– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारतीय समाज में धर्म, परंपरा और संवैधानिक मूल्यों का संबंध अत्यंत गहन और बहुआयामी है। सबरीमाला मामला इसी जटिल संबंध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जहाँ एक ओर धार्मिक आस्था और परंपरा का प्रश्न है, तो दूसरी ओर समानता, गरिमा और अधिकारों की संवैधानिक व्याख्या सामने आ खड़ी हुई। यह विवाद भले ही महिलाओं के मंदिर प्रवेश को लेकर शुरू हुआ है किंतु यह अपने आप में कई व्यापक अर्थ रखता है, जिसमें भारतीय स्त्री-विमर्श, सांस्कृतिक चेतना और न्यायिक दृष्टिकोण के बीच संवाद सभी कुछ समाहित है।
इस संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा जो निर्णय सुनाया गया, उस निर्णय के बीच सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं, उनका कहना है कि क्या मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर रोक “अस्पृश्यता” की श्रेणी में आती है? न्यायमूर्ति नागरत्ना कहती है, “इस मामले में ‘अनुच्छेद 17’ यानी छुआछूत के खिलाफ अधिकार पर दलील किस तरह पेश की जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने तीन दिन तक तो महिला को ‘अछूत’ माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई ‘अछूतपन’ न रह जाए।”
न्यायमूर्ति नागरत्ना का यह कथन है कि “भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता” वास्तव में इस पूरे विमर्श का यही केंद्रीय बिंदु है। संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 समानता, भेदभाव-निषेध और अस्पृश्यता उन्मूलन की बात करते हैं, जबकि अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इस प्रकार, सबरीमाला प्रकरण इन संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन का प्रश्न बन जाता है।
इसी तरह से अन्य कुछ प्रश्न उठाने का कार्य यहां न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना दिखाई देती हैं, तब केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता ने यह तर्क दिया कि सबरीमाला की परंपरा को “अस्पृश्यता” कहना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है, क्योंकि अस्पृश्यता मूलतः जाति-आधारित सामाजिक कुरीति रही है। उन्होंने इसे भगवान अयप्पा की नैष्ठिक ब्रह्मचर्य पर आधारित धार्मिक परंपरा बताया, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। तब इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जिस रूप में सामने आया, वह है नारी का समग्रता से सम्मान।
अब प्रश्न यह है कि क्या भारतीय शास्त्रों में, ज्ञान परंपरा में, हिन्दू व्यवस्था में, सनातन धर्म में स्त्री का स्थान नीचा, ओछा या कमजोर है? इसका उत्तर सहज है कि बिल्कुल भी नहीं, बल्कि विश्व भर की प्राचीन सभ्यताओं में जो अद्यतन है, उनमें तुलनात्मक रूप से हिन्दू सनातन धर्म में स्त्री को अत्यधिक मान, बराबरी का हक दिया गया है । इस संबंध में देवी आराधना को देखा जा सकता है, जोकि भारत में सर्वत्र एक रूप में सर्वव्यापी है। यदि हम दुर्गा सप्तशती का अध्ययन करें, तो स्पष्ट होता है कि स्त्री ब्रह्मांड की मूल शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है। संपूर्ण दुर्गासप्तशती ही स्त्री महात्म, नारी समम्मान, श्रद्धा और उसके प्रति समर्पण से पूर्ण है।
“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” (दुर्गा सप्तशती, अध्याय 5), इस प्रकार के मंत्रों की पूरी श्रंखला है। विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:,स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्, का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्ति:॥ के माध्यम से कहा गया है कि “हे देवी! संसार की समस्त विद्याएं तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। इसी प्रकार, विश्व की समस्त स्त्रियां (सकला जगत्सु – संसार में) तुम्हारा ही रूप हैं। हे अंब (माता)! इस पूरे जगत को तुमने ही आच्छादित (पूरित) किया है। तुम्हारी स्तुति भला कौन कर सकता है? तुम तो स्तुति के योग्य शब्दों से भी परे हो।” कुल मिलाकर समस्त जगत में जो कुछ भी है, वह स्त्री-शक्ति से ही व्याप्त है। यही भारतीय दर्शन का मूल तत्व है जो हमें बताता है कि स्त्री ही सृष्टि की आधारभूत ऊर्जा है।
इसी भाव को देवी भागवत पुराण अभिव्यक्त करता है, “त्वमेव सृष्टि: त्वमेव पालनं, त्वमेव संहारकारिणी।” अर्थात सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार—तीनों स्त्री-शक्ति के अधीन हैं। (स्कंध 1, अध्याय 8) । वैदिक साहित्य में भी स्त्री के इसी उच्च स्थान का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 125) में वाक् सूक्त के माध्यम से स्त्री स्वयं को ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है-
“अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्…” ऋग्वेद (10.125.3) के ‘वाक् सूक्त’ का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्र है, जो ज्ञानशक्ति (देवी वाक्) की सर्वोच्चता बताता है। इसका अर्थ हुआ, “मैं (वाक्/शक्ति) राष्ट्र की स्वामिनी हूँ, समस्त धनों (वसूनाम्) को इकट्ठा करने वाली (संगमनी) हूँ और श्रेष्ठ ज्ञान रखने वाली (चिकितुषी) हूँ। इस प्रकार से यह सर्वोच्च चेतना या वाणी के रूप में स्वयं को राष्ट्र के ऐश्वर्य और ज्ञान का मूल बताती है।
मनुस्मृति में तो यहां तक कहा गया है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।” (अध्याय 3, श्लोक 56)। जहां स्त्री की पूजा होती है, वहीं देवता निवास करते हैं। वस्तुत: कहना होगा कि यह श्लोक भारतीय समाज की मूल संरचना को दर्शाता है। आधुनिक विद्वान पैट्रिक ओलिवेल (Manu’s Code of Law, पृ. 78) भी इसे स्त्री के सम्मान का प्रमाण मानते हैं।
हां, यह जरूर है कि अक्सर रामचरितमानस की एक चौपाई को लेकर भ्रम फैलाया जाता है। परंतु गोस्वामी तुलसीदास की भाषा और संदर्भ को समझे बिना उसका अर्थ निकालना उचित नहीं है। उक्त चौपाई में “ताड़ना” का अर्थ अवधी में “देखभाल” या “संरक्षण” होता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल (हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 214) इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं। अब प्रश्न यह है कि यदि भारतीय परंपरा स्त्री को इतना उच्च स्थान देती है, तो सबरीमाला जैसी परंपराएँ क्यों? इसका उत्तर सामाजिक और जैविक यथार्थ में निहित है। मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें महिलाओं को शारीरिक कष्ट, थकान और असुविधा होती है।
इस संदर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का 2022 का संदर्भ देख सकते हैं, जिसके अनुसार लगभग 70 फीसद महिलाएँ इस दौरान किसी न किसी प्रकार की पीड़ा अनुभव करती हैं। प्राचीन काल में स्वच्छता के साधनों के अभाव के कारण महिलाओं को विश्राम देने के उद्देश्य से कुछ परंपराएँ विकसित हुईं। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि “विश्राम हेतु अलग रखना” और “अस्पृश्य मानना” दो अलग अवधारणाएँ हैं। भारतीय समाज में मूल भावना संरक्षण और स्वास्थ्य की थी, न कि भेदभाव की।
यहां यह भी समझना होगा कि देवता के दर्शन या उसके पास जाने के लिए तन और मन दोनों की पवित्रता की अनिवार्यता भारतीय परंपरा में अनवार्य बताई गई है, एक बार को हम स्त्री के संबंध में इस विमर्श को छोड़ भी दें तो क्या पुरुषों को यह अनुमति मिल सकती है कि वह मंदिर में जाए, यदि उसके जननांग से रुक-रुक कर मूत्र बूंद-बूद में शरीर के बारह आ रहा है, तो क्या वह स्वयं ही या उसके परिवार जन या मंदिर में यह जानकर की उसका उसके मूल विसर्जन पर अंकुश नहीं, क्या उसे मंदिर में प्रवेश मिलेगा? वैज्ञानिक भाषा में तो वह पानी ही तो है!
इसी तरह से मल त्याग या शरीर से लगातार थूक के निकलने एवं नाक का बहना है, होने को तो यह एक क्रिया ही है, क्या तब मंदिर में प्रवेश मिलेगा? अरे, सभी हिन्दू घरों में यह सामान्य परंपरा है जिसके लिए कोई किसी से कुछ नहीं कह रहा, स्नान के बाद पूजा करने से पूर्व घर के सदस्य चाहे जहां, इधर-उधर नहीं बैठते हैं। कोई बिना नहाए उनसे गले लगना भी चाहे तो उसे पूजा सम्पन्न होने तक इंतजार करना होता है। फिर यह सबरीमाला प्रकरण तो करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है।
अत: यहां समझना यही है कि भारतीय दर्शन हमें यह सिखाता है कि स्त्री स्वयं “शक्ति” है। वह “जननी” है, “पालनकर्ता” है और “सृष्टि की आधारशिला” है। “स्त्री समस्ता सकला जगत्सु” यही भारतीय जीवन-दृष्टि का सार है। इसलिए आवश्यक है कि सबरीमाला जैसे विषयों पर निर्णय लेते समय संविधान की मर्यादा, शास्त्रों की गहराई और समाज की वास्तविकता इन तीनों को ही साथ लेकर चलना आवश्यक है। यही संतुलन भारतीयता की पहचान है और यही इस विमर्श का वास्तविक समाधान भी है। हम उम्मीद करेंगे कि न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना भी इसे इसी संदर्भ में अवश्य समझेंगी।