लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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चुपके से

मैं तो चाहता था

सदा शिशु बना रहना

इसीलिए

मैंने कभी नहीं बुलाया

जवानी को

फिर भी

वह चली आई

चुपके से

जैसे

चला आता है प्रेम

हमारे जीवन में

अनजाने ही

चुपके से।

————

2.

याद

वैशाख के दोपहर में

इस तरह कभी छांह नहीं आती

प्यासी धरती की प्यास बुझाने

न ही आते हैं इस तरह शीतल फुहारों के साथ मेघ

इस तरह शमशान में शांति भी नहीं आती

मौत का नंगा तांडव करते

इस तरह अचानक शरद में शीतलहरी भी नहीं आती

कलेजा चाक कर दे इंसान का हमेशा के लिए

ऐसा ज़लज़ला भी नहीं आता इस तरह चुपचाप

जिस तरह आती है तुम्हारी याद

उस तरह कुछ भी नहीं आता।

—————————-

3.

झूठ

जी भर के निहारा

सराहा खूब

मेरी सीरत को

छुआ, सहलाया और पुचकारा

मेरे सपनों को

जब मैं डूब गया

तुम्हारे दिखाये सपनों के सागर में

मदहोशी की हद तक

तब अचानक!

तुम्हारा दावा है

तुमने नहीं दिखाये सपने

क्या तुम बोल सकती हो

कोई इससे बड़ा झूठ?

—————–

4.

स्मृतियां

तुम्हारे संग

कभी घंटों चुपचाप बैठकर

तो कभी घंटों बातें करके

सहज हो जाता था मैं

और जब तुम हंसती थी

तब खिल उठते थे

मेरे दिल के बाग में

हजार-हजार गुलाब एक साथ

तुमसे दूर हो कर

ये स्मृतियां शेष रह गई हैं

मेरे पास

तुम्हारी घरोहर बनकर

तुम्हारा

वो साथ बैठना

बातें करना,

रोना, हंसना;

रुठना, मनाना;

हर पल, हर क्षण

मुझे आभास कराता है

आज भी

तुम्हारे पास होने का

इसीलिए

बड़े जतन से संभाला है मैंने

तुम्हारे इस धरोहर को

क्योंकि

इससे मिलते ही

मन आनंदित हो जाता है

उमंग-उत्साह के रंग में

मैं सराबोर हो जाता हूं

पल भर के लिए

जीवन मेला सा बन जाता है

और मैं

एकबारगी

फिर से

सहज हो जाता हूँ

उसी तरह

जिस तरह

कभी तुमसे मिल कर होता था।

——————-

5.

याद करुंगा

जीने के लिए

जब भी प्रयास करुँगा

मैं तुम्हारी

यादों को याद करुँगा

आंखो ने सपने देखे थे

तुम्हें पाकर

होठों ने

मुस्काये थे

तुम्हें अपनाकर

अवसर दे

जब भी वक्त मुझे यह-

बार-बार यही अपराध करुँगा

जीने के लिए

जब भी…..

जब-जब

तेरे वायदे

याद दिलाते

तेरी काया

फैल जाती हो तुम

खुशबू बनकर

यहाँ नहीं,

वहाँ नहीं,

कहाँ नहीं

जाती हो तुम

मेरे संग

आंसू बनकर

फिर भी

मिले यही अवसर-

खुदी से यही फरियाद करुँगा,

जीने के लिए

जब भी….

रोना-हंसना, लड़ना-झगड़ना

बन कर आज

बरगद की छांव;

देती है मुझे

एक सुखद ठांव।

सुख का यह क्षण

लिए आ जाती हो

जब तुम दबे पांव;

बहुत पास लगती है

तुम्हारी यादों की गाँव।

ऐसे ही

आती रहो तुम

मेरे मन मस्तिष्क में

अविरल-अविराम।

कसम तुम्हारी

मरते दम तक

मैं तुम्हारा इंतजार करुँगा,

जीने के लिए

जब भी……

3 Responses to “सतीश सिंह की पाँच प्रेम कविताएं”

  1. SUDHIR kK SINGH DIXIT

    बहुत ही सुंदर माला में शब्दों को पिरोया है सतीशजी आपने। ख़ास तौर पर ‘जिस तरह आती है तुम्हारी याद, उस तरह कुछ भी नहीं आता’ मन को भा गया। भविष्य में भी ऐसी ही रचनाओं की अपेक्षा है। कृपया बधाई स्वीकार करें। धन्यवाद

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  2. vandana

    बहुत ही सुन्दर और भावभीनी रचनायें हैं………..सभी एक से बढ़कर एक हैं.

    Reply

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