लेखक परिचय

आर के रस्तोगी

आर के रस्तोगी

जन्म हिंडन नदी के किनारे बसे ग्राम सुराना जो कि गाज़ियाबाद जिले में है एक वैश्य परिवार में हुआ | इनकी शुरू की शिक्षा तीसरी कक्षा तक गोंव में हुई | बाद में डैकेती पड़ने के कारण इनका सारा परिवार मेरठ में आ गया वही पर इनकी शिक्षा पूरी हुई |प्रारम्भ से ही श्री रस्तोगी जी पढने लिखने में काफी होशियार ओर होनहार छात्र रहे और काव्य रचना करते रहे |आप डबल पोस्ट ग्रेजुएट (अर्थशास्त्र व कामर्स) में है तथा सी ए आई आई बी भी है जो बैंकिंग क्षेत्र में सबसे उच्चतम डिग्री है | हिंदी में विशेष रूचि रखते है ओर पिछले तीस वर्षो से लिख रहे है | ये व्यंगात्मक शैली में देश की परीस्थितियो पर कभी भी लिखने से नहीं चूकते | ये लन्दन भी रहे और वहाँ पर भी बैंको से सम्बंधित लेख लिखते रहे थे| आप भारतीय स्टेट बैंक से मुख्य प्रबन्धक पद से रिटायर हुए है | बैंक में भी हाउस मैगजीन के सम्पादक रहे और बैंक की बुक ऑफ़ इंस्ट्रक्शन का हिंदी में अनुवाद किया जो एक कठिन कार्य था| संपर्क : 9971006425

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कलयुग में सब बदलने लगे है
सूरज,चाँद भी बदलने लगे है
ये भी अब मजे लेने लगे है
अपनी आदत बदलने लगे है
इंसान की तरह बदलने लगे है
एक दूजे को धोखा देने लगे है

“सूरज” की जरा  असलियत तो देखो,
सुबह सैर को निकलता है “किरन” के साथ
दोपहर को रहता है “रौशनी” के साथ
शाम को जाता है “संध्या” के साथ
सो जाता है वह “चाँदनी” के साथ
उठता है वह फिर “किरन” के साथ

चंदा को जरा चमकते हुये देखो,
निकलता है “चांदनी” के साथ
ले जाता है तारो की बारात
“चांदनी” को देता है सौगात
फिर हनीमून मनाता है उसके साथ
थक कर सो जाता है “तारा” के साथ

“वर्षा” के देखो जब वह आती है
“बिजली” उसे कडक कर डराती है
“रिम झिम” करके वह सताती है
पर प्यासे की प्यास वह बुझाती है
“बादल”भी उस को घुडकाता है
डर के मारे छिप जाती है “मेघ” के साथ 

“पृथ्वी” “सूर्य” के चक्कर काटने लगी है
उसको दिन और रात पटाने लगी है
अब तो उस पर डोरे डालने लगी है
“सूरज” से सौर उर्जा लेने लगी है
रात को “प्रकाश” वह देने लगी है
हर मौसम में उससे मजे लेने लगी है
सर्दी में गर्मी,गर्मी में सर्दी लेने लगी है

“चाँद” पृथ्वी के चक्कर काटने लगा है
उससे अब मोहब्बत करने लगा है
जब वह फस जाता है सूरज पृथ्वी के बीच
“राहू”उसको निगलने लगा है
मुसीबत के मारे तडफने लगा है
सोचने लगा वह सोयेगा किसके साथ

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