– पुरु शर्मा, समीक्षक युवा साहित्यकार हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा पूरी होने पर देशभर में संघ की विचारधारा, उसकी उपलब्धियों एवं योगदान को लेकर चर्चा है। ऐसे में ‘मीडिया विमर्श’ का विशेषांक ‘आरएसएस@100’ का आना महत्वपूर्ण है। मीडिया विमर्श का यह विशेषांक संघ से संबंधित सामयिक एवं चर्चित विषयों पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक एवं लेखक डॉ. लोकेन्द्र सिंह इसके अतिथि संपादक हैं। संघ विषयों पर वे निरंतर लिखते हैं। संघ पर केंद्रित उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें- संघ दर्शन : अपने मन की अनुभूति और राष्ट्रध्वज एवं आरएसएस भी उल्लेखनीय हैं। डॉ. सिंह के कुशल संपादन में तैयार मीडिया विमर्श का विशेषांक संघ की एक सदी की यात्रा को केवल एक संगठन के इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण की गाथा के रूप में प्रस्तुत करता है। यह विशेषांक उन सबके लिए उपयोगी है, जो संघ को जानना-समझना चाहते हैं। कहना होगा कि यह एक संदर्भ ग्रंथ की भाँति है।
‘मीडिया विमर्श’ के सलाहकार संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने संपादकीय लेख ‘दिल से समझिए आरएसएस को’ में बहुत ही स्पष्टता के साथ उन भ्रांतियों पर प्रहार किया है जो अक्सर बौद्धिक जगत में संघ के विरुद्ध प्रचारित की जाती हैं। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया है कि संघ अपनी कार्यपद्धति के कारण प्रचार से दूर रहता है, जिसके कारण उसकी वास्तविक छवि और सेवा कार्यों का पूरा सच अक्सर सामने नहीं आ पाता। इस विशेषांक की सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक फलक है, जिसमें देश के शीर्ष नेतृत्व से लेकर संघ के वरिष्ठ प्रचारकों के विचारों को सम्मिलित किया गया है। डॉ. लोकेन्द्र सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से लेकर संघ के वरिष्ठ प्रचारकों श्रीधर पराड़कर, निखिलेश माहेश्वरी, कैलाश चंद्र, सदानंद सप्रे और हितानंद शर्मा के विचारों को शामिल करके संघ के दृष्टिकोण को यथार्थ रूप में पाठकों के सामने लाने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा संघ को नजदीक से देखने और उससे जुड़े अन्य लेखकों के आलेख भी विशेषांक में हैं। संघ के वर्तमान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के वक्तव्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि संघ का उद्देश्य समाज में कोई अलग गुट बनाना नहीं, बल्कि पूरे समाज को ही संगठित और सामर्थ्यवान बनाना है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने आलेख में संघ को ‘अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार’ बताते हुए व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की इसकी अनूठी कार्यपद्धति की सराहना की है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने डॉ. हेडगेवार और बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों में निहित समानता को उजागर करते हुए संघ की सर्व-समावेशी समाज-दृष्टि का प्रमाण प्रस्तुत किया है। संपादक डॉ. लोकेन्द्र सिंह ने अपने लेख में संघ के सौ वर्षों को पांच चरणों में विभाजित कर यह समझाया गया है कि कैसे यह संगठन उपहास, उपेक्षा और विरोध के कठिन अवरोधों को पार करते हुए आज समाज की सज्जनशक्ति के साथ ‘एकरस’ होने की स्थिति में पहुँचा है।
विशेषांक के विभिन्न लेखों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि संघ के लिए ‘हिन्दू’ शब्द कोई उपासना पद्धति नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान है जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मर्म को आत्मसात करती है। शिक्षा, सेवा और समाज सुधार के क्षेत्र में संघ के योगदान पर भी इस अंक में विस्तार से चर्चा की गई है। डॉ. सदानन्द दामोदर सप्रे ने अपने लेख में बहुत ही तार्किक ढंग से उन भ्रांतियों का निवारण किया है जिनमें संघ को किसी विशेष जाति या वर्ग का संगठन माना जाता है। निखिलेश माहेश्वरी के लेख में विद्या भारती के माध्यम से मैकाले की शिक्षा पद्धति के विकल्प के रूप में भारतीय मूल्य-आधारित शिक्षा के सफल प्रयोग को दर्शाया गया है। ‘पंच परिवर्तन’ की संघ की संकल्पना के एक-एक संकल्प पर विस्तार से चर्चा यह विशेषांक करता है। विशेषांक के आखिर में ‘अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों’ को शामिल किया गया है, जो संघ को लेकर एक स्पष्ट सोच बनाते हैं। इसके साथ अन्य पठनीय पुस्तकों की सूची देकर उन पाठकों की सहायता की है, जो संघ के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं। कुल मिलाकर कहना होगा कि डॉ. लोकेन्द्र सिंह जैसे विद्वानों ने संघ, सत्ता और समाज के अंतर्संबंधों तथा शताब्दी वर्ष की चुनौतियों का सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत कर इस अंक को एक पूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज बना दिया है।
विशेषांक : आरएसएस@100
संपादक : डॉ. लोकेन्द्र सिंह
पृष्ठ : 264
प्रकाशक : मीडिया विमर्श