राजनीति

मतदाता सूची का पुनरीक्षण: सुधार जरूरी, लेकिन पारदर्शिता उससे भी जरूरी

सौरभ वार्ष्णेय
दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने एक बार फिर देश के चुनावी तंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस प्रक्रिया के दौरान पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, पूर्व दिल्ली उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और कई वरिष्ठ अधिकारियों समेत अनेक चर्चित लोगों को नोटिस दिए जाने की खबर सामने आई है। पहली नजर में यह खबर इसलिए चौंकाती है क्योंकि जब सार्वजनिक जीवन से जुड़े इतने प्रतिष्ठित लोगों के रिकॉर्ड में विसंगतियां मिल रही हैं, तो सामान्य नागरिकों के पुराने और वर्तमान मतदाता रिकॉर्ड की स्थिति को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि एसआईआर नोटिस मिलना मतदाता सूची से नाम हट जाने के बराबर नहीं है। चुनाव अधिकारियों के अनुसार नोटिस उन मामलों में दिए जा रहे हैं जहां वर्तमान मतदाता विवरण को 2002 की पिछली मतदाता सूची से जोड़ा नहीं जा सका या इनुर्मेशन फार्म में कुछ विसंगतियां पाई गईं। इसके बाद संबंधित मतदाता को दस्तावेजों के माध्यम से अपनी पात्रता और विवरण की पुष्टि करने का अवसर दिया जा रहा है।
यही अंतर इस पूरी प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। मतदाता सूची को साफ सुथरा, अद्यतन और त्रुटिरहित रखना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है। मृत व्यक्तियों, स्थान बदल चुके मतदाताओं, दोहरे नामों या गलत प्रविष्टियों को हटाना और पात्र नागरिकों के नाम सुनिश्चित करना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है। चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार स्ढ्ढक्र का उद्देश्य ही मतदाता सूची की शुद्धता और अखंडता बनाए रखना है।
दिल्ली के मामले में 2002 की मतदाता सूची को एक महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है। चुनाव आयोग ने नागरिकों से पुरानी सूची में अपना या अपने माता-पिता का नाम और संबंधित विवरण देखने को कहा था। जिन लोगों का नाम 2002 की दिल्ली सूची में नहीं है, लेकिन उनके माता-पिता का नाम है, उनके लिए भी अलग प्रक्रिया निर्धारित की गई है। दूसरे राज्यों से बाद में दिल्ली आकर बसे लोगों के लिए संबंधित राज्य की पिछली एसआईआर सूची के विवरण का प्रावधान रखा गया है।
समस्या यहां से शुरू होती है कि दो दशक से भी अधिक पुराने रिकॉर्ड को वर्तमान नागरिक की पहचान और पात्रता से जोडऩा अपने आप में आसान काम नहीं है। वर्ष 2002 से अब तक लाखों लोगों के पते बदले हैं, परिवारों की संरचना बदली है, नामों की वर्तनी बदली है और अनेक परिवार एक शहर से दूसरे शहर चले गए हैं। पुराने रिकॉर्ड में नाम की छोटी सी वर्तनी भिन्नता भी आज की डिजिटल मिलान प्रक्रिया में मिसमैच बन सकती है।
इसीलिए 33.13 लाख लोगों का आंकड़ा अपने आप में न तो यह सिद्ध करता है कि इतने लोग अपात्र हैं और न ही यह कि इतने लोगों के रिकॉर्ड गलत हैं। यह संख्या मुख्यत: उन लोगों की है जिनके मामलों में आगे सत्यापन की जरूरत महसूस की गई है। रिपोर्टों के अनुसार लगभग 97 लाख मतदाता ड्राफ्ट सूची में हैं और 33.13 लाख मतदाताओं को विसंगतियों के आधार पर नोटिस के लिए चिन्हित किया गया है।
यहां चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी पारदर्शिता की है। किसी नागरिक को नोटिस दिया जाता है तो उसे यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि समस्या क्या है ? नाम का अंतर है, उम्र संबंधी विसंगति है, पते का सवाल है, पुराने रिकॉर्ड से मैपिंग नहीं हुई है या किसी अन्य कारण से सत्यापन आवश्यक है। हाल में इस प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका पहुंची है, जिसमें नोटिस पाने वाले मतदाताओं के नाम और नोटिस के कारणों को सार्वजनिक करने की मांग की गई है। यह मांग बताती है कि इतने बड़े पैमाने की चुनावी प्रक्रिया में केवल प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है; नागरिकों को यह भी पता होना चाहिए कि उनके रिकॉर्ड पर सवाल क्यों उठा है।
चुनाव प्रक्रिया में नोटिस देना जांच का साधन होना चाहिए, सजा का नहीं।  किसी व्यक्ति के रिकॉर्ड में गलती मिलना और उसके मतदान के अधिकार पर अंतिम निर्णय लेना दो अलग-अलग चरण हैं। इसलिए प्रत्येक मतदाता को पर्याप्त समय, स्पष्ट सूचना, सुनवाई का अवसर और दस्तावेज प्रस्तुत करने की सरल व्यवस्था मिलनी चाहिए। इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जब प्रतिष्ठित और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के रिकॉर्ड भी सत्यापन के दायरे में आ रहे हैं, तो इससे एक सकारात्मक संदेश भी निकलता है कम से कम प्रक्रिया कागज पर किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। लेकिन यही बात आम नागरिक के लिए भी समान रूप से लागू होनी चाहिए। किसी मंत्री, पूर्व उपराष्ट्रपति, अधिकारी या आम मतदाता सभी के मामले में नियम एक जैसे होने चाहिए। चुनावी लोकतंत्र की विश्वसनीयता इसी समानता पर टिकी है।
साथ ही, यह भी जरूरी है कि प्रशासन पुराने रिकॉर्ड को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसे एक संदर्भ बिंदु माने। 2002 की सूची में नाम न मिलना अपने आप में किसी नागरिक की वर्तमान पात्रता का प्रमाण नहीं हो सकता। दिल्ली में पिछले दो दशकों में बड़े पैमाने पर जनसंख्या का आवागमन हुआ है। ऐसे में वर्तमान निवास, नागरिकता, उम्र और अन्य वैधानिक दस्तावेजों की जांच भी उचित प्रक्रिया का हिस्सा होनी चाहिए। इस पूरी कवायद से एक बड़ा सबक यह निकलता है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मतदाता सूची का रखरखाव केवल चुनाव के समय की प्रशासनिक गतिविधि नहीं हो सकता। मतदाता सूची लगातार अद्यतन होनी चाहिए और नागरिकों के लिए उसमें सुधार की प्रक्रिया सरल, सुलभ और पारदर्शी होनी चाहिए। तकनीक का इस्तेमाल जरूर हो, लेकिन तकनीकी “मिसमैच” को अंतिम निष्कर्ष नहीं बनाया जा सकता।
एसआईआर की सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि कितने नाम हटाए गए या कितने नोटिस जारी किए गए। उसकी असली कसौटी यह होगी कि कितने वास्तविक मतदाताओं के नाम सुरक्षित रहे, कितनी गलत प्रविष्टियां सुधरीं और कितने नागरिकों को बिना अनावश्यक परेशानी के अपनी पात्रता साबित करने का अवसर मिला। लोकतंत्र में मतदाता सूची महज नामों का सरकारी रजिस्टर नहीं है। यह नागरिक और राज्य के बीच उस अधिकार का दस्तावेज है जिसके आधार पर नागरिक शासन चुनता है। इसलिए सूची को शुद्ध करना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि यह काम ऐसी पारदर्शिता और सावधानी से हो जिससे किसी पात्र नागरिक का मताधिकार अनजाने में प्रभावित न हो।
दिल्ली का एसआईआर इसी संतुलन की परीक्षा है। साफ मतदाता सूची भी चाहिए और हर पात्र नागरिक का मतदान अधिकार भी सुरक्षित रहना चाहिए। दोनों में से किसी एक को कमजोर करके चुनावी व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती।