गोपाल बघेल 'मधु'

President Akhil Vishva Hindi Samiti​ टोरोंटो. ओंटारियो, कनाडा

ब्रज की सुधि हौं ना विसरावहुँ !

(मधुगीति १८०८१४ अ) ब्रज की सुधि हौं ना विसरावहुँ, जावहुँ आवहुँ कान्हा भावहुँ; वाल सखा संग प्रीति लगावहुँ, साखन सुरति करहुँ विचलावहुँ ! सावन मन भावन जब आवतु, पावन जल जब वो वरसावत; वँशी की धुनि हौं तव सुनवत, हिय हुलसत जिय धीर न पावत ! झोटा लेवत सखि जब गावत, ब्रह्मानन्द उमगि उर आवत; शीरी वायु गगन ते धावत, ध्यानावस्थित मोहि करि जावत ! श्याम- शाम शीतल सुर करवत, गान बहाय श्याम पहुँचावत;

कहाँ जाने का समय है आया !

  (मधुगीति १८०८०१ अ) कहाँ जाने का समय है आया, कहाँ संस्कार भोग हो पाया; सृष्टि में रहना कहाँ है आया, कहाँ सृष्टि  से योग हो पाया ! सहोदर जीव कहाँ हर है हुआ, समाधि सृष्ट कहाँ हर पाया; समादर भाव कहाँ आ पाया, द्वैत से तर है कहाँ हर पाया ! बीज जो बोये दग्ध ना हैं हुए, जीव भय वृत्ति से न मुक्त हुए; भुक्त भव हुआ कहाँ भव्य हुए,

है ज्ञान औ अज्ञान में  !

(मधुगीति १८०८२७ ब) रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ है ज्ञान औ अज्ञान में, बस भेद एक अनुभूति का; एक फ़ासला है कर्म का, अनुभूत भव की द्रष्टि का ! लख परख औ अनुभव किए, जो लक्ष हृदयंगम किए; परिणिति क्रिया की पा सके, फल प्राप्ति परिलक्षित किए ! जो मिला वह कुछ भिन्न था, सोचा था वह वैसा न था; कुछ अन्यथा उर लग रहा, पर प्रतीति सुर दे रहा ! आभोग का सागर अगध,

चन्द्र का प्रतिविम्ब !

चन्द्र का प्रतिविम्ब, ज्यों जल झिलमिलाए; पुरुष का प्रतिफलन, प्राणों प्रष्फुराए ! विकृति आकृति शशि की, जल-तल भासती कब; सतह हलचल चित्र, सुस्थिर राखती कहँ ! गगन वायु अग्नि जल थल, थिरकते सब; द्रष्टि दृष्टा चित्त पल-पल, विचरते भव ! फलक हर उसकी झलक, क्षण क्षण सुहाए; देख पाए सोंप जो हैं,

कर पाते कहाँ वे विकास !

  (मधुगीति १८०७२४) कर पाते कहाँ वे विकास, कर के कुछ प्रयास; वे लगाते रहे क़यास, बिना आत्म भास ! विश्वास कहाँ आश कहाँ, किए बिन सकाश; संकल्प कहाँ योग कहाँ, धारणा कहाँ ! है ध्येय कहाँ ज्ञेय रहा, गात मन थका; उद्देश्य सफल कहाँ हुआ, ना मिली दुआ ! बेहतर है प्रचुर कर्म करें, ज्ञान सृष्टि कर; सृष्टा को ध्यान कर के वरें, अपने कलेवर ! उर उनकी सुने चलते रहें, बृह्म भाव रस; ‘मधु’ के प्रभु के कार्य करें, उनके हृदय बस ! रचनाकार: गोपाल बघेल ‘मधु’

पल्लवित प्रफुल्लित बगिया !

रचनाकार: गोपाल बघेल ‘मधु’ (मधुगीति १८०७१६ स) पल्लवित प्रफुल्लित बगिया, प्रभु की सदा ही रहती; पुष्प कंटक प्रचुर होते, दनुजता मनुजता होती ! हुए विकसित सभी चलते, प्रकाशित प्रकृति में रहते; विकृति अपनी मिटा पाते, वही करने यहाँ आते ! बिगड़ भी राह कुछ जाते, समय पर पर सुधर जाते; अधर जो कोई रह जाते, धरा पर लौट कर आते ! प्रवाहित समाहित होते,