समाज

आस्था और अंधविश्वास के बीच समाज की सजगता आवश्यक

भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता उसकी आध्यात्मिक परंपरा, नैतिक जीवन-मूल्य और ज्ञान की समृद्ध विरासत रही है। ऋषि-मुनियों ने सत्य, विवेक, तर्क और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया। समय-समय पर जब समाज में अंधविश्वास, कुरीतियां और पाखंड बढ़े, तब अनेक महापुरुषों ने उनका विरोध कर समाज को नई दिशा प्रदान की। उन्नीसवीं शताब्दी में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना इसी उद्देश्य से की थी कि समाज वेदों के मूल संदेश को समझे, अंधविश्वास से मुक्त हो तथा सत्य और विवेक का अनुसरण करे। उनके विचारों का प्रभाव पूरे देश में दिखाई दिया और सामाजिक जागरण का एक नया अध्याय प्रारंभ हुआ।
आज, एक बार फिर समाज के सामने वैसी ही चुनौती दिखाई दे रही है। पिछले कुछ वर्षों में अनेक स्वयंभू बाबा, चमत्कारों के दावे करने वाले कथित संत तथा धर्म के नाम पर लोगों की भावनाओं का दोहन करने वाले व्यक्तियों की संख्या बढ़ती हुई दिखाई देती है। इनकी चमक-दमक, भव्य आयोजन, आधुनिक प्रचार-प्रसार के साधन और सोशल मीडिया का प्रभाव अनेक लोगों को आकर्षित करता है। परिणामस्वरूप अनेक भोले-भाले लोग इनके प्रभाव में आकर आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से प्रभावित हो जाते हैं।
चिंता का विषय यह भी है कि कुछ लोग धर्मग्रंथों, वेदों और पुराणों की अपनी सुविधानुसार व्याख्या कर समाज में भ्रम उत्पन्न करने का प्रयास करते हैं। भारतीय संस्कृति के आदर्श प्रतीकों मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम तथा योगेश्वर श्रीकृष्ण के जीवन-दर्शन को भी तर्कहीन और संदर्भहीन ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। इससे नई पीढ़ी के मन में अनावश्यक भ्रम उत्पन्न हो सकता है। किसी भी धर्मग्रंथ की व्याख्या प्रामाणिक ज्ञान, अध्ययन और परंपरा के आलोक में ही होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत प्रसिद्धि या आर्थिक लाभ के उद्देश्य से।
सबसे अधिक चिंता तब होती है जब कुछ लोग स्वयं को ईश्वर का अवतार या भगवान घोषित कर लोगों की आस्था का लाभ उठाने लगते हैं। भारतीय संस्कृति में संत का स्थान अत्यंत ऊँचा माना गया है, किंतु संत वही है जिसका जीवन त्याग, सेवा, संयम, विनम्रता और लोककल्याण के लिए समर्पित हो। जो व्यक्ति अहंकार, वैभव, व्यक्तिपूजा और अंधभक्ति को बढ़ावा दे, उसके प्रति समाज को विवेकपूर्ण दृष्टि अपनानी चाहिए।
आज प्रचार-प्रसार का स्वरूप भी बदल चुका है। करोड़ों रुपये विज्ञापनों, डिजिटल माध्यमों और भव्य आयोजनों पर व्यय किए जाते हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इतने विशाल आर्थिक संसाधनों का स्रोत क्या है और उनका उपयोग किस प्रकार हो रहा है। यदि किसी धार्मिक या आध्यात्मिक संस्था के पास बड़ी मात्रा में धन का प्रवाह है, तो उसके वित्तीय लेन-देन में पूर्ण पारदर्शिता और विधिसम्मत जवाबदेही सुनिश्चित होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की सामान्य अपेक्षा है। इससे वास्तविक सेवा कार्य करने वाली संस्थाओं की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि कभी-कभी विभिन्न राजनीतिक दल या नेता अल्पकालिक राजनीतिक लाभ अथवा वोट बैंक की राजनीति के कारण ऐसे प्रभावशाली व्यक्तियों से निकटता रखते दिखाई देते हैं। लोकतंत्र में सभी को अपने धार्मिक विश्वास रखने का अधिकार है, किंतु शासन और राजनीति का दायित्व यह भी है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू हो तथा किसी भी व्यक्ति को उसके प्रभाव, लोकप्रियता या अनुयायियों की संख्या के आधार पर विशेष संरक्षण न मिले।
समाज को भी आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। आस्था हमारी शक्ति है, किंतु अंधविश्वास हमारी कमजोरी बन सकता है। श्रद्धा का अर्थ विवेक का परित्याग नहीं है। सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को सत्य, नैतिकता, सेवा, करुणा और राष्ट्रहित की प्रेरणा दे। इसलिए प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह किसी भी व्यक्ति या संस्था के दावों को आँख बंद करके स्वीकार करने के बजाय ज्ञान, तर्क और शास्त्रसम्मत विचार के आधार पर परखे।
महर्षि दयानन्द सरस्वती का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। यदि हम उनके बताए सत्य, विवेक और सामाजिक जागरण के मार्ग पर चलें, तो समाज को पाखंड, अंधविश्वास और भ्रम से मुक्त कर एक जागरूक, संस्कारित और सशक्त भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
-सुरेश गोयल धूप वाला