लेखक परिचय

डॉ. राजीव कुमार रावत

डॉ. राजीव कुमार रावत

सामाजिक, राजनीतिक एवं भारतीय परिवार व्यवस्था, मानवीय संबधों के छुपे सचों को उजागर न कर समझने की, जीने की मजबूरी के विषयों में गहरी रुचि ने विविध विधाओं का अध्ययन कराया और अनुभव समृद्ध किया साथ ही व्यक्तित्व को मुखर बनाया और रोजी-रोटी की तलाश ने बहुत नचाया । हिंदी और राजनीति शास्त्र में परास्नातक. राजनीति शास्त्र में पीएच.डी, मानव संसाधन में एमबीए कर हिंदी- अंग्रेजी अनुवादक, कार्यक्रम संचालक आदि भूमिकाओं में दायित्व निर्वहन के साथ परिवार में टाइमपास के आनंद का गहरा शौक और राजनीतिक, समसामयिक, साहित्यिक, राजभाषा, प्रशासन संबंधी विषयों पर एक समग्र समालोचनात्मक दृष्टि से लेखन एवं विमर्श।

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डॉ. राजीव कुमार रावत

क्या यूपीए भाग 2 की सरकार ने आज तक कोई काम इतनी जल्दी में किया है कि लगे कि देश में कोई सरकार है। कल दोपहर सचिन ने यूपीए की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया जी से भेंट की, तुरंत प्रधानमंत्री कार्यालय से चिठ्ठी गृह मंत्रालय चली गई, प्रस्ताव तैयार हो गया, मनोनयन को महामहिम राष्ट्रपति का अनुमोदन मिल गया और सचिन रमेश तेंदुलकर देश के सर्वोच्च विधि निर्माण निकाय के वरिष्ट सदन के सदस्य 39 वर्ष की उम्र में बन गए । सचिन को सौ सलाम लेकिन..।

इससे बड़ा देश के 121 करोड़ लोगों के मुंह पर सत्ता ने क्या कोई और तमाचा जड़ा है, हांलाकि सत्ता तो होती ही तमाचा जड़ने के लिए है लेकिन उसके ही जड़ पाती है जिसके हाथ-पांव और दिमाग जेब कमजोर होती है जिसकी ये चीजें वजनदार होती हैं वहां तो सत्ता के हाथ उसके आगे जुड़ जाते हैं और शीष उसके कदमों में झुक जाता है। सत्ता उसीके आगे-पीछे- ऊपर- नीचे कहीं भी लात मारने की हिम्मत दिखाती है जो उसकी गली में गिड़गिड़ाता हुआ अरजी लेके आता है। पिछले चार वर्षों से देश ने अपना प्रधानमंत्री बोलता हुआ नहीं देखा कि उस महान ईमानदार अर्थशास्त्री की देश की गरीबी. भुखमरी, मंहगाई, आतंकवाद जैसी समस्याओं पर क्या राय है जहां देश की सबसे महान और प्रतिष्ठित सेवा के अधिकारियों एव विधायकों का अपहरण आम बात हो गया हो ? महान लोग देश के सामने कभी नहीं आए- तब भी नहीं जब 04 जून की रात को एक सन्यासी को निपटाने का षणयंत्र रचा गया था और नींद में सोते हुए निरीह, निहत्थे वालकों, महिलाओं पर लाठियां भांजी गई थीं- कहीं सरकार नाम की कोई मशीनरी नजर नहीं आती थी- सिर्फ दिल्ली पुलिस नजर आती थी जो किसके इशारे पर काम कर रही थी- वह आज तक रहस्य है। न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेते हुए केस खोला लेकिन इतना विचित्र निर्णय आया कि किसी भी पक्ष को समझ में ही नहीं आया, कोई दोषी नहीं- दोनों पक्षों के गाल पर काला निशान लगा दिया गया । जिस मुद्दे पर सारा देश उद्देलित था- हर कोई दबी जुवान से इस कायराना हमले की निंदा कर रहा था तब क्रिकेट के भगवान सचिन रमेश तेंदुलकर का कोई वयान देश को याद आता है क्या ? क्या उन्होंने सरकार अथवा बाबा के पक्ष अथवा विपक्ष में अपनी कोई राय दी थी ? क्या काले धन और भृष्टाचार पर ऐसे कथित जननायकों की कोई स्पष्ट सोच नहीं देश के सामने आनी चाहिए ? जिससे देश जान सके कि जिन छोटी बडी चीजों में हम तमाम हो रहे हैं उन पर हमारे मॉडल क्या सोचते हैं पर ऐसा कभी कुछ सामने आता नहीं क्योंकि वे उनकी समस्या है हीं नहीं और हम ऐसे आत्महंता देश हैं कि चित्र की पूजा में ही जान खपा देते हैं चरित्र न हमारा है और न हमारे जननायकों का ।

आज सारा देश लोकपाल, भृष्टाचार, काला धन, अशिक्षा, सुरसा के मुंह जैसी बढ़ती हुई जनसंख्या, प्रतिभाओं का विदेशों में पलायन, कन्याओं की हत्या, नावालिगों पर बढ़ते यौन एवं बाल श्रम अत्याचार, रक्षा सेनाओं में व्याप्त भृष्टाचार, सेनाध्यक्ष के उम्र विवाद, चीन एवं पाकिस्तान के साथ संबंधों आदि जैसी अनेक समस्याओं से जूझ रहा है और इन विषयों पर समाज में विचार मंथन चलता रहा है, ऐसे ही अनेक विषय हैं जिनमें हमें हमारे महानुभावों. माननीयों, प्रधानमंत्री जी या देश के अन्य कर्णधारों के श्रीमुख से एक शब्द सुनने को नहीं मिला है। जिन्हें हम अपना कीमती वक्त देते हैं, जिनके दीवाने होते हैं ऐसे फिल्मी नायक, नायिकाएं एवं खेल आदि अन्य क्षेत्रों की जानी मानी विभूतियां किस लाज शर्म हया से राष्ट्रीय चिंतन के विषयों पर मौन साध लेती हैं या अंग्रेजी में टिटर पिटर करती हैं – यह कचोटता है । शायद बड़े लोग अपने कवच में इतने सुरक्षित हो जाते हैं कि देश के ऊपर उठ जाते हैं और देश की किसी समस्या से उन्हें कोई सरोकार नहीं रह जाता । तब क्या समय नहीं हैं कि हम सब यह विचार करें कि ये बड़े लोग जिन्हें कि हम छोटे लोग ही बड़ा बनाते हैं हमारे लिए किस काम के ? हमारे गांव में एक कहावत कही जाती है कि विल्ली का . . . न लीपने का न पोतने का । किसी मतलब का नहीं । सभी बड़े लोगों के प्रति संपूर्ण सम्मान के साथ यह विचार परेशान करने वाला होता है कि जो हमारे दुखों का नहीं, इससे तो न होता तो ठीक था । और उस पर तुर्रा और उपदेश ऐसे-ऐसे कि शर्म भी पिछली कुरसी पर बैठी हुई शर्म से आंखे झुका ले । सरकारी अधिकारी कठोर निर्णय लेते हुए हिचकें नहीं- आपने कौंन से कठोर निर्णय लिए हैं – और ऐसे काम करने वाली सरकार यकायक चेते और एक दिन में क्रिकेट के शहंशाह को संसद सदस्य बना दे- तो बड़ी वेचैनी होने लगी- सचिन से नहीं-उनके खेल का तो मैं भी मुरीद हूं- वल्कि उस आतुरता, सक्रियता और शक्ति के भौंडे भाटपन के प्रदर्शन से चिढ़ सी होने लगी- कलेजे का खून जल सा गया कि वाह मेरे गरीबों के, आत्महत्या करते किसानों के देश, कटती गायों के देश, ऐसी भी क्या सरकार जो युद्ध के मैदान में पींठ दिखाती है और शतरंज की बाजी में तोप चला देती है या जलेबी लुटने पर ताकती रहती है और गाय के भूसा खाने पर छुरा ले के दौड़ती है।

इस देश की जनसंख्या 121 करोड़ के करीब है और शायद कोई भी सचिन तेंदुलकर के नाम से अपरिचित नहीं है और पूरे देश को उन पर गर्व है पर किस बात का? उनके बंगले में किसी के लिए कोई जगह है, उनकी संपत्ति से कोई गरीबों, भूखों, असहायों, रोगियों. नंगों, जरुरतमंदों………… के भले के लिए कोई ट्रस्ट चलता है, देश में पिछले 20 वर्षों में आई हुई अनेक बाढ़ों, प्राकृतिक आपदाओं, कारगिल युद्ध आदि अनेक चुनौतियों, मुंबई विस्फोटों आदि में घायल, मरे, अपंग हुए देश के नागरिकों, सैनिकों के लिए सचिन ने कुछ किया है, कहीं उनका नाम किसी भले काम के लिए किसी संस्था को दिए चंदे में है, अगर कहीं हो तो कृपया कोई बताना , मैंने तो उनका फोटू सदैव बड़ा सा अपने नाम का चैक स्वीकारते हुए ही देखा है, आज तक मैंने तो उनका न कहीं किसी राष्ट्रीय कार्य में योगदान देखा न कोई कभी उनका कोई वक्तव्य पढ़ा कि उनकी कोई योग्यता, क्षमता, निष्ठा प्रमाणित हुई हो- देश के गंभीर पृश्नों से कोई जिसका वास्ता नहीं- कोई सोच नहीं- कोई विचार नहीं- कोई अनुभव नहीं- समाज में कोई संघर्ष नहीं- कोई नेतृत्व की छाप नहीं – क्या मिलेगा उन्हें देश का माननीय सांसद बनाकर? राजनीति शास्त्र की दृष्टि से देखूं और संसद कहीं मुझे ही अवमानना की वेदी पर वलि का बकरा न बनादे तो मुझे तो यह राज्यसभा का अपमान लगता है कि वहां ऐसे कम उम्र के लोग बैंठें जिनकी न कोई राजनीतिक सोच है, जो देश की किसी भी एक समस्या को नहीं जानते वल्कि डरते हुए कहता हूं कि देश को हरामखोरी और समय की बर्बादी सिखाने के दोषी हैं- जिनके पास अथाह संपत्ति है और फिर भी भेंट में मिली अपनी एक विदेशी कार से कुछ लाख की ड्यूटी माफ कराने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय गुहार लेके पहुंच गए- और बस यहीं खून फुंकता है कि जिस पीएमओ को देश के शहीदों की विधवाओं की फिक्र नहीं, नंगे वेरोजगारों की सुध नहीं, कश्मीर के वेघर पंडितों की चिंता नहीं, मुसलमानों में व्याप्त गरीबी और अशिक्षा से सरोकार नहीं——– वह पीएमओ तुरंत हरकत में आता है और शुल्क माफ हो जाता है। एक सामान्य आदमी आयकर रिटर्न भरते हुए एक महीने परेशान रहता है कि कैसे भी दस पांच हजार बच जाएं और अरबों की संपत्ति के मालिक सचिन की विदेशी भेंट की कार की डयूटी माफ हो जाती है – जिस देश में विदेश से आई हुई बेटे-बेटी की लाश भी बुजुर्ग माँ बाप विना दक्षिणा चढ़ाए एयरपोर्ट से नहीं ला पाते हैं,वहां अरबपति खिलाड़ियों को यह विशेषाधिकार क्यों – ऐसी भीख मांगते शर्म भी नहीं आई ?

ऐसा ही आश्चर्य हमें तब हुआ था जब सचिन को वायुसेना में मानद ग्रुप कैप्टेन दिया गया। एक सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए कि सचिन की मानद रैंक से कितने युवा प्रेरित होकर वायुसेना में आए ? असल में गुलामी के बाद देश में जिन्हें सत्ता मिली, धन मिला . सम्मान मिला- वह पीढ़ी क्रिकेट और फिल्मों के ग्लैमर की चकांचौध में अपने हीनभाव से मुक्त होने की लालसा में जुड़ गई- और वैसे भी मध्यकाल में हमारे पूर्वजों ने चुनौतियों से जूझने के वजाए नशे में डूबना ही वेहतर समझा था, उसी क्रम में अपने आपको बड़े आदमी से जोड़ने की लालसा बड़े-बड़े व्यक्तियों में भी होती है- उसके साथ फोटो खिचाने की, ऑटोग्राफ लेने की आदि । लेकिन हम उनका प्रदेय अथवा योगदान नहीं देखते कि विराट में इनका योगदान क्या है। या हमारी समस्याओं के समय में ये हमारे कितने सगे रहे हैं- इसलिए मुझे ये सब नेता, अभिनेता, कलाकार, खिलाड़ी अपने नहीं लगते- सब जौंक से लगते हैं- हमारे ही खून से इनकी सेहत है और जिम्मेदारी कोई नहीं है, कोई दायित्व है नहीं देश के प्रति- जीते तो करोड़ो, हारे तो कुछ कम, विज्ञापनों की अंधाधुंध कमाई तो है ही चाहे उस 15 पैसे के टायलेटक्लीनर को पी के नौनिहालों की हड्डियां कमजोर हों चाहे दिमाग – हमें इससे क्या हमे हमारे करोड़ों से मतलब।

मेरे विचारों से मुझे कोई सचिन अथवा क्रिकेट विरोधी समझने की भूल कृपया न करे- एक खिलाड़ी के रुप में सचिन अच्छे बल्लेवाज हैं और मुझे व्यक्तिगत तौर पर उनसे कोई परेशानी नहीं है, सौम्य हैं, शालीन हैं, मधुर भाषी हैं, परंतु क्रिकेट में ही नहीं और खेलों में और समाज के और अनेक जाने पहचाने क्षेत्रों में और अच्छी खूबियों वाले एक से एक तपस्वी हैं, जिनका सम्मान किया जाना चाहिए, उनके विचारों को मान देना चाहिए क्योंकि उन लोगों ने अपना जीवन देश, समाज के लिए तपाया है, मेहनत सचिन की भी कम नहीं- हम से बल्ला घुमाना तो दूर उठाना भी नहीं आएगा- पर सचिन के शतक बनाने से कितने घरों में चूल्हा जलता है, मुंबई में कितनी ही समस्याएं हैं – कुछ हजार लोगों को छोड़ दिया जाए तो करोड़ों नारकीय कीड़े मकोड़ों का सा जीवन जीते हैं- उनके जीवन में सचिन के शतक से क्या वेहतरी आती है, इसलिए मेरा प्रश्न यही है कि सचिन को सौ सलाम लेकिन उससे उस संस्था का क्या भला होगा जहां प्रबुद्ध, अनुभवी. तपे तपाए संघर्ष से निखरे और समाज के प्रमाणित व्यक्तियों को नीति निर्माण और विचार विमर्श के लिए बैठना होता है ( बैसे वाकी जो हैं वो भी कैसी नीति बना रहे हैं इस पर हँसा जा सकता है )।

कांउसिल ऑफ स्टेट्स (राज्यसभा) की परिकल्पना में संविधान निर्माताओं का विचार था कि निचले सदन से आए विधेयकों को उच्च सदन में अनुभव की कसौटी पर परखा जाए और इस सदन की गरिमा और प्रतिष्ठा के अनुरुप भारत के उपराष्ट्रपति को इसका पदेन सभापति का दायित्व सौंपा गया । विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और दलगत गंदी राजनीति के ऊपर जिनकी पहचान हो, ऐसे साहित्य, कला, विज्ञान एवं समाजसेवा के क्षेत्र से प्रमुख व्यक्तियों को नामित करने का प्रावधान रखा गया था, लेकिन देखा यही गया है कि इन 12 व्यक्तियों में अधिकांश सत्तापक्ष की पसंद के ही लोग रहे हैं। यद्यपि बहुत ही प्रबुद्ध, प्रमुख व्यक्तियों का राज्यसभा में नामांकन हुआ है किंतु उन्होंने सभा की कार्यवाही में कोई उल्लेखनीय योगदान दिया हो अथवा नीति निर्माण में कोई विशेष भूमिका निभाई हो ऐसा कोई उदाहरण याद नहीं पड़ता है। सचिन को , रेखा जी या किसी को भी राज्यसभा में लाने से कोई विरोध मेरा नहीं है,( और मेरे विरोध से होगा भी क्या ) लेकिन उससे लाभ भी कुछ नहीं है और यह उस लोकतांत्रिक सत्ता की संवेदनशून्यता एवं कृतघ्नता की चरम मदमस्तता दिखाता है जिसे भारत के उन जासूसों की जो अपनी जान पर खेलकर देश के लिए सूचनाएं जुटाते हैं या अब्दुल हमीद की बेवा कानपुर में कितनी दयनीय स्थिति में हैं या कितने ही अन्य पदक विजेता कौड़ी-कौड़ी को मोहताज हैं, युद्ध के शहीदों की बेवाओं की फाइलें कितने दशकों से घिसट रही हैं — उनकी कोई फिकर नहीं है और सचिन, जैसे अरबपतियों के सामने वही सत्ता चेरी वनकर नतमस्तक हो जाती है। क्या प्रधानमंत्री या शासन ने या सचिन ने कभी लेह. थायस, श्रीनगर. ईटानगर. अपांग. तेजपुर. डिगारु . उत्तरलाई जाने वाले सैनिकों और उनके परिवारों को पशुवत यात्रा करते हुए देखा है, अरे दूर की छोड़िए पुरानी दिल्ली स्टेशन पर फौजिओँ को देख लीजिए- देश के लिए जान हथेली पर रख कर जिंदगी वलिदान करने को आतुर फौजिओं को यह देश क्या देता है, रेल में उनके साथ कैसा बर्ताव होता है, और सचिन जैसों को जिन्हें किसी चीज की अब कोई जरुरत नहीं है और न उनका समाज के, देश के भले बुरे से कोई सरोकार था और न है और न होगा- उन्हें और ऊंचाइयां देने को सारी सरकार कुछ ही घंटों में सारी प्रक्रिया पूरी कर देती है, यह वही सरकार और महामहिम राष्ट्रपति हैं जिनके समक्ष कितने ही देशद्रोहियों की फांसी की सजा माफ करने के लिए अर्जियां कब से पड़ीं हैं और इन्हें समय नहीं मिलता ।

और फिर सचिन ही क्यों, क्या और बहुत से गैंदबाज या फील्डर और अऩ्य खेलों के खिलाड़ी किसी मामले में उनसे कम हैं बल्कि सचिन के ऊपर तो एक कलंक सा लगा है कि उनके शतक अधिकांशतः भारत की हार के मैचों में बने हैं । खैर मुझे सचिन से कोई शिकायत नहीं हैं किंतु चर्चावश ध्यान में आता है कि विनोद कांबली, संजय मांजरेकर का कैरियर कौंन खा गया था ? तो सचिन को सौ सलाम पर मेरे देश को क्या मिला, गरीबों का क्या भला हुआ- उन्हें दिल्ली में एक मनपसंद सबसे खूबसूरत सांसद बंगला और बेशुमार सुविधाएं और मिल जाएंगी जिन्हें कि वे कभी भी कहीं भी पा सकते थे- खरीद सकते थे । काश, हम अन्ना हजारे को संसद में समाजसेवी कोटे से मनोनीत करने की हिम्मत दिखा पाते तो देश का सचिन के खेल से ज्यादा भला होता पर पता नहीं इस देश की बुतपरस्ती कब इसका पीछा छोड़ेगी । हमने अपने नायक गढ़ने के पैमाने बदल दिए हैं और उछल कूद करने वाले, नाचने गाने वाले लोग हमारे नायक हो गए हैं- जहां शौर्य, वलिदान. सत्य, सेवा, त्याग, समर्पण सत्ता के षणयंत्रों से परास्त हो रहे हैं, सारे प्रमुख विषयों पर जहां कोई चर्चा न हो रही हो, मुंह खोल कर विनाश लीला कर रही समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए जहां सत्ता स्वांग करने को ही अपनी सफलता मान रही हो, जहां मेज कुरसियां चलती हों, हंगामे होते हों वायकाट और गाली गलौज होती है और क्या क्या होता है यह अरविंद केजरीवाल जी, किरण बेदी जी या ओम पुरी जी बता सकते हैं, परंतु वहां किसी गरीब किसान, मजदूर, लाचार, वेवश, अबला. . . .. का कोई रहबर न हो, उनकी दिक्कतों पर घडियाली आंसू पिछले 60 सालों से बहाए जा रहे हों, जहां झूंठी कुश्तियां होती हों, घृणित राजनीति होती हो, सब कुछ परदे के पीछे होता हो वहां सचिन जैसे सीधे सच्चे दुनिया के सामने खुले आम खेलने वाले खिलाड़ी क्या कर लेंगे , फिर भी खेलों में कामयाबी के लिए सचिन को सौ सलाम लेकिन—-

3 Responses to “सचिन को सौ सलाम लेकिन—–।”

  1. डॉ राजीव कुमार रावत

    ०४ अगस्त 2012
    प्रिय मित्र सीएसपी,
    काफी दिनो बाद अपना प्रवक्ता खाता खोलने पर आपकी टिप्पणी पढ़ने को मिली। धन्यवाद,आपने इसे पढ़ने में समय दिया।
    लेखक को प्रतिक्रियाएं देने का हक नहीं होता, यह विशेषाधिकार तो पाठक के ही पास है कि वह लेखक के वेवकूफ भी कह सकता है और मान भी दे सकता है। हमारे यहां एक परंपरा है कि मान मिलने पर- सब आपकी कृपा है, आशीर्वाद है आदि कहते हैं और भर्त्सना होने पर संबंधित विषयों पर अपना पुनःविचार या सफाई देने का पुनःअवसर लेखक. कवि के पास होता है। मात्र निवेदन है कि लेख पर एक बार पुनः गौर करें-
    १. मेरे लेख में ही कई जगह सचिन के प्रति आदर भाव है.
    २. प्रश्न सचिन का नहीं था, सचिन तो एक प्रतीक भर हैं, बात जो कही गई है, उस सूत्र को पकड़ने का प्रयास करें- पाठक के लिए इसीलिए सुधी पाठक अथवा विद्व जन कहा जाता है।
    ३. प्रश्न उस तेजी का था जो इतने निर्रथक काम में दिखाई गई, जहां कि लाखों और मसले जिनसे देश का ज्यादा गहरा सरोकार है, अनिर्णीत पड़े हों- यह सोच भारत वाले की है, इंडिया वाले की नहीं- और मैं भारत वाला ही हूं – भाई -यही मेरी कमजोर शक्ति है।
    ४. सचिन ही नहीं हमारे अन्य कागजी नायक देश की किसी समस्या के बारे में कोई विचारधारा नहीं रखते- यहां से सब वैभव,सम्मान—– — — सब पाते हैं पर देश को देते कुछ नहीं— — उनकी तुलना में जो कि देश को जीवन देते हैं।
    ५. क्या हमारे नायकों का यह धर्म नहीं बनता कि वे जनहित, राष्ट्र हित के मामलों में व्यापक हित में कुछ बोलें और सरकार, समाज को अपना विचार दें- सरकारें इनकी ज्यादा सुनती है- इनकी आवाज में दम होता है- फिर राष्ट्रीय सोच और नैतिक बल क्यों नहीं होता।
    ६.आप अगर एक बार ध्यान से पढ़ेंगे तो यही पाएंगे कि लेख सचिन विरोध से कतई नहीं लिखा गया, उस पी़ड़ा में लिखा गया है जिसमें खरबपतियों,अरबपतियों. महानायकों की राष्ट्र. समाज के प्रति उदासीनता है और हम उन्हीं को पूजते चले जाते हैं।
    ७.आप क्रिकेट प्रेमी है सचिन भक्त हैं-मेरी किसी गैरजानकारी से मेरी वेवकूफी झलकी है- सुधार करने के लिए धन्यवाद। मैंने कोई ज्यादा आंकड़ों की बात की भी नहीं है, क्योंकि वह मेरे लेख का मूल तत्व ही नहीं है- इसलिए उसमें ज्यादा खोजबीन की आवश्यकता मुझे नहीं लगी- हां साधारण सा खेल प्रेमी हूं- भक्ति आराधना किसी की नहीं करता, इसलिए किसी को वेवकूफ भी नहीं कहता। विषय मात्र इतना सा था कि समाज के इन प्रतिष्ठित और सर्वसाधन संपन्न लोगों को अपनी विचारधारा स्पष्ट करनी चाहिए और समाज को एक दिशा देनी चाहिए, क्यों कि हमारे देश का चरित्र- नायक नायिकाओं के पीछे अंधे होकर दौड़ने का है- और ये लोग चांदी के सिक्कों के पीछे पगलाएं हैं। क्या सचिन की कार की ड्यूटी माफ नहीं की गई थी जबकि वे इसे देने में सक्षम थे, जहां १० रुपये में बच्चे, पत्नी बिक जाती हों मित्र, उस देश में सचिन भगवान हैं। जहां लाशें और दवाइयां भी विना भेट चढ़ाए नहीं मिलती।
    बहुत ही महत्वपूर्ण विषयों पर मेरे और आप जैसे आम आदमी ( क्षमा करें मैं नहीं जानता कि आप आम भारत वाले हैं या खास इंडिया वाले) समाज में मत निर्माण नहीं कर सकते किंतु ये लोग समाज को दिशा दे सकते हैं। इन्हें सोचना चाहिए कि इनके लिए पैसे ज्यादा महत्व रखते हैं या देश- खासतौर से इनके विज्ञापन यदि अच्छी, स्वास्थ्यवर्धक और सत्कार्यों की ओर प्रेरित करने वाले हों तो ज्यादा व्यापक असर होगा।

    अंतिम निवेदन- आप और मैं दोनों ही इस विषय पर जून २०१८ में बात करेंगे कि सचिन, रेखा आदि महापुरुषों एवं माननीयों ने राज्यसभा में क्या योगदान दिया, कितनी बार श्रीमुख खोला । यद्यपि यह प्रश्न वहां बैठे अन्य माननीयों के लिए भी है, पर फिर भी इनसे हमारी अपेक्षा भी ज्यादा होनी चाहिए क्योंकि यह हमारे भगवान हैं।

    और अंत में मेरे लेख से ही देखिए-
    मेरे विचारों से मुझे कोई सचिन अथवा क्रिकेट विरोधी समझने की भूल कृपया न करे- एक खिलाड़ी के रुप में सचिन अच्छे बल्लेवाज हैं और मुझे व्यक्तिगत तौर पर उनसे कोई परेशानी नहीं है, सौम्य हैं, शालीन हैं, मधुर भाषी हैं, परंतु क्रिकेट में ही नहीं और खेलों में और समाज के और अनेक जाने पहचाने क्षेत्रों में और अच्छी खूबियों वाले एक से एक तपस्वी हैं, जिनका सम्मान किया जाना चाहिए,

    आशा है आप विद्वजनों एवं सुधी पाठकों का स्नेह मिलता रहेगा। संजीव जी “प्रवक्ता” चलाना मुझसे और आपसे वेहतर जानते हैं तभी तो मेरा लेख और आपकी प्रतिक्रिया जस की तस छपती है. मित्र।

    सादर

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  2. csp

    रावत साहब,
    ना तो मै आपकी बातों से पूरी तरीके से इत्तेफाक रखता हूँ ना ही इन्हे पूरी तरीके से गलत कहूँगा. ळेकिन इतना जरूर कहूँगा कि कुछ बातें आपने बिना जानकारी के लिख दी हैं….
    मसलनः
    १. पैराग्राफ ४.
    इसका जवाब आपको आज के समाचार पत्रों मे मिल गया होगा कि वे 400 गरीब बच्चों का खर्च उठाते हैं.
    इसके अलावा अगर आपने लेख लिखने से पहले थोङी छानबीन की होती तो विकीपीडिया पर यह जानकारी और भी कुछ सामाजिक कार्य जो वह करते हैं, बहुत पहले से थी लेकिन आप भी क्या करते, शायद सचिन को गाली देने की सोच मे यह बात अपके ध्यान मे नही आयी होगी.
    २. आखिरी पैराग्राफ
    आपकी क्रिकेट की जानकारी भी माशा अल्लाह वरना इतनी बेवकूफाना बात कि “सचिन के ऊपर तो एक कलंक सा लगा है कि उनके शतक अधिकांशतः भारत की हार के मैचों में बने हैं” कोई और नही लिख सकता है. आपकी जानकारी के लिये नीचे एक लिंक दे रहा हूँ. वहाँ जाकर कम से कम अपनी जानकारी दुरुस्त कर लीजिये और ऐसा बोलने से पहले कम से कम यह निश्चित कर लीजिये कि आपकी जानकारी सही है.
    ——————————-
    http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/Thrid-Eye/entry/सच-न-त-द-लकर-अभद-र-आर-प-ज-टलम-न-जव-ब

    आखिर मे संजीव जी से एक विनम्र निवेदन कि कम से कम ऐसे लेख, जिनमे लोगों पर अनर्गल आरोप लगाये जा रहे हों, से प्रवक्ता जैसे पोर्टल को बचायें तो बेहतर होगा. आलोचना अपने आप मे एक अच्छी बात है लेकिन बिना किसी जानकारी के किसी को बुरा भला कह देना…….यह निन्दनीय है….

    रावत साहब आप बहुत ही अच्छा लिखते हैं लेकिन उम्मीद है कि आगे से आप अनर्गल प्रलाप और बिना जानकारी के कुछ भी लिखने से बचेंगे…….

    सादर

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  3. शिव कुमार सिंह शिशोदिया

    प्रिय रावत
    आपका आँख खोलने वाला लेख पढ़ा बड़ा अच्छा लगा ये देश ही कुछ विचित्र हैं यहाँ पर जितने भी विशिष्ट व्यक्ति राज्य सभा के सदस्य हुए किसीने एक बार भी मुह नहीं खोला हैं बस ये तो मार्केटिंग हैं जो बिक सकता उसे ही खरीदो उन्हें देश के भले से कुछ भी लेना देना नहीं हैं यह एक नंगा नांच हैं आपका लेख कुछ ज्यादा ही abstract हो गया एवं कुछ लम्बा ही प्रलाप लगने लगा उसने कुछ उदाहरण डाल कर यदि उसे कुछ रुचिकर बना दिया जाता तो ज्यादा अच्छा होता. जैसे कुछ पूर्व राज्य सभा सदस्यों के नाम के साथ उनके राज्य सभा में योगदान का उल्लेख भी कर दिया जाय तो पढ़ने में आनंद आता . देश की राज्य सत्ता अब बोखलाहट में हैं उसे सूझ नहीं रहा कि क्या किया जाये उनका लक्ष्य केवल सत्ता प्राप्ति हैं और सुखों के बनाए रखने में हैं-साधन के उचित अनुचित की कोई चिंता नहीं हैं —

    है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
    जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

    रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
    अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए

    अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
    ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए

    फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
    जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए

    छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
    आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

    दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ
    तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहिए.

    उम्मीद यही कर सकते हैं कि ये सरकार टोटके छोडकर कुछ पुरुषार्थ दिखाए ।

    आपका
    शिव

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