सनातन जीवन पद्धति औऱ कांग्रेस का थिंकटैंक

डॉ अजय खेमरिया

कभी नाज था जिस पर कहाँ गया वो चिंतन समूह ?। अच्छा ही हुआ कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एलानिया अंदाज में लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया,उन्होंने लिंगायतों औऱ हिन्दू धर्म के विभाजन से जोड़कर इसे काँग्रेस का खतरनाक खेल बताया है जाहिर है कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में विशुद्ध वोटों के लिये खेला गया ये कार्ड कानूनी रूप से बेअसर ही साबित होगा, चुनावी परिणाम बीजेपी के पक्ष में आये या नही केंद्र सरकार इस विभाजनकारी सिफारिश को मानने वाली नही है औऱ सच्चाई भी ये है कि भले कांग्रेस के पक्ष कर्नाटक के परिणाम आ भी जाये तब भी कांग्रेस के लिये ये विषय कोई मुद्दा नही रहेगा क्योंकि तब तक उसका मिशन कर्नाटक पूरा हो चुका होगा।यही कारण है कि काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अभी तक इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है,जबकि वे लगातार लिंगायत मठों में जाकर माथा टेक रहे है,राहुल गांधी ने बड़ी चतुराई से लिंगायत कार्ड खेला है उन्होंने न तो अपनी कर्नाटक सरकार की इस सिफारिश को अच्छा कहा है न बीजेपी औऱ मोदी पर ये आरोप लगाया कि वह लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने में अड़ंगा लगा रहे है । यह अच्छा ही हुआ कि अमित शाह ने बिल्कुल साफ कर दिया कि केंद्र की मोदी सरकार लिंगायतों को किसी कीमत पर अलग धर्म का दर्जा नही देगी,देश मे जिस तुष्टिकरण औऱ अल्पसंख्यकवाद की राजनीति को राजनीतिक दल हवा दे रहे है उसके बीच बीजेपी प्रमुख का यह बयान थोड़ी राहत देने वाला है।राहुल गांधी अभी भी जिस थिंकटैंक के भरोसे कांग्रेस को चलाना चाहते है उसकी बुनियादी मानसिकता हिन्दू विरोधी ही है भले ही वे मन्दिर मन्दिर जा रहे हो पर लिंगायत प्रकरण में उनकी सोच ने देश के बहुसंख्यक वर्ग को फिर सोचने पर विवश किया है ।यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि नए अध्यक्ष के रूप में भी राहुल गांधी एनजीओ स्टाइल में देश की सबसे बड़ी पार्टी को चलाना चाहते है उनका खुद का स्वतंत्र सोच आज भी देश के लोग समझ नही पाए है वे कभी हार्दिक पटेल तो कभी जिनेश मेवानी,कभी कन्हिया कुमार,जैसे चेहरों को आगे कर कांग्रेस की सरकारें बनबाना  चाहते है जिनकी बुनियादी सोच ही विकृत है।एंटोनी कमेटी ने 2014 की ऐतिहासिक हार को प्रोमुस्लिम छवि से जोड़कर देखा था लेकिन हाल ही में लिंगायत प्रकरण हो या दलित प्रहसन राहुल गांधी उसी विभाजनकारी सोच पर आगे बढ़े है जिसका अबलम्बन करने के चलते ही आज देश की सबसे बड़ी पार्टी सिर्फ 4 राज्यों में सिमटकर रह गयी है।शायद कांग्रेस का मौजूदा थिंकटैंक यह नही समझता कि नए भारत में लोग अब सिर्फ प्रतीकों के भरोसे नही है जैसा इंदिरा औऱ नेहरू के दौर में हुआ करता था,देश की बहु संख्यक आबादी अब तुष्टीकरण औऱ अल्पसंख्यक वाद को सीधे अस्वीकार करती है दलित आंदोलन पर राहुल गांधी का स्टैंड भारत को जोड़ने वाला कतई नही कहा जा सकता ,इसे देश के लगभग 64 फीसदी ओबीसी सवर्ण ने बेहद नाराजगी के साथ लिया है।वैसे भी जो पार्टी अखिल भारतीय स्वरूप में सत्ता संचालित करती हो उसके मुखिया का दलित आंदोलन पर इस तरह प्रतिक्रियात्मक अंदाज में बोलना कांग्रेस की संस्क्रति के भी खिलाफ है अच्छा होता राहुल गांधी सामाजिक सदभाव का आह्वान करते।इसी तरह कर्नाटक सरकार की सिफारिश को वह खारिज कर सकते थे यह कहकर की ये कदम हिंदुओं के लिये विभाजनकारी है,ऐसा करके वे अपनी जनेऊधारी छवि को मजबूत कर सकते थे लेकिन एक तरफ तो वे मन्दिर मन्दिर भाग रहे है औऱ दूसरी तरफ सिर्फ सिद्धारमैया की कुर्सी बचाने के लिये लिंगायत कार्ड खेल रहे है यह जानते हुए की उन्ही की केंद्र सरकार उन्ही की महाराष्ट्र सरकार की ऐसी सिफारिश को पहले ही अमान्य कर चुकी है । देश का हिन्दू समाज इसे बहुत बारीकी से देख रहा है कि कैसे लगातार सिर्फ वोटों की राजनीति या बीजेपी को रोकने के क्षणिक उद्देश्य से उसकी आस्था के साथ खिलवाड़ हो रहा है।यदि लिंगायतों को सिर्फ अलग पूजा पद्धति औऱ अंतिम संस्कार विधि के आधार पर अलग धर्म बनाया जा सकता है तो फिर कांग्रेस भविष्य में 127 अलग धर्म हिंदुओं में से ही बना सकती है क्योंकि सनातन धर्म मे इतनी ही पूजा औऱ दूसरी संस्कार विधियां विधमान है।हिंदुओ में ईश्वरवाद,अनीश्वरवादी, वैष्णव,शैव, ब्रह्मचारी,नागा, नाथ,गिरी,तीर्थ,डेरे,पन्थ ,सम्प्रदाय, है कोई सिर्फ अपने गुरु को मानने वाले है कोई सांई को ,कोई अपनी अंतिम संस्कार विधि जलदाह देकर करता है कोई दफन करके,कोई अग्निदाग,कोई खुले में शव छोड़कर। सनातन जीवन मूल्यों को मानने वाले अपनी व्यक्तिगत आस्था के लिये स्वतन्त्र है इसका मतलब यह नही है कि वे हिन्दू नही है असल मे कोई भी एक सहिंता ऐसी नही जो सब पर लागू होती हो लेकिन सब एक दूसरे के यहाँ आ जा सकते है।यही अप्रितम आजादी ही तो हिन्दू धर्म है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सम्मिलित रूप से एक विशिस्ट जीवनशैली कहकर परिभाषित किया है।अब इसी परिभाषा को आधार बनाकर हिंदुओं को विभाजित किया जा रहा है।क्या कभी शिया सुन्नी,बरेलबी, देवबन्दी,दाउदी, बोहरा,को लेकर कोई दल लिंगायतों जैसी सिफारिश की हिम्मत दिखा सकता है जबकि इन फिरकों में से किसी को किसी अन्य की मस्जिद में जाकर नमाज अता करने की इजाजत नही होती है।ऐसा इसलिये संभव नही है क्योंकि देश की सियासत ने मुस्लिमों को एक वोटबैंक मान लिया है।क्या कभी कैथोलिक, टेस्टोरियन,नॉन टेस्टोरियन ईसाईयों को लेकर कोई बात होती है ? लेकिन हिन्दू देश मे सत्ता का सबसे नरम चारा अब तक साबित होते आये है उन्हें दलित,पिछड़े,अति पिछड़े,महादलित,सवर्ण जैसे विभाजनों में आसानी से बरगलाया जा रहा है।हमने कभी सोचा ही नही की इस सनातन संस्क्रति में जात पात वर्ग का कभी अस्तित्व ही नही था ,वसुधैव कुटुंब की बात करने वाले हमारे समाज मे कृष्ण को पिछड़े यादवों, राम को अगड़े क्षत्रियों,शिवाजी को मराठों तक सीमित करने का सफलतापूर्वक काम कर दिया गया और हमे पता ही नही चला।दलितों को हनुमान जी का शत्रु बना दिया गया।इस सियासत ने हमे कहाँ से कहाँ लाकर खड़ा कर दिया,सवर्ण दलित पिछडे ।आगे कहाँ ले जाएगी ये वोट की राजनीति ?,आइये अभी भी समझ लें।

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