सौरभ वार्ष्णेय
अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से एक टिप्पणी की सामाजिक कल्याण के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। किसी भी अदालत के लिए लाखों लोगों की आस्था को गलत ठहराना मुश्किल है। समाज के विकास और प्रगतिशीलता के नाम पर किए जाने वाले सुधारों का उद्देश्य मानव जीवन को बेहतर बनाना होता है। लेकिन जब यही सुधार किसी धर्म की मूल संरचना, परंपराओं और आस्थाओं को प्रभावित करने लगते हैं, तब एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है—क्या सामाजिक कल्याण के नाम पर किसी धर्म को कमजोर या खोखला किया जा सकता है?
अगर हम इस टिप्प्णी को समझने की कोशिश करते हैं तो भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहां अनेक धर्म, परंपराएं और संस्कृतियां साथ-साथ विकसित हुई हैं, वहां यह सवाल और भी संवेदनशील हो जाता है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन, प्रचार और प्रसार करने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में सुधारों की प्रक्रिया को इस संवैधानिक संतुलन का सम्मान करना ही होगा। इतिहास गवाह है कि समाज में कई सुधार आवश्यक रहे हैं—चाहे वह सती प्रथा का उन्मूलन हो, बाल विवाह पर रोक हो या महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में उठाए गए कदम। इन सुधारों ने न केवल समाज को मानवीय बनाया, बल्कि धर्मों की आत्मा को भी शुद्ध किया। इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि हर सुधार धार्मिक हस्तक्षेप है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब सुधार के नाम पर किसी विशेष धर्म या समुदाय को लक्षित किया जाता है, या उसकी आस्थाओं को तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है। यह न केवल सामाजिक विभाजन को बढ़ाता है, बल्कि सुधारों के उद्देश्य को भी संदिग्ध बना देता है। सुधार यदि समानता, न्याय और मानवाधिकार के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित हों, तो वे स्वीकार्य होते हैं; लेकिन यदि उनमें राजनीतिक या वैचारिक पक्षपात झलकता है, तो वे विरोध को जन्म देते हैं।
सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि वे सुधार और आस्था के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाएं। सुधारों का लक्ष्य कुरीतियों को समाप्त करना होना चाहिए, न कि किसी धर्म की पहचान को कमजोर करना। साथ ही, धार्मिक समुदायों को भी आत्ममंथन के लिए तैयार रहना चाहिए, ताकि वे समय के साथ सकारात्मक बदलावों को स्वीकार कर सकें।
यह समझना आवश्यक है कि सामाजिक कल्याण और धार्मिक स्वतंत्रता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं—बशर्ते दोनों के बीच संतुलन और संवेदनशीलता बनी रहे। सुधार तब ही सार्थक होंगे जब वे समाज को जोडऩे का काम करें, न कि उसे विभाजित करने का।
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ में सीजेआई सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची जैसे न्यायमूर्ति अनुभवी हैं। इनकी अदालतों में कई ऐसे मामले आये होंगे। मामले की सुनवाई के दौरान 9 न्यायाधीशों की पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा अनु’छेद 25(2)(ख) और अनु’छेद 26(ख) के तहत किसी धार्मिक संस्था को अपने मामलों का प्रबंधन करने के अधिकार के बीच परस्पर संबंध पर दिए गए तर्कों को सुनते हुए यह टिप्पणी की। ज्ञात रहे कि अनु’छेद 25(2)(ख) राÓय को सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए कानून बनाने या सार्वजनिक हिंदू धार्मिक संस्थानों को हिंदुओं के सभी वर्गों और समुदायों के लिए खोलने की अनुमति देता है। त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से पेश होते हुए, सिंघवी ने तर्क दिया कि यद्यपि अनु’छेद 25(2)(ख) के तहत हिंदुओं के सभी संप्रदाय सार्वजनिक हिंदू धार्मिक संस्थान में प्रवेश की मांग कर सकते हैं, वहीं धार्मिक संप्रदाय को अनु’छेद 26(ख) के तहत आंतरिक अनुष्ठानों के संचालन को विनियमित करने का अधिकार होगा। उन्होंने अनु’छेद 25(2)(ख) और अनु’छेद 26(ख) की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या की वकालत की।
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने भी इस बात से सहमति जताते हुए कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम सामाजिक सुधार का एक उदाहरण हो सकता है। इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की, सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर आप धर्म को खोखला नहीं कर सकते।
आखिरकार सबरीमाला मामला क्या है ?
केरल के सबरीमाला मंदिर को लेकर चला विवाद केवल एक धार्मिक परंपरा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारत के संविधान, लैंगिक समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन की एक जटिल परीक्षा बन चुका है। सदियों पुरानी मान्यता के अनुसार, भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है। इसी आधार पर 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया था। समर्थकों का तर्क है कि यह परंपरा धार्मिक आस्था से जुड़ी है, जिसमें हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
दूसरी ओर, विरोधियों का कहना है कि यह प्रतिबंध महिलाओं के मौलिक अधिकारों—विशेषकर समानता और गरिमा—का उल्लंघन है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला 2018 में आया। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया। अदालत ने कहा कि धर्म के नाम पर किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है और महिलाओं को भी समान अधिकार मिलने चाहिए।
फैसले के बाद केरल सहित देशभर में व्यापक विरोध-प्रदर्शन हुए। कई श्रद्धालुओं ने इसे आस्था पर आघात बताया, जबकि महिला अधिकार समूहों और प्रगतिशील वर्गों ने इसे एक बड़ी जीत के रूप में देखा। यह विवाद केवल धार्मिक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन गया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को व्यापक संदर्भ में—अन्य धार्मिक प्रथाओं के साथ—बड़ी पीठ को सौंप दिया। फिलहाल कानूनी स्थिति जटिल बनी हुई है और अंतिम स्पष्टता का इंतजार है।
सबरीमाला मामला यह सवाल उठाता है कि क्या परंपराएं समय के साथ बदलनी चाहिए, या उन्हें यथावत बनाए रखना चाहिए। लोकतंत्र में आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि संविधान के मूल सिद्धांत—समानता, स्वतंत्रता और गरिमा—सर्वोपरि रहें। समाधान टकराव में नहीं, संवाद में है। समाज, न्यायपालिका और धार्मिक संस्थाओं को मिलकर ऐसा रास्ता निकालना होगा, जो आस्था को भी सम्मान दे और अधिकारों को भी सुरक्षित रखे।
सौरभ वार्ष्णेय