राजनीति

 लोकलुभावन योजनाओं पर शीर्ष न्यायालय के सवाल

संदर्भः शीर्ष न्यायालय ने सवाल किया, मुफ्त खाना मिलेगा तो लोग काम क्यों करेंगे ?
प्रमोद भार्गव
चुनावों के ठीक पहले राज्य सरकार द्वारा मुफ्त उपहारों और सब्सिडी की कड़ी में शीर्ष  न्यायालय ने सरकार से पुछा कि ‘यह संस्कृति कब तक जारी रहेगी ? इससे देश के दीर्घकालिक आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है। अतएव राज्यों को रोजगार देने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए न कि सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, मुफ्त आनाज, मुफ्त साइकिल और मुफ्त बिजली-पानी देने चाहिए ?‘ दरअसल इसी साल तमिलनाडु समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए मतदाता को लालच देते हुए तमिलनाडु सरकार ने सभी उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली देने की घोषणा कर दी है। इस घोषणा के विरुद्ध तमिलनाडु विद्युत वितरण निगम लिमिटेड द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष न्यायालय ने उक्त टिप्पणी की है। यह स्थिति तमिलनाडु में ही नहीं बल्कि सभी राज्यों में बनी हुई है। लोक लुभावन उपायों को राजनीतिक दलों और नेताओं ने चुनाव जीतने का मंत्र मान लिया है। इसी मंत्र के वशीभूत स्त्री मतदाताओं को लुभाने के लिए लाड़ली बहना जैसी योजनाएं मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार और महाराष्टर  में चुनाव जीतने का मंत्र बनी हैं। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि जिनके पास रोटी, कपड़ा और मकान के सभी साधन उपलब्घ हैं, मुफ्त योजनाओं का लाभ वे भी बटोरने में लगे हैं। गरीबी रेखा से ऊपर जीने वाले लोगों को लाभ देने से वंचित सरकारें इसलिए करना नहीं चाहती, क्योंकि ऐसे में मतदाता की नाराजी जीतने की गारंटी नहीं रह जाएगी। मतदाता को परजीवी बनाकर राज्य सरकारें लोगों को पराश्रित और खुद को खोखला करने में लगी हैं।  
  निर्वाचन लोक-पर्व के अवसर पर मुफ्त में तोहफे बांटे जाने की घोषणाएं सभी राजनीतिक दल बढ़ चढ़कर करते हैं। हालांकि निर्वाचन के बाद कुछ वादों को छोड़कर ज्यादातर वादे फरेब साबित होते हैं। बावजूद मतदाता को इस प्रलोभन में लुभाकर राजनीतिक दल और प्रत्याशी अपना स्वार्थ साधने में सफल हो जाते हैं। परंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने इन चुनावी रेवड़ियां बांटे जाने पर गंभीर चिंता जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मुफ्त के इन उपाहरों पर लगातार चिंता जताते रहे हैं। परंतु भाजपा भी चुनावों में रेवड़ियां बांटने के वादों से पीछे नहीं रही। लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्टर  और दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भाजपा की जीत के कारणों में इन वादों की भी अहम् भूमिका रही है। इन मुफ्त के उपहारों पर रोक इसलिए जरूरी है, क्योंकि इन लोक-लुभाव वादों के दो तरह के प्रभाव देखने में आते हैं। एक तो ये मतदाताओं के निश्पक्ष निर्णय को प्रभावित करते हैं और दूसरे, इन्हें पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब चुनाव नीतियों और कार्यक्रम की बजाय प्रलोभनों का फंडा उछालकर लड़े जाने लगे हैं। राजनेताओं की दानवीर कर्ण की यह भूमिका स्वतंत्र और निश्पक्ष चुनाव की जड़ों में मट्ठा घोलने का काम कर रही है। अपना उल्लू सीधा करने के लिए मतदाता को बरगलाना आदर्श चुनाव संहिता को ठेंगा दिखाने जैसा है। सही मायनों में वादों की घूस से निर्वाचन प्रक्रिया प्रदूषित होती है, इसलिए इस घूसखोरी को आदर्श आचार संहिता के दायरे में लाना जरूरी है। वैसे भी इन वादों की हकीकत जमीन पर उतरी होती तो देश में किसान आत्महत्या नहीं कर रहे होते ? पंजाब में किसान कल्याण के सबसे ज्यादा वादे अकाली दल ने सरकार ने किए थे, लेकिन पंजाब से लगातार किसान आत्महत्या की खबरें आ रही हैं। अफलातूनी वादों के उलट  हकीकत में अब  ज्यादा जरूरत शासन-प्रशासन को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की है। यह वादा ज्यादातर राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र से हमेशा गायब रहा है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी एक समय जरूर भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने की राह पर चली थी, लेकिन अपने तीसरे कार्यकाल में शराब नीति में घोटाले और शीश महल जैसे राजसी वैभव में डूब गई। आप ने बिजली दरें 50 फीसदी कम करने और हर परिवार को रोजाना 700 लीटर पानी मुफ्त मुहैया कराने के बुनियादी वादों के साथ चुनाव लड़ा और जीता भी, लेकिन सरकार की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। 2025 के विधानसभा चुनाव में आर्थिक स्थिति की बद्हाली और भृष्टाचार  अरविंद केजरीवाल की हार के प्रमुख कारण बने।  
देश में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने निर्धन परिवारों को मुफ्त में एक बत्ती कनेक्शन देने के वादे के साथ यह शुरूआत आठवें दशक में की थी। तमिलनाडू की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता ने तो चुनावी वादों का इतना बड़ा पिटारा खोल दिया था कि यह मामला जनहित याचिका के जरिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया था। इस याचिका में अन्नाद्रमुक की चुनावी घोषणा को भ्रष्ट  आचरण मानते हुए  असंवैधानिक ठहराने की मांग की गयी थी, लेकिन न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी थी। उस समय न्यायालय ने दलील दी थी कि घोषणा-पत्रों में दर्ज प्रलोभनों को भ्रष्ट  आचरण नहीं माना जा सकता है। चुनाव का नियमन जनप्रतिनिधित्व कानून के जरिए होता है और उसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत इसे गैरकानूनी या भ्रष्ट कदाचरण ठहराया जा सके। न्यायालय ने लाचारगी प्रकट करते हुए कहा था कि इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। लिहाजा इस मसले पर विचार कर कारगर निर्णय लेने का कोई कदम विधायिका ही उठा सकती है। अलबत्ता अदालत ने निर्वाचन आयोग को जरुर निर्देश दिया था कि वह चुनावी घोषणा-पत्रों को मर्यादित करने की दृश्टि से अतिवादी व लोक-लुभावन घोषणाओं को रेखांकित करे, जिससे आदर्श चुनाव संहिता का पालन हो सके।
इस परिप्रेक्ष्य में दुविधा यह है कि राजनीतिक दलों पर आयोग का अनुशासनात्मक नियंत्रण निर्वाचन की अधिसूचना जारी होने के बाद होता है, जबकि ज्यादातर घोषणा-पत्र इस अधिसूचना के पहले जारी हो जाते हैं और कई वादे तो नेता चुनावी आमसभाओं में आचार संहिता का मखौल उड़ाते हुए भी कर डालते हैं। यहां तक कि अल्पसंख्यक मुस्लिम और सवर्ण ब्राह्मणों तक को आरक्षण देने का वादे किए जाते रहे हैं। तिस पर भी विडंबना है कि आदर्श निर्वाचन संहिता के तहत न तो कोई दंडात्मक कानून है और न ही इसकी संहिताओं में वैध-अवैध की अवधारणाएं परिभाषित हैं। आयोग यदि संहिता को लागू कर पाता है तो इसलिए कि राजनीतिक दल उसका सहयोग करते हैं और जनमत की भावना आयोग के पक्ष में होती है। तय है दल यदि आयोग के साथ असहयोग करने लग जाएं तो आयोग हाथ पर हाथ धरे बैठा रह जाएगा। वैसे भी आयोग की जवाबदेही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की है, न कि दलों के चुनावी मुद्दे तय करने की ? बावजूद आयोग मामले संज्ञान में लेता है और उम्मीदवार को चेतावनी भी देता रहता है। लेकिन उम्मीदवार जानते हैं कि उनकी उम्मीदवारी को तत्काल खारिज करने का कोई अधिकार आयोग के पास नहीं है, इसलिए वे बेपरवाह रहते हैं।
इन विरोधाभासी हालातों से शीर्ष न्यायालय परिचित है। इसलिए वह मुफ्त की घोषणाओं  पर टिप्पणी कर शांत रह जाती है। दरअसल ऐसे मुद्दों पर विचार-विमर्श कर कानून बनाने का अधिकार विधायिका को ही है। यहां विडंबना है कि विधायिका और दल अंततः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रलोभन के जिन वादों के मार्फत मतदाता को बरगलाकर दल सत्ता के अधिकारी हुए हैं, उन वादों को घोषणा-पत्र में नहीं रखने का कानून बनाकर अपने ही हाथों, पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की गलती क्यों करेंगे ? यहां सवाल यह भी उठता है कि दल जो घोषणा करते हैं उनका लाभ वर्ग-भेद के बिना जरूरतमंदों को मिलता है। फिर चाहे वह छात्रवृत्ति हो, लैपटॉप हो, साइकिल हो अथवा टीवी ? मुफ्त बिजली हो, लाडली बहनों को नगद धनराशि देना या सस्ता राशन, इसमें कोई जातीय या धार्मिक भेद नहीं किया जाता। बीपीएल की सूची में आने वाले सभी जरूरतमंद इनके हकदार होते हैं। ऐसी स्थिति में मुफ्त उपहारों को विभाजित करना एक जटिल प्रक्रिया है। हां, जातीय तथा अल्पसंख्यक के आधार पर आरक्षण की घोषणा की जाती है तो इस स्थिति को जातीय अथवा सांप्रदायिक भेद की स्थिति माना जा सकता है ? 81 करोड़ लोगों को सस्ता अनाज देने की सुविधा को भरे पेट वाले गुलछर्रे उड़ा रहे लोग सरकारी धन का दुरुपयोग मानते हैं, जबकि एक कल्याणकारी राज्य के वंचित तबके के लिए ये सुविधाएं अनिवार्य जरूरत भी हैं। ऐसे में इन्हें एकाएक घूस या लालच नहीं कहा जा सकता ? अलबत्ता यह तथ्य जरूर सही है कि प्रलोभन मतदाता की नीयत को प्रभावित करता है और वह व्यापक सामाजिक हित की बजाय व्यक्तिगत हित को ध्यान में रखकर निर्णय लेने को मजबूर हो जाता है। जाहिर है, यह एक गंभीर मसला है और न्यायालय इस मुद्दे पर आगे बढ़ रही है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि कोई ऐसा हल जरूर निकले, जो सर्वमान्य होने के साथ लोक कल्याणकारी साबित होने के साथ, रोजगार देने का साधन बने ?