प्रमोद भार्गव
देश में दलहन उत्पादन को नई गति देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रोडमैप बनेगा।इस लक्ष्यपूर्ति के लिए केंद्रीय बजट में 354 करोड़ रुपए की धनराशि का प्रबंध मध्यप्रदेश के लिए किया गया है।इस संबंध में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के सीहौर जिले के अमलाहा में दलहन क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि ‘बीज से लेकर बाजार तक किसानों को अब चिंता करने की जरूरत नहीं है।राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ मंथन करके दलहन उत्पादन का राष्ट्रीय रोडमैप बनेगा।दाल उत्पादक किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा।इसके अंतर्गत तुअर 8 हजार रुपए, उड़द 7800 रुपए, चना 5857 रुपए और मसूर 7 हजार रुपए प्रति क्विंटल दर से खरीद की जाएगी।साथ ही देश में एक हजार नए दाल मिल लगेंगे।’ चौहान ने कहा कि ‘अब दलहन की ऐसी उन्नत किस्में तैयार होंगी ,जिनमें खरपतवार नहीं पनपेगी।पौधा स्वयं ही उन्हें नष्ट कर देगा।मसूर दाल की एक नई किस्म विकसित की जा रही है,जिसमें दो की जगह चार फलियां लगेंगीं।यह दाल 120 दिन की बजाय 70 से 80 दिनों में पककर तैयार हो जाएगी।अब किसानों के लिए मौसम और रोगों के अनुकूल बेहतर बीजों के लिए भटकना नहीं पड़ेगा,क्योंकि गांवों में ही बीज ग्राम निर्मित होंगे।’इस अवसर पर देश के दलहन उत्पादक 9 राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ अमलाहा में चौहान ने दालों की उन्नत फसलों का अवलोकन भी किया।
भारतीय परंपरा में अन्न और दाल का विशेष महत्व है।थाली में परोसा गया आहार देवतुल्य मन जाता है।लेकिन आज हम हर थाली के अनिवार्य आहार दाल उत्पादन में हम आत्मनिर्भर नहीं हैं।देश में दालों की मांग के अनुपात में दलहन का उत्पादन चुनौती बना हुआ है।बड़ी मात्रा में हमें दालों का आयात करना होता है।हालांकि अब धन-धान्य और दलहन आत्मनिर्भरता मिषन नाम से की गई योजनाओं ने दाल उत्पादन में आत्मनिर्भरता से लेकर निर्यात तक के रास्ते खोलने के उपाय भारत सरकार ने किए हुए हैं। यदि खेत में ये उपाय कारगर साबित होते हैं तो उतरती हैं किसान की माली हालत तो सुधरेगी ही देश दाल उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भी हो जाएगा। इन योजनाओं के लिए 35,440 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। ये योजनाएं खासतौर से पिछड़े सौ जिलों में कृषि उत्पादकता बढ़ाने और विविध फसलों की पैदावार को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से आरंभ की गई हैं। दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के लिए वर्ष 2030-31 तक उत्पादन को 252 लाख टन से बड़ाकर 350 लाख टन करने का लक्ष्य तय किया गया है। इस हेतु 35 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि दलहन उत्पादन के दायरे में लाई जाएगी। विडंबना देखिए, भारत दुनिया का सबसे बड़ा दलहन उत्पादन और उपभोक्ता देश है, लेकिन दालों की आपूर्ति आयात पर निर्भर है। बावजूद नरेंद्र मोदी के 12 साल के कार्यकाल में कृषि निर्यात दोगुना हो गया है। लेकिन दालें आयात करनी पड़ती हैं।
आहार में पौष्टिक तत्वों का कारक मानी जाने वाली दालें,बढ़ते दामों के कारण गरीब की शारीरिक जरूरत पूरी नहीं कर रही हैं। ये हालात मानसून के दौरान औसत से कम या ज्यादा बारिश होने से तो उत्पन्न होते ही हैं, किसान के नकदी फसलों की ओर रुख करने के कारण भी हुए हैं। यही नहीं यह स्थिति इसलिए भी बनी, क्योंकि कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार की गलत नीतियों के चलते किसान को खाद्य वस्तुओं की बजाय, ईंधन, प्लास्टिक और फूलों की फसल उगाने के लिए, कृषि विभाग ने जागरूकता के अभियान चलाए। यही वजह रही कि भूमंडलीकरण के दौर में दालों की पैदावार लगातार कम होती चली गई। दाल उत्पादन का रकबा लगभग 15 हजार हेक्टेयर कम हो गया। भारत में दालों की सालाना खपत 220 से 230 लाख टन है। मांग और आपूर्ति के इस बड़े अंतर के चलते जमाखोरों और दाल के आयातक व्यापरियों को भी बारे-न्यारे करने का मौका मिल जाता है।
पौष्टिक आहार देश के हरेक नागरिक के स्वस्थ जीवन से जुड़ा अहम् प्रश्न है। संविधान के मूलभूत अधिकारों में भोजन का अधिकार शामिल है। चूंकि दालें प्रोटीन और पौष्टिकता का महत्वपूर्ण जरिया हैं। चूंकि दालें आयात करनी होती हैं, इसलिए इनके भाव भी बीच-बीच में बढ़ जाते हैं। इस कारण मध्यवर्गीय व्यक्ति की थाली से दाल गायब होने लगती है। चुनांचें दाल व्यक्ति की सेहत से जुड़ी हैं और बीमारी की हालत में तो रोगी को केवल दाल-रोटी खाने की ही सलाह चिकित्सक देते हैं। वर्ष 1951 में प्रतिव्यक्ति दालों की उपलब्धता 60 ग्राम थी,जो वर्ष 2010 में घटकर 34 ग्राम रह गई। जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार यह मात्रा 80 ग्राम होनी चाहिए। दालें भारत में प्रोटीन का प्रमुख स्त्रोत मानी जाती हैं। लेकिन स्थानीय मांग पूरी करने के लिए दाल उत्पादन में किसान को बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। तुअर दाल की फसल आठ माह में तैयार होती है। बावजूद किसान को उचित दाम नहीं मिलते हैं। गोया,किसान साल में एक फसल उगाने में रुचि कैसे लें ?विदेशों में रहने वाले भारतीय भी सबसे ज्यादा तुअर की दाल खाना पसंद करते हैं। हालांकि अब लंबे समय में पैदा होने वाली दालों की किस्में सुधारी जा रही हैं।आनुवंशिक रूप से इनके बीजों को परिवर्धित किया जा रहा है। विदेशों में रहने वाले भारतीय भी सबसे ज्यादा तुअर की दाल खाना पसंद करते हैं। देश में सबसे अधिक चने और अरहर की खेती होती है। इनके अलावा मूंग और उड़द की दालें पैदा होती हैं। देश में 10 राज्यों के किसान दालों की खेती करते हैं। इनमें सबसे अधिक उत्पादक राज्य महाराष्ट्र है। दालें मुख्य रूप से खरीफ की फसल हैं,जो वर्षा ऋतु में बोई जाती हैं। इस ऋतु में करीब 70 प्रतिशत दालों का उत्पादन होता है।
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार दालों के तात्कालिक भाव 85.42 प्रति किलो से लेकर 112.88 रुपए किलो तक हैं। भावों में इस उछाल का कारण जमाखोरी और सट्टेबाजी के साथ आयात का कुचक्र है। टाटा, मंहिद्रा, ईजी-डे और रिलांइस जैसी बड़ी कंपनियां जब से दाल के व्यापार से जुड़ी हैं,तब से ये जब चाहे तब मुनाफे के लिए दाल से खिलवाड़ करने लग जाती हैं। जब कंपनियां बड़ी तादाद में दालों का भंडारण कर लेती हैं,तो भावों में कृत्रिम उछाल आ जाता है। हालांकि केंद्र सरकार ने दालों का भंडारण सितंबर 2024 से सीमित किया हुआ है। इस कारण भाव नियंत्रण में हैं। मीडिया दाल के बढ़ते भावों को गरीब की थाली से जोड़कर उछालता है। तब सरकार दाल के आयात के लिए विवश हो जाती है। मसलन देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हर हाल में पौ-बारह बने रहते हैं। इन कंपनियों का दबदबा इतना है कि कोई भी राज्य सरकार इनके गोदामों पर छापे डालने का जोखिम उठाने का साहस नहीं जुटा पाती? लिहाजा कालाबाजारी बदस्तूर रहती है। ये कंपनियां मसूर और मटर की दाल कनाडा से,उड़द और अरहर की दाल बर्मा के रंगून से,राजमा चीन से और काबुली चना आस्ट्रेलिया से आयात करती हैं। इनके अलावा अमेरिका, रूस, केन्या, तंजानिया, मोजांबिक, मलावा और तुर्की से भी दालें आायात की जाती हैं। कनाडा ने मसूर दाल के भाव पिछले साल की तुलना में दोगुने कर दिए हैं। एशियाई देशों में सबसे ज्यादा दालों का निर्यात करने वाला देश कनाडा है।
इस नाते यह कहने में कोई दो राय नहीं कि विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बात तो छोड़िए,देशी कंपनियां भी भारतीय कृषि को बदहाल बनाए रखना चाहती हैं।
आयात की जब इन्हें खुली छूट मिल जाती है तो ये जरूरत से ज्यादा दाल व तेल का आयात करके भारत को डंपिंग ग्राउंड बना देती हैं। तय है,कालांतर में भारत की तरह दूसरे देशों में यदि मौसम रूठ जाता है तो दाल और प्याज की तरह खाद्य-तेल के भाव भी आसमान छूने लग जाते हैं। सस्ते तेल का आयात जारी रहने की वजह से ही भारत में तिलहन का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। बावजूद हमारे नेता ऐसी नीतियों को बढ़ावा देने की कोशिशों में लगे रहे हैं कि दलहन और तिलहत के क्षेत्र में भारत पूरी तरह परावलंबी बना रहे। इस परिप्रेक्ष्य में मनमोहन सरकार के कृषि मंत्री बलराम जाखड़ ने सलाह दी थी कि भारत अफ्रीका में दालें उगाए और फिर आयात करे। इसी तरह संप्रग सरकार में कृषि मंत्री रहे शरद पवार म्यांमार और उरूग्वे में दालें पैदा कराकर आयात करना चाहते थे। ये सुझाव समझ से परे हैं। आखिर ऐसे क्या रहस्य हैं कि हमारे नीति-नियंता विदेशी धरती पर तो दाल उत्पादन को प्रोत्साहित करना चाहते हैं, किंतु देश के किसानों को लाभकारी मूल्य देना नहीं चाहते ? ऐसी इच्छाएं देश की खाद्य सुरक्षा को जान-बूझकर संकट में डालने जैसी लगती हैं। ऐसे एक सौ पिछड़े जिलों में दालों के उत्पादन का दायरा बढ़ाकर और दालों के बीजों की किस्में सुधार कर पैदावार बढ़ाने के उपाय दाल उत्पादन में आत्मनिर्भरता तो बढ़ाएंगे ही, निर्यात के द्वार भी भविषय में खुलेंगे।
प्रमोद भार्गव