शख्सियत समाज

26/11 में सीने पर 8 गोलियां, खाने वाले सुनील जोधा का नाम अब ’’नासा’’ से जुड़ा


रामस्वरूप रावतसरे

राजस्थान के अलवर जिले के मुंडिया खेड़ा गांव से निकलकर देश की सुरक्षा के लिए जान की बाजी लगाने वाले एनएसजी कमांडो सुनील कुमार जोधा को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। 26/11 मुंबई आतंकी हमले के दौरान अद्भुत साहस दिखाने वाले इस जांबाज कमांडो का नाम अब भविष्य के मंगल मिशन से जुड़ गया है। नासा की पहल के तहत उनके नाम, फोटो और उपलब्धियों का विवरण एक माइक्रोचिप में सुरक्षित कर मंगल मिशन से जोड़ा गया है। यह उपलब्धि न केवल सुनील जोधा बल्कि पूरे राजस्थान के लिए गर्व का क्षण मानी जा रही है।
    जानकारी के अनुसार सुनील कुमार जोधा को रूस की स्पेस-टेक कंपनी जियो स्कैन की ओर से ईमेल के माध्यम से प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ। जानकारी के अनुसार उन्होंने वर्ष 2024 में अपना प्रोफाइल और उपलब्धियों का विवरण भेजा था। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनका नाम, बायोडाटा और फोटो अंगूठे के नाखून जितनी छोटी माइक्रोचिप में रिकॉर्ड कर मंगल मिशन से जुड़े यान के साथ भेजा गया। बताया जा रहा है कि राजस्थान से यह सम्मान पाने वाले वह पहले व्यक्ति हैं यह उपलब्धि उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है जो देश सेवा और विज्ञान दोनों क्षेत्रों को समान सम्मान की नजर से देखते हैं।
 सुनील कुमार जोधा, 26/11 मुंबई हमलों के एक ऐसे वीर सिपाही हैं, जिनकी बहादुरी आज भी देश को प्रेरित करती है। 17 साल पहले, जब देश पर आतंकी हमला हुआ, तब एनएसजी कमांडो सुनील जोधा ने अपनी जान की परवाह किए बिना आतंकवादियों का सामना किया। इस दौरान वे गोली का शिकार हुए, और एक गोली आज भी उनके दिल के पास फंसी हुई है, जिसे निकालना डॉक्टरों के लिए बहुत जोखिम भरा है। सुनील जोधा ने उस दिन 40-45 लोगों की जान बचाई थी।
    26 नवंबर 2008 को, जब सुनील जोधा एनएसजी की ट्रेनिंग पूरी करने ही वाले थे, उन्हें ऑपरेशन ब्लैक टॉरनेडो के लिए मुंबई भेजा गया। वे अपनी आर्मी की वर्दी में ही थे, और बस कमांडो की डंगरी पहनकर, जो भी बुलेटप्रूफ जैकेट मिली, उसे पहनकर वे ऑपरेशन के लिए निकल पड़े। दिल्ली से एक स्पेशल प्लेन से वे मुंबई पहुंचे। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की टीम का हिस्सा बनकर, सुनील जोधा सुबह 7 बजे ताज होटल में घुसे। खून से सने गलियारों में उन्होंने सबसे आगे रहकर 40-45 फंसे हुए मेहमानों को बाहर निकाला और सीधे आतंकवादियों से लोहा लिया। जब सुरक्षा टीम छठी मंजिल साफ कर रही थी, तभी आतंकवादियों ने गोलियां चलाईं। सुनील जोधा को आठ गोलियां लगीं। इसके बावजूद, वे सीढ़ियों पर बेजान पड़े रहे, ताकि गोलियों की बौछार से बच सकें। जब उनके साथियों को बचाने के लिए ग्रेनेड फेंका गया, तो उनके साथियों ने अपनी जान पर खेलकर उन्हें बचाया। भारी खून बहने के बावजूद, वे खुद चलकर एम्बुलेंस तक पहुंचे और फिर बेहोश हो गए।
      ऑपरेशन के बाद हुई सर्जरी में डॉक्टरों ने सात गोलियां निकाल दीं। लेकिन एक गोली उनके दिल के पास और ग्रेनेड के छर्रे आज भी वहीं हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इन्हें निकालना बहुत खतरनाक है। अस्पताल में चार दिन तक कोमा में रहने के बाद, जब सुनील जोधा को होश आया, तो उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी रेणु बाला राजपूत को फोन किया। उन्होंने कहा, ’’बच्चों से बात करा दो …. पता नहीं घर वापस आ पाऊंगा या नहीं।’’
   22 नवंबर 2025 को मुंबई में ग्लोबल पीस ऑनर्स सेरेमनी में, शाहरुख खान ने सुनील जोधा को सलाम करते हुए कहा, ’’सुनील जी, आप सिर्फ एक जीवित शहीद नहीं हैं। आप इस देश के लिए बहादुरी का मतलब समझाने वाले एक जीवित उदाहरण हैं।’’ जोधा ने अपनी पत्नी और बच्चों को मंच पर बुलाया और कहा कि यह सम्मान उनके बलिदान का भी है।
अलवर जिले के रहने वाले सुनील जोधा 2001 में आर्मी में भर्ती हुए थे और 2008 में एनएसजी  की 51 स्पेशल एक्शन ग्रुप के लिए चुने गए थे। जिस समय यह हमला हुआ था, उस समय उनके बेटे की उम्र सिर्फ ढाई महीने थी, और आज वह 17 साल का हो गया है। हर साल मुंबई उन्हें याद करती है और सम्मानित करती है।
मुंबई हमले में असाधारण साहस दिखाने के लिए वर्ष 2009 में भारतीय सेना ने उन्हें बहादुरी के सम्मान से नवाजा।  आज भी वह युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। वर्तमान में वह अपनी पत्नी रेनू बाला राजपूत और बेटों रचित व सक्षम के साथ दिल्ली में रहते हैं, जबकि उनके माता-पिता इंदर सिंह जोधा और लाजवंती अलवर के मुंडिया खेड़ा गांव में निवास करते हैं। परिवार के लिए यह सम्मान गर्व का विषय है।
     राजस्थान के वीर सैनिकों और जवानों की बहादुरी की कहानियां अक्सर देश को प्रेरित करती रही हैं। अब सुनील कुमार जोधा का नाम मंगल मिशन से जुड़ना इस गौरवशाली परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ता है। 26/11 के आतंकियों का डटकर मुकाबला करने वाले इस जांबाज कमांडो की कहानी बताती है कि देश सेवा का जज्बा सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका सम्मान धरती से लेकर अंतरिक्ष तक पहुंच सकता हैं यही वजह है कि अलवर से लेकर पूरे राजस्थान में इस उपलब्धि को गर्व और सम्मान के साथ देखा जा रहा है।रामस्वरूप रावतसरे