आर्थिकी

सेमीकंडक्टर मिशन भारत को ‘उपभोक्ता’ से ‘निर्माता’ बनाने की दिशा में अहम कदम

रामस्वरूप रावतसरे

     भारत पिछले कुछ वर्षों से केवल एक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने तक सीमित नहीं रहना चाहता बल्कि वह दुनिया के एडवांस टेक्नोलॉजी मैप पर अपनी मजबूत पहचान बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सेमीकंडक्टर से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग तक दुनिया भर में चल रही टेक्नोलॉजी की दौड़ में अब भारत भी तेजी से अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है और इसमें गुजरात अहम भूमिका निभा रहा है।


     जानकारी के अनुसार अब इसी दिशा में गुजरात के धोलेरा में देश की पहली मिनी/माइक्रो एलईडी डिस्प्ले फैब यूनिट स्थापित होने जा रही है। केंद्र सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। इस प्रोजेक्ट के तहत क्रिस्टल मैट्रिक्स लिमिटेड धोलेरा में लगभग 3068 करोड़ के निवेश से गैलियम नाइट्राइड आधारित मिनी/माइक्रो-एलइ्रडी डिस्प्ले फैब्रिकेशन फैसिलिटी स्थापित करेगी। अब तक भारत में इस तरह की एडवांस डिस्प्ले टेक्नोलॉजी का निर्माण नहीं होता था और देश को इसके लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहना पड़ता था। खासकर चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देश इस क्षेत्र में आगे रहे हैं। अब भारत पहली बार स्थानीय स्तर पर ऐसी तकनीक विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।


    सरकार द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, धोलेरा की यह फैसिलिटी हर साल 72,000 स्क्वेयर मीटर मिनी/माइक्रो एलईडी डिस्प्ले पैनल्स और 24,000 सेट आरजीबी वेफर्स का उत्पादन कर सकेगी। यानी यह सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं, बल्कि ऐसी औद्योगिक क्षमता है जो अगले दशक की कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स इकोनॉमी में भारत को और मजबूत स्थिति दिला सकती है। इसके साथ ही हजारों हाई-टेक नौकरियाँ पैदा होंगी और स्थानीय युवाओं को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नए अवसर मिलेंगे। जानकारों के अनुसार फिलहाल दुनिया के अधिकांश डिवाइसेज में एलसीडी या ओएलईडी स्क्रीन का इस्तेमाल होता है, लेकिन मिनी/माइक्रो एलईडी डिस्प्ले इनके मुकाबले ज्यादा ब्राइटनेस, बेहतर कॉन्ट्रास्ट, कम बिजली खपत और लंबी लाइफ-साइकिल प्रदान करते हैं। खासकर माइक्रो-एलईडी टेक्नोलॉजी को भविष्य के डिवाइसेज के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह फोल्डेबल डिस्प्ले, ऑटोमोटिव डैशबोर्ड, ऑगमेंटेड रियलिटी ग्लासेस और अल्ट्रा-प्रीमियम टीवी के लिए आदर्श मानी जाती है।


इस पूरे प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गैलियम नाइट्राइड टेक्नोलॉजी है। आमतौर पर सेमीकंडक्टर निर्माण में सिलिकॉन आधारित तकनीक का उपयोग किया जाता है, लेकिन जीएएन को अगली पीढ़ी का हाई-परफॉर्मेंस सेमीकंडक्टर मटेरियल माना जा रहा है। जीएएन  तेज गति से पावर ट्रांसफर कर सकता है, कम गर्मी पैदा करता है और ज्यादा ऊर्जा-कुशल होता है, इसलिए इसका उपयोग केवल डिस्प्ले टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स, 5जी इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस कम्युनिकेशन सिस्टम्स में भी तेजी से बढ़ रहा है। यानी धोलेरा का यह प्रोजेक्ट केवल स्क्रीन निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत को कंपाउंड सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में प्रवेश दिलाने वाला कदम भी माना जा रहा है।


भारत के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती रही है। क्योंकि स्मार्टफोन से लेकर ऑटोमोबाइल और डिफेंस सिस्टम्स तक लगभग हर क्षेत्र में सेमीकंडक्टर और एडवांस डिस्प्ले कंपोनेंट्स की जरूरत पड़ती है। ऐसे में देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करना केवल आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी बन गया है। धोलेरा में बनने वाला यह मिनी/माइक्रो एलईडी फैब यूनिट इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत अब केवल इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबल करने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि भविष्य की तकनीकों के मूलभूत कंपोनेंट्स भी देश में ही तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।


सेमीकंडक्टर या डिस्प्ले फैब्रिकेशन जैसे शब्द आम लोगों को अक्सर काफी तकनीकी लगते हैं, लेकिन वास्तव में इन तकनीकों का सीधा संबंध रोजमर्रा की जिंदगी से है। आने वाले समय में स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, वियरेबल डिवाइसेज और एआर/वीआर प्रोडक्ट्स में जो एडवांस डिस्प्ले देखने को मिलेंगे, वही तकनीक अब भारत में बनाने की तैयारी की जा रही है।


पिछले कुछ वर्षों में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे शब्द लगातार चर्चा में हैं, लेकिन धोलेरा का यह प्रोजेक्ट दिखाता है कि यह विजन अब जमीन पर भी दिखाई देने लगा है। क्योंकि आत्मनिर्भरता केवल आयातित उत्पादों को असेंबल करने से नहीं आती, बल्कि तब आती है जब कोई देश कोर टेक्नोलॉजी में अपनी खुद की निर्माण क्षमता विकसित करता है।


धोलेरा का यह मिनी/माइक्रो एलईडी फैब यूनिट उसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह प्रोजेक्ट भारत को भविष्य की डिस्प्ले टेक्नोलॉजी, कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में नई पहचान दिला सकता है।
जानकारों के अनुसार एक समय था जब ऐसी अत्याधुनिक तकनीक केवल अमेरिका, ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों तक सीमित मानी जाती थी। अब भारत भी उसी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी मजबूत जगह बनाने की कोशिश कर रहा है और धोलेरा में बनने वाली यह फैसिलिटी शायद उस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक बन सकती है। अब तक भारत ऐसी स्क्रीन खरीदने वाला देश था लेकिन धोलेरा में बनने वाली यह फैसिलिटी भारत को ‘उपभोक्ता’ से ‘निर्माता’ बनाने की दिशा में एक बड़ी कड़ी साबित हो सकती है।

रामस्वरूप रावतसरे