— बोधार्थी रौनक
शहर के टाउन-हॉल के पास स्थित
विख्यात विश्वविद्यालय में
“गांधी की प्रासंगिकता” पर
तीन दिन का भव्य सरकारी सेमिनार चल रहा था।
देश के कोने-कोने से आए प्रखर विद्वान,रेशमी कुर्तों और चमकदार सूटों में,मंच की शोभा बढ़ा रहे थे।
भारत में वाक्पटु वक्ताओं की कमी नहीं-यह तथ्य वहाँ बार-बार सिद्ध हो रहा था। बाहर रंगीन बैनर हवा में लहरा रहे थे,अंदर ए.सी. की ठंडी हवा बह रही थी।
नाश्ते में बारह तरह के विदेशी व्यंजन,
और हर आधे घंटे पर
चाय-कॉफ़ी की नई खेप।
सभागार में
गांधी हर दस मिनट में
ज़िंदा किए जा रहे थे-
तालियों के बीच,
माइक की गूँज में,
और पावर-पॉइंट की स्लाइडों पर।
कॉफ़ी के कपों में आदर्श घुल रहे थे,
और परदों पर सत्य चमक रहा था।
एक वक्ता बोले-
“आज गांधी का स्वदेशी,
शरीर-श्रम
और सर्वधर्म-समभाव
हमारे युग के लिए
अत्यंत प्रासंगिक हैं।”
दूसरे वक्ता ने अहिंसा की
इतनी परतें खोल दीं
कि लगता था
गांधी स्वयं भी
इतनी दूर तक
न पहुँचे होंगे।
तीसरे ने सर्वोदय पर
लंबा विवेचन किया-
उपमाओं और उदाहरणों से
पूरा सभागार भर दिया।
फिर सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह,
अस्वाद, निर्भीकता, ब्रह्मचर्य
अस्पृश्यता-उन्मूलन
और सादगी-
एक-एक कर
गांधी के विचार
मंच से झरते रहे।
तालियाँ बजती रहीं,
माइक गरजते रहे,
और गांधी
शब्दों में बदलते रहे।
उसी समय,
हॉल से थोड़ी दूर
एक फुटपाथ पर
दिलीप साव काम कर रहा था।
न कोई पोस्टर,
न कोई माइक।
बस गिरे हुए प्लास्टिक,
भूखे बच्चे
और थकी हुई औरतें।
वह किसी बच्चे को पढ़ा रहा था,
किसी के ज़ख़्म पर पानी डाल रहा था,
किसी को अपनी रोटी का
आधा हिस्सा दे रहा था।
कभी कचड़ा उठा रहा था ।
किसी ने उसका नाम नहीं पूछा।
लोगों ने बस इतना कहा—
“अजीब आदमी है।”
शाम को संगोष्ठी समाप्त हुई।
महँगे-महँगे मोमेंटो बाँटे गए,
कंधों पर रंगीन शॉल डाले गए।
विद्वान बाहर निकलते हुए- एक वक्ता ने कहा-“अरे प्रधान जी,
आप भी उस महाराष्ट्र वाले सेमिनार में थे न?”“कौन सा?”
प्रधान जी ने पूछा।“अरे वही-
‘प्रेमचंद के फटे जूतों की प्रासंगिकता’!” विषय पर जो हुआ था …“हाँ-हाँ…” पहले वाले ने कहा “उसका यात्रा-भत्ता
अभी तक खाते में नहीं आया।”
प्रधान जी ने कहा.. 2 दिन बाद आ जाएगा …और सब
अपने-अपने घर चले गए।
उसी दिन
किसी ने दिलीप साव जब सफाई अभियान पर था किसी ने
पीछे से उसे धक्का दे दिया।
एक चाकू चमका।
सड़क पर खून फैल गया।
मरते हुए उसने
बस इतना कहा-“गांधी मरते नहीं…
बस… बार-बार मारे जाते हैं…”
अगले दिन हर
अख़बार में
सेमिनार की तस्वीरें थीं-
गांधी की प्रासंगिकता पर वक्ताओं के
लंबे-लंबे वक्तव्य थे…
दिलीप साव
किसी अख़बार में नहीं था।