समाज

सोशल मीडिया : कितने दृष्टिकोण

डॉ. नीरज भारद्वाज

मीडिया शब्द सुनते ही लोगों का आकर्षण बढ़ जाता है। कोई भी छोटी-बड़ी बात एक बार मीडिया अर्थात समाचार चैनल या समाचारपत्रों में आ जाए फिर तो मानो उसे बात को पंख लग जाते हैं और पल-पल वह अपना स्वरूप बदलकर अलग-अलग अंदाज में लोगों के पास पहुंचना शुरू हो जाती है। मीडिया अर्थात मीडियम (माध्यम) किसी बात को जन तक पहुंचाने का एक साधन, अब इस मीडिया शब्द के साथ एक सोशल शब्द भी जुड़ गया है, जिसे हम सोशल मीडिया कहते हैं।कहने का भाव है कि मीडिया मुख्य हुआ सोशल मीडिया एक अन्य स्वरूप है। दूसरे दृष्टिकोण से समझे तो मीडिया जानकारी देता है, उसकी बातों को न्याय के क्षेत्र में कितना माना जाता है या नहीं माना जाता, यह भी समझने की बात है।

वर्तमान स्थिति में सामान्य जन मीडिया से अधिक सोशल मीडिया से सीधा जुड़ा हुआ है। वह सोशल मीडिया को जानकारी के साधन के साथ-साथ एक हथियार के रूप में प्रयोग भी कर रहा है। बहुत सारी बातें या घटनाएं जो कुछ ही मिनट में समाप्त हो सकती थी अर्थात क्षमा, माफी, दया, दान आदि करने से उनका अस्तित्व ही समाप्त हो सकता था लेकिन वह घटनाएं बात का बतंगड़ बन जाती हैं, इस सोशल मीडिया के चलते। कोई झुकने को तैयार नहीं होता। सोशल मीडिया का एक पक्ष उसकी वीडियो या उसे लाइव अपने अकाउंट से दिखाकर सामने वाले को बदनाम करने में देर नहीं लगता है. व्यक्ति गलतियों का पुतला है, यह कहावत गलत नहीं है।

किसी भी व्यक्ति को व्यक्तित्व तथा अपनी छवि बनाने में पूरा जीवन निकल जाता है। उसके पीछे उसका संघर्ष और कठिन परिश्रम छिपा होता है लेकिन सोशल मीडिया के कुछ अनकहे पहलू उन दिव्य छवियों को मिनटों में धूमिल करने का प्रयास करते हैं। अपनी नजर दौड़ा कर देखें तो सोशल मीडिया के चलते कितने ही ऐसी घटनाएं घटी हैं जिनमें लोगों को आरोपी बनाकर दिखाया गया। कुछ वर्षों बाद पता चलता है कि वह आरोपी या दोषी थे ही नहीं। ऐसे में क्या किया जाए? जब तक स्पष्टीकरण होता है दौर बदल चुका होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि किसी पर भी कीचड़ उछाल दिया जाए।

सोशल मीडिया जानकारी, मनोरंजन, बातचीत आदि का साधन बना, समझ में आता है। यह अदृश्य हथियार कैसे बन गया? यह समझ से परे है। दूसरी सबसे बड़ी बात इस सोशल मीडिया के चलते कब, कौन, किसकी चपेट में आ जाए, कुछ पता नहीं चलता। एक पक्ष से बना छोटा सा वीडियो या ऑडियो टेप कब किसे निगल जाए, यह गंभीरता से सोचने की बात है। कितने ही लोग सोशल मीडिया पर बदनामी के डर से शारीरिक, मानसिक शोषण को झेलते हैं और झेल भी रहे होंगे। कुछ तो मृत्यु के ग्रास भी बन जाते हैं।

कितने ही छोटे-बड़े आंदोलन या एजेंडा देश-विदेश में सोशल मीडिया के द्वारा ही चलाएं जाते हैं। कई बार वह सफल भी हो जाते हैं। आज पाठक वर्ग कम दर्शक वर्ग अधिक दिखाई दे रहा है। अधूरा ज्ञान विनाश का प्रतीक बना हुआ है। एक चित्र हजार शब्दों पर भारी पड़ता है, की बात सार्थक सिद्ध हो रही है। पढ़ने की बजाय आज का व्यक्ति देखने और सुनने को लालायित दिखाई देता है । सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी आज सोशल मीडिया पर 24 घंटे में से एक या दो घंटे जरूर दे रहा है। कुछ को तो इसकी भयंकर आदत पड़ चुके हैं।

मीडिया जहां जानकारी का खजाना है, लोकतंत्र का चौथा प्रमुख स्तंभ है, वहीं दूसरी ओर ऐसा भी लगता है कि सोशल मीडिया इस स्तंभ को हिलाने में लगा हुआ है। दूसरे शब्दों में जाने तो हर एक साधन के लाभ और हानि दोनों ही पक्ष हैं। आज बहुत सारे समाचार चैनलों के कार्यक्रमों में स्पेशल यही बात बताई जाती है कि यह वीडियो ठीक है या गलत(फेक) है अर्थात पत्रकारिता या मीडिया को सोशल मीडिया की जानकारी की भी जांच करनी पड़ रही है। पत्रकारिता अर्थात मीडिया अपना कार्य निष्पक्ष करता रहा है और आगे भी करता रहेगा।

डॉ. नीरज भारद्वाज