राजनीति

धरने-प्रदर्शनजीवियों के लिए सख्त प्रोटोकाल आवश्यक

    आजकल धरने-प्रदर्शन किसी समस्या अथवा अव्यवस्था पर शासन-प्रशासन का ध्यान दिलाने से अधिक राजनीतिक स्वार्थ एवं महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के माध्यम बनते जा रहे हैं। धरने प्रदर्शनों के नाम पर समाज एवं राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। ऐसे में सामान्य नागरिकों के जीवन एवं सुरक्षा के अधिकार की रक्षा हेतु यह आवश्यक है कि धरने प्रदर्शनों पर सख्त प्रोटोकॉल बनें। एक बड़ी विडंबना यह भी होती जा रही है कि कुछ लोग धरना-प्रदर्शन करते हुए कभी किसी के इस्तीफे की मांग करते हैं तो कभी कहीं भी डेरा डालकर बैठ जाते हैं, क्या इस प्रकार के कृत्य लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर नहीं कर रहे हैं? धरने- प्रदर्शनजीवी, आंदोलनजीवी, नारेजीवी, सुधारजीवी अथवा तथाकथित परिवर्तनजीवी इन सबका एक वर्ग बन चुका है। उनके मूल में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी भी है। प्रश्न तो यह भी है कि क्या इस प्रकार के आंदोलन और प्रदर्शनजीवियों में भारत भाव है?
  दुनिया में भारत की नई पहचान बनती जा रही है। भारतवर्ष दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारतीय संविधान में नागरिकों को सहमति-असहमति अथवा समर्थन और विरोध का अधिकार भी दिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की आजादी के साथ-साथ किसी विषय पर शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन का भी अधिकार देता है, लेकिन उनके मूल में शांतिपूर्वक की अनिवार्यता है। ध्यान रहे संविधान प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित और सम्मानपूर्वक जीवन का भी अधिकार देता है। क्या विगत कुछ वर्षों से हो रहे विरोध प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारी संविधान की इस भावना का पालन कर रहे हैं? क्या केवल  अधिकारों की आड़ में धरने-प्रदर्शनों के नाम पर हिंसा, आगजनी, सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और अराजकता अन्य नागरिकों के जीवन के अधिकारों से खिलवाड़ नहीं है। ध्यान रहे पुलिस और सेना व्यवस्था को बनाने और सुरक्षित वातावरण हेतु हैं लेकिन विरोध प्रदर्शनों के बहाने हिंसा पर उतारू भीड़ से निपटने के लिए उनके पास डंडे और गोली चलाने के अतिरिक्त कौन से उपाय हैं? आज यह भी एक बड़ा प्रश्न अथवा चिंता का विषय समाज और राष्ट्र के सामने खड़ा है कि पुलिस और सेना के साथ हिंसक झड़प और मारपीट कहां तक जायज है? क्या पुलिस और सेना के जवान इस देश के नागरिक नहीं है?
     विगत दिनों राष्ट्रीय राजधानी में नीट पेपर लीक और परीक्षा में अन्य अनियमितताओं के विरोध में जंतर मंतर पर आंदोलन हुआ। कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जुलाई को संसद चलो मार्च निकाला। देखते ही देखते प्रदर्शनकारी उग्र हो गए। प्रदर्शन के लिए तमाम तरह की सीमाओं, पुलिस प्रबंधन और विरोध प्रदर्शन की नैतिकताओं को ताक पर रखते हुए इन प्रदर्शनकारियों द्वारा उपद्रव किया गया। बैरिकेडिंग और मनाही होने के बाद भी संसद में घुसने का प्रयास किया गया। आसपास खड़े दर्जनों वाहनों को क्षतिग्रस्त किया गया। सैकड़ों अधिकारियों एवं पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला किया गया। तदुपरांत सुरक्षाकर्मियों ने भीड़ को तितर बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। कुल मिलाकर कई दिन तक दिल्ली और जंतर मंतर छात्रों की आड़ में धरने- प्रदर्शन के लिए इकट्ठे हुए उपद्रवियों की गिरफ्त में रहे। सीसीटीवी कैमरों की फुटेज और पुलिस की जांच से यह पता चला है कि इस धरने-प्रदर्शन में हजारों कुख्यात अपराधी शामिल थे। इस पूरे प्रदर्शन में विपक्ष की भूमिका उजागर है। यह पूरी तरह से विपक्ष का राजनीतिक षड्यंत्र था। इस पूरे आयोजन के माध्यम से संसद में घुसने एवं दिल्ली व देश को अस्थिर करने की योजना थी। कई सूत्र इस धरने प्रदर्शन के लिए विदेश से पैसा मिलने की भी सूचना दे रहे हैं। विडंबना यह है कि इस  धरने-प्रदर्शन में समूचा विपक्ष उजागर रूप से सक्रिय भूमिका में रहा और कई नेताओं ने भड़काऊ भाषणों के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों की हौसला अफजाई की। यह प्रश्न यह भी उठता है कि क्या राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु जनप्रतिनिधियों को इस प्रकार के अराजक प्रदर्शनों में सम्मिलित होना चाहिए? क्या ऐसे जन प्रतिनिधियों पर दंडात्मक कार्रवाही नहीं होनी चाहिए? यदि संविधान  धरने-प्रदर्शन का अधिकार देता है तो क्या धरना स्थल के आसपास रहने वाले और आने जाने वाले लोगों के सुरक्षित जीवन का अधिकार नहीं देता?
       जंतर मंतर खगोलीय वेधशाला है। यह राष्ट्रीय विरासत है। इसे देखने देश- दुनिया के हजारों पर्यटक प्रतिदिन दिल्ली आते हैं। इसके पास ही लोकतंत्र का मंदिर संसद भवन है। जहां जनता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि जनकल्याणकारी योजनाओं एवं निर्णयों पर विचार करते हैं। विचारणीय यह भी है कि क्या जंतर मंतर जैसे राष्ट्रीय महत्व के स्थान पर धरने-प्रदर्शन होने चाहिए? क्या इससे इस राष्ट्रीय स्मारक की छवि धूमिल नहीं हो रही है?
     गौरतलब है कि जंतर मंतर पर हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में शांतिपूर्वक प्रदर्शनों को सुगम बनाने और असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाही के लिए एक समान प्रोटोकाल की आवश्यकता बताई है। शीर्ष अदालत ने प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमले पर भी चिंता व्यक्त की है। पीठ ने कहा है कि अगर कोई ज्यादती हुई है तो इसकी स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए। यह केवल दिल्ली का मामला नहीं है। प्रोटोकाल में एकरूपता जरूरी है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अनुशासन अहम है।
     विदित हो कि विगत वर्षों में समान नागरिक संहिता कानून और कृषि कानूनों के विरोध में देशव्यापी धरने-प्रदर्शन हुए। उस समय भी राष्ट्रीय राजधानी और आसपास के क्षेत्र इन विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बने। भिन्न-भिन्न रूपों में हिंसक झड़पे हुई। अराजकता का आलम यह था कि दिल्ली के बॉर्डर महीनों तक बंद पड़े रहे। छोटे बड़े कार्य-व्यवसाय ठप्प हो गए, तो समग्रता में आवाजाही पूरी तरह रोकी गई। यातायात वाहन, व्यावसायिक वाहन एवं पर्यटक वाहनों को रास्ता न मिलने के कारण दिल्ली और आसपास के राज्य बंधक बन गए व देश को हजारों करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हुआ। इन विरोध प्रदर्शनों में भी सैकड़ों पुलिसकर्मी जख्मी हुए और करोड़ों नागरिक लंबे समय तक प्रतिदिन परेशानियां उठते रहे। ऐसे मामलों में पुलिस और विभिन्न एजेंसियां मिलकर कड़ा परिश्रम करते हुए असामाजिक तत्वों की पहचान करती हैं लेकिन फिर समझौते के समय सरकारें झुक जाती हैं और मुकदमें वापस ले लिए जाते हैं जिससे उपद्रवियों के हौसले बढ़ते हैं। विगत दिनों जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में 2873 अपराधियों के सम्मिलित होने का समाचार है। इससे यह स्पष्ट है कि कई प्रदर्शनों में पैसा देकर भी ऐसे उपद्रवियों को हिंसा करने के लिए धरने-प्रदर्शनों में बुलाया जाता है। क्या यह स्थिति गंभीर नहीं है?
     जंतर मंतर पर हुए धरने प्रदर्शन के बाद  बिहार, झारखंड,पंजाब एवं मध्यप्रदेश आदि प्रदेशों में भी परीक्षाओं, परीक्षा परिणामों, विद्यालय- महाविद्यालयों की व्यवस्थाओं तथा अव्यवस्थाओं को लेकर दिन-प्रतिदिन विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे हैं। ऐसे में यह भी आवश्यक है कि जिस बात के लिए विरोध प्रदर्शन हो रहा है, उस विषय   की निष्पक्ष संस्था गंभीरता से जांच करें। वहां की कमियों को दूर करने के लिए व्यापक स्तर पर बदलाव किए जाएं और दोषियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। आज धरने प्रदर्शनों के नाम पर विभिन्न राजनीतिक दल श्रेय लेने की दौड़ में शामिल हो रहे हैं। मेरे सपनों का भारत नामक पुस्तक में गांधी जी ने कहा था- जो हड़ताल माली हालत की बेहतरी के लिए की जाती है, उसमें कभी अंतिम ध्येय के तौर पर राजनीतिक मकसद की मिलावट नहीं होनी चाहिए। ऐसा करने से राजनीतिक तरक्की कभी नहीं हो सकती बल्कि होता यह है कि अक्सर हड़तालियों को ही इसका नतीजा भुगतना पड़ता है।
    धरने-प्रदर्शनों की आड़ में आजकल कुछ अलग तरह का वातावरण दिखाई दे रहा है। कानून न बने तो नाराजगी, कानून बने तो नाराजगी। कहीं प्रतिमा लगाने को धरना तो कहीं प्रतिमा हटाने को धरना। कहीं पेपर करवाने को लेकर धरना, तो कहीं पेपर होने पर भ्रष्टाचार के कारण धरना- प्रदर्शन। विपक्ष द्वारा राजनीतिक स्वार्थों के लिए संसद के अंदर और बाहर हंगामा और प्रदर्शन यह संकेत दे रहे हैं कि भविष्य में इनके द्वारा पूरे देश में धरने प्रदर्शनों के जरिए अराजकता फैलाने के प्रयास किए जाएंगे। इस प्रकार की सोंच व वातावरण देश के विकास के लिए बाधक बन रहा है। धरने- प्रदर्शनों के नाम पर प्रतिदिन हजारों पुलिस और सेना के जवान तैनात होते हैं। आर्थिक गतिविधियों, पर्यटन और शैक्षणिक कार्यों में बाधा आती है।
    आज यह आवश्यक है कि शांतिपूर्वक धरने-प्रदर्शनों के मुद्दे पर व्यापक रूप से विचार हो। राज्य और केंद्र सरकार मिलकर ऐसा प्रोटोकाल तैयार करें जिससे धरने-प्रदर्शनों के कारण जनजीवन अस्त-व्यस्त न हो। धरने- प्रदर्शनों के लिए प्रोटोकाल तैयार करते समय धरने प्रदर्शन से पूर्व प्रशासनिक अनुमति की अनिवार्यता, प्रदर्शन में सम्मिलित होने वाले लोगों की संख्या, प्रदर्शन का स्थान व किसी भी प्रकार की हिंसा अथवा उपद्रव की स्थिति में आयोजकों पर अपराधिक मामले आदि  बातें अवश्य शामिल होनी चाहिए। धरने-प्रदर्शनों के नाम पर हिंसा और अराजकता करने वालों के लिए तत्काल और कठोर दंड के प्रविधान नितांत आवश्यक हैं।

डा.वेदप्रकाश