लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

Posted On by &filed under विविधा.


विजय कुमार

जब समाचार पत्र अरबों-खरबों रुपये के घोटालों से भरे हों, तो एक चश्मे की चोरी कुछ अर्थ नहीं रखती। इसलिए इस पर किसी का ध्यान नहीं गया कि दिल्ली में अति सुरक्षित राष्ट्रपति निवास के पास स्थित ग्यारह मूर्ति से गांधी जी का चश्मा चोरी हो गया।

यह दिल्ली का एक प्रसिद्ध स्थान है। यहां एक विशाल शिला पर ग्यारह मूर्तियां बनीं हैं। इनमें गांधी जी के पीछे भारत के विभिन्न समुदायों के लोग प्रदर्शित किये गये हैं। यह मूर्ति उस मान्यता की प्रतीक है, जिसके अनुसार स्वाधीनता आंदोलन में गांधी जी के पीछे सभी धर्म और वर्ग के लोग एकजुट होकर चल दिये थे।

पर एक खोजी पत्रकार ने यह समाचार छाप दिया कि गांधी जी की मूर्ति पर चश्मा नहीं है। पुलिस का कहना है कि चश्मा पिछले छह साल से गायब है। थाने में इसकी रिपोर्ट भी लिखी है; पर न किसी ने चोर को ढूंढने का प्रयास किया और न ही नया चश्मा लगाने का। तब से बेचारे गांधी जी बिना चश्मे के ही खड़े हैं।

वैसे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि मूर्ति की आंख पर चश्मा है या नहीं। न जाने कितनी मूर्तियां खुले में आंधी-पानी सहती हैं और उन पर पक्षी न जाने क्या-क्या कर देते हैं। कुछ लोग मूर्ति लगाकर जमीन कब्जाने का धन्धा भी करते हैं; पर यदि मूर्ति गांधी जी की हो, तब बात सामान्य नहीं रह जाती।

जो लोग चश्मा लगाते हैं, वे ही उसकी अनिवार्यता समझ सकते हैं। बेचारे गांधी जी छह साल से बिना चश्मे के खड़े हैं, यह सोचकर मेरा हृदय द्रवित हो उठा; पर मैं ठहरा भारत का एक सीधा-सादा नागरिक। पुलिस वालों से इस बारे में कुछ पूछना खतरे से खाली नहीं था। कहीं वे मुझे ही पकड़कर थाने में न बैठा लें। इसलिए मैंने इस बारे में गांधी जी से ही मिलना उचित समझा।

अगले दिन मैं ग्यारह मूर्ति पर जा पहुंचा। आसपास देखा, सब अपने में मस्त और व्यस्त थे। मूर्ति के पास कोई सिपाही भी नहीं था। अतः मैं शिला पर जा चढ़ा। एक बार तो यह देखकर सब मूर्तियां चौंकीं; पर मेरे पास कागज, कलम, कैमरा आदि देखकर वे फिर से मूर्तिवत हो गयीं। मैंने गांधी जी से बात प्रारम्भ की।

– बापू, इतने सालों से आप यहां खड़े हैं, कैसा लगता है ?

– लगना क्या है; सब मूर्तियांे की तरह मैं भी हूं। बस यही बहुत है कि मूर्तियों में आज भी मैं सबसे आगे ही हूं।

– सुना है आपका चश्मा पिछले छह साल से गायब है, इससे आपको आसपास देखने में कष्ट होता होगा ?

– नहीं, मुझे कुछ कष्ट नहीं है। मैंने तो स्वाधीनता मिलने से पहले ही आसपास देखना बंद कर दिया था।

– क्यों ?

– पूरा देश जानता है कि जवाहर लाल नेहरू को मैंने ही कांग्रेस का नेता, अपना उत्तराधिकारी और प्रधानमंत्री बनाया था; पर उसने मेरी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ को ही कूड़े में डाल दिया। मैंने कांग्रेस को भंग करने को कहा था; पर उसने सत्ता के लिए कांग्रेस को ही सीढ़ी बना लिया। अपने सपनों को मरते देखने से क्या लाभ है ? इसलिए मैंने अपने एक बंदर की बात मानकर आंखें बंद कर लीं।

– तो आप किसी और को चुन लेते। आपकी बात कौन टालता ?

– बात तो तुम ठीक कहते हो। जनता और कांग्रेस वाले भी नेहरू की बजाय पटेल के पक्ष में थे; पर अब गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या लाभ। इतिहास की घड़ी को उल्टा नहीं घुमाया जा सकता।

– पर बापू, शासन के लिए आपके चश्मे का प्रबन्ध करना क्या कठिन है। देश में मूर्तिकारों की कमी नहीं है। आप कुछ कहते क्यों नहीं ?

– अब इस उम्र में नया चश्मा बनवा कर मैं करूंगा भी क्या ? मैंने कांग्रेस में सर्वेसर्वा होते हुए भी न स्वयं कोई पद लिया और न अपने बच्चों को लेने दिया; पर आज तो कांग्रेस खानदानी पार्टी बन गयी है। उसकी देखादेखी बाकी सब दलों का भी यही हाल हो गया है।

– हां बापू, हमारा लोकतंत्र सचमुच राजतंत्र ही बन गया है।

– इतना ही नहीं। विदेशियों को निकालने के लिए मैंने और भारत के लाखों लोगों ने जेल की यातनाएं सहीं; पर आज देश की असली कमान फिर एक विदेशी के ही हाथ में है; और इसके लिए वह मेरे नाम का सहारा लिये है। यदि मैं मूर्ति न होता, तो फिर आंदोलन करने के लिए सड़क पर उतर पड़ता।

– लेकिन आपका चश्मा ?

– तुम चश्मे की बात क्यों कर रहे हो ? चश्मा लगाते ही मुझे हर ओर फैला भ्रष्टाचार दिखने लगेगा। मेरे समय में लोग पांच रुपये लेते हुए डरते थे। अब करोड़ों रुपये पचाकर भी डकार नहीं लेते। पहले लोग कहते थे कि हम बाल-बच्चे वाले हैं, रिश्वत नहीं लेंगे। अब कहते हैं कि हम रिश्वत नहीं लेंगे, तो बच्चों को पालेंगे कैसे ? बोफोर्स से लेकर संचार घोटाले तक, सब तरफ उन्हीं के मुंह काले हो रहे हैं, जो मेरा नाम लेकर सत्ता में आते हैं। सरकारी कार्यालयों में मेरे चित्र के सामने ही यह लेन-देन होता है। इसे न देखना ही अच्छा है। यदि मैं जीवित होता, तो आत्महत्या कर लेता।

– पर चाहे जो हो, मैं आपके चश्मे का प्रबन्ध करके ही रहूंगा।

– नहीं, नहीं। तुम तो किसी तरह मेरी आंखें और कान फोड़ने का प्रबन्ध कर दो। इससे यह दुर्दशा देखने और सुनने से तो बचूंगा।

– क्षमा करें बापू। मैं यह पाप नहीं कर सकता।

इतना कहकर मैं लौट आया; पर बापू को विश्वास है कि जैसे किसी ने चश्मा चुराकर उनके कष्ट कम किये हैं, वैसे ही कोई उनके कान भी जरूर फोड़ेगा। हे राम।

One Response to “व्यंग्य: गांधी जी का चश्मा”

  1. एल. आर गान्धी

    lrgandhi

    वैसे भी अक्ल के अंधों को चश्मा नहीं सुहाता !
    बहुत ही सुन्दर व्यंग के लिए साधुवाद. … उतिष्ठकौन्तेय

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *