ताजा दल बदलिए से संवाद

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वे नख से शिख तक अलग ही भाव भंगिमा में लचकते- मटकते आते दिखे पर फिर भी उन्हें पहचानते देर न लगी। सोचा, चुनाव के दिनों में ठूंठ भी लहलहाने लगते हैं और ये तो ……

वे नजदीक आए तो वही निकले पर उनके सिर पर उस विरोधी दल की टोपी देख हैरत हुई जिसे वे आज से पहले सपने में भी उछाला करते थे।  पुराने दिमाग पर नए स्टाइल की टोपी देखी तो पूछ बैठा,‘ मित्र! ये किस पार्टी की टोपी है? पहले वालों की तो नहीं लगती। ये तो वही टोपी है न जिसे तुम सपने में भी उछाला करते थे ,‘ तो वे तमतमाते मेरे मुंह पर हाथ धरते बोले,‘ हश… श…. श… !‘ फिर इधर- उधर देखने के बाद बोले,‘ मैंने वह फेंक दी। जुएं पड़ रही थी उससे दिमाग में।’

‘फेंक दी? वह टोपी फेंक दी जिसके बूते जिंदगी के पचास साल हाथ पर हाथ धरे काट दिए? क्यों?’

‘क्योंकि उस टोपी से अब सिर में खुजलाहट होने लगी थी। सिर की चमड़ी उचड़ने लगी थी। ’

‘ इस उम्र में तो ऐसा होता ही है। और इससे ??

‘अभी तो सब ठीक है।’

‘नई है न! कल इससे भी जो सिर में खुजली होने लगी तो? इस टोपी में तुम्हें कैसा फील हो रहा है?’

‘ देश में टोपियों की कमी है क्या? एक उतारो तो दस अपनी टोपी लिए पीछे भागने लगते हैं। बस, सिर में सड़ा भेजा होना चाहिए।  पर इस टोपी के साथ  बिलकुल हल्का- हल्का फील कर रहा हूं दोस्त!  लगता है जैसे बिन पंख ही संसद तक उड़ा जा रहा हूं,’ कह वे बिन पंखों के ही हवा में उड़ने की एक्टिंग करने लगे तो अबके भी उन पर हंसी नहीं आई। क्योंकि मैं जानता हूं कि अपने देश के नेता पर हंसना अपनी हंसी बरबाद करना है। उन पर हंसना वर्जित है। उन पर हसंने वाले मुंह में कीड़े तक पड़ सकते हैं। इसलिए मैं गंभीर बना रहा।

‘पर इतने साल उस दल में रहे और अब…’

‘उसे दल कहते हो यार तुम? छी! वह दल नहीं ,दल-दल था मेरे लिए। इतने साल दिनरात हाथ पांव मारकर, एक दूसरे को पछाड़ कर उसमें जितना ऊपर उठने की कोशिश की ,उतना ही नीचे धंसता रहा । अब तो मेरा वहां दम तक घुटने लगा था। जिस तरह खड़ा पानी सड़ जाता है, उसी तरह एक ही दल में पड़- पड़ा नेता भी जंगिया जाता है। दोनों में रवानी रहे तो नेतागीरी सुहानी रहे। ’ कह उन्होंने लंबी खुली सांस ली और नीम कड़वा मुंह बनाया।

‘पर इस बात की क्या गारंटी है कि…..’

‘गारंटी तो यहां भगवान की भी नहीं , पर कम से कुर्सी तक पहुंचने के अवसर तो हैं। वहां मैं दरी उठाने वाला नहीं , सीनियर ट्रीट हो रहा हूं। और मुझे चाहिए भी क्या? वे तो कह रहे हैं पूरे परिवार को मैदान में ला खड़ा कर देंगे। बस, मेरे इशारे भर की देर है। मैं जो कहूं तो हमारे कुत्ते तक को वे अपने दल का टिकट देने को तैयार हैं। कुल मिलाकर राजनीति भौंकना ही तो है। यहां नहीं तो वहां भौंक लिए। जिस तरह जीव का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है, उसी तरह हमारा अंतिम लक्ष्य कुर्सी।’

‘पर. दोस्त …..तुम मेरे दोस्त तो रहोगे न?’ मैं शंकित हुआ तो उन्होंने मेरे कांधे पर पूरे प्यार से हाथ धरते कहा,‘ यार! दल बदला है दिल नहीं। दूसरे दिल बदलता भी नहीं। गांधी जो कहते हों कहते रहें। पर सच तो यह है कि दिल नहीं बदला करते। हाथ पांव मारने में सफल होने के बाद चाहे कोई अपने को चाहे जन्मजात ये कहे , चाहे वो। असल में होता मौकापरस्त ही है। अब देखो न, मैंने जवानी में जो प्यार किया था पत्नी के होते हुए भी आज तक वहीं बरकरार है। मेरा दिल बदला क्या। हम कितनी ही कोशिश क्यों न कर लें। हम सबकुछ बदल सकते हैं पर दिल को नहीं। ’

‘पर….’

‘अरे डरो मत। तुम्हारे लिए तो मैं वही पुराने दल वाला नेता हूं। वैसे भी मैंने दल ही तो बदला है, दिल तो नहीं बदला। तुम्हारे काम न तब रूके थे, न अब रूकेंगे,’  दल बदले दोस्त ने कहा तो मैं कहने को ही सही, कुछ आश्वस्त हुआ। पर जो अपने दल का न हुआ, वह मेरा क्या होगा??

अशोक गौतम

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