिवारों की बचत बढ़ी। लोगों ने स्थानीय वस्तुओं, घर के भोजन और सीमित उपभोग की ओर वापसी की। इससे यह स्पष्ट हुआ कि आर्थिक अनुशासन केवल सरकार की नीतियों से नहीं बल्कि नागरिकों की जीवनशैली से भी आता है।

इस हालात में जनता के साथ-साथ सरकार को भी कुछ बड़े कदम उठाने होंगे।

इलेक्ट्रिक वाहनों और सार्वजनिक परिवहन को और सस्ता व सुलभ बनाना, एथेनॉल मिश्रण और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना, खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के लिए तिलहन उत्पादन बढ़ाना, सोने को वित्तीय परिसंपत्ति के रूप में अर्थव्यवस्था में लाने हेतु आकर्षक योजनाएँ बनाना, छोटे उद्योगों और स्थानीय विनिर्माण को कर व वित्तीय सहायता देना, “लोकल फॉर वोकल” को केवल अभियान नहीं बल्कि बाजार संरचना का हिस्सा बनाना, सरकारी आयोजनों और कार्यक्रमों में एक जिला, एक खाद्य पदार्थों और एक जिला, एक उत्पादों वाले आइटम का ही उपयोग करना।

संकटकाल में नागरिकों की भूमिका भी सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है. किसी भी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति केवल सरकार से नहीं बनती। जनता की आदतें और आर्थिक व्यवहार भी राष्ट्र निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यदि नागरिक यह सोचकर खरीदारी करें कि उनका खर्च देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव डालेगा, तो भारत की आर्थिक दिशा बदल सकती है। हर व्यक्ति यदि थोड़ा कम आयातित उपभोग करे, थोड़ा कम ईंधन खर्च करे, थोड़ा अधिक बचत को उत्पादक निवेश में लगाए और थोड़ा अधिक स्वदेशी अपनाए तो इसका सामूहिक परिणाम बहुत बड़ा होगा।

प्रधानमंत्री की अपील को केवल एक राजनीतिक बयान के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह भारत के लिए एक नए आर्थिक अनुशासन का आह्वान है। आने वाले समय में वही देश मजबूत होंगे जो उत्पादन, ऊर्जा, खाद्य और वित्तीय सुरक्षा में आत्मनिर्भर होंगे। भारत के पास विशाल बाजार, युवा शक्ति, कृषि क्षमता और उद्यमशीलता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि देश “उपभोग आधारित दिखावटी विकास” से आगे बढ़कर “उत्पादक और आत्मनिर्भर विकास” की ओर बढ़े।

सोना तिजोरी में बंद रहने के बजाय अर्थव्यवस्था में सक्रिय पूंजी बने, पेट्रोलियम का विवेकपूर्ण उपयोग हो, स्वदेशी उत्पादन और उपभोग को बढ़ावा मिले तथा नागरिक जिम्मेदार आर्थिक व्यवहार अपनाएँ यही विकसित भारत की वास्तविक नींव हो सकती है।

सनातन सत्य के रूप में त्याग, संयम और स्वदेशी ही भारत का सदियों से आर्थिक मंत्र और ऐसे संकटों से लड़ने का यंत्र रहा है। इस मौजूदा संकट में यही मंत्र और यंत्र का प्रयोग कर इस हालात से लड़कर जीत पाएंगे।