तुम चलत सहमित संस्फुरत !

तुम चलत सहमित संस्फुरत !

उड़िकें गगन आए धरणि,
बहु वेग कौ करिकें शमन;
वरिकें नमन भास्वर नयन,
ज्यों यान उतरत पट्टियन !

बचिकें विमानन जिमि विचरि,
गतिरोध कौ अवरोध तरि;
आत्मा चलत झाँकत जगत,
मन सहज करि लखि क्षुद्र गति !