पुरुष

चन्द्र का प्रतिविम्ब !

चन्द्र का प्रतिविम्ब, ज्यों जल झिलमिलाए; पुरुष का प्रतिफलन, प्राणों प्रष्फुराए ! विकृति आकृति शशि की, जल-तल भासती कब; सतह हलचल चित्र, सुस्थिर राखती कहँ ! गगन वायु अग्नि जल थल, थिरकते सब; द्रष्टि दृष्टा चित्त पल-पल, विचरते भव ! फलक हर उसकी झलक, क्षण क्षण सुहाए; देख पाए सोंप जो हैं,