गोपाल बघेल 'मधु'

President Akhil Vishva Hindi Samiti​ टोरोंटो. ओंटारियो, कनाडा

संस्कार की शुभ गति निरखि !

संस्कार की शुभ गति निरखि, आभोग को कबहू परखि; मम मन गया सहसा चहकि, कबहुक रहा था जो दहकि ! झिझके झुके झिड़के जगत, भिड़के भयानक युद्ध रत; हो गए जब संयत सतत, भव बहावों से हुए च्युत ! बाधा व्यथा तब ना रही, धुनि समर्पण की नित रही; चाहत कहाँ तब कोई रही, जो मिल गया भाया वही ! भावों में भुवनेश्वर रमा, ईशत्व में स्वर को समा; ऐश्वर्य में उर प्रस्फुरा,…

विश्वास ना निज स्वत्व में !

विश्वास ना निज स्वत्व में,  अस्तित्व के गन्तव्य में; ना भरोसा जाया है जो, ले जाएगा ले दिया जो !  बुद्धि वृथा ही लगा कर, आत्मा की बिन पहचान कर; ना नियंता को जानते, ना सृष्टि की गति चीन्हते ! आखेट वे करते फिरे, आक्रोश में झुलसे रहे; बिन बात दूजों को हने, वे स्वयं के भी कब रहे ! राहों को वे मुश्किल किए, राहत किसी को कब दिए; चाहत किसी की कहँ लखे,…

ब्रज की सुधि हौं ना विसरावहुँ !

(मधुगीति १८०८१४ अ) ब्रज की सुधि हौं ना विसरावहुँ, जावहुँ आवहुँ कान्हा भावहुँ; वाल सखा संग प्रीति लगावहुँ, साखन सुरति करहुँ विचलावहुँ ! सावन मन भावन जब आवतु, पावन जल जब वो वरसावत; वँशी की धुनि हौं तव सुनवत, हिय हुलसत जिय धीर न पावत ! झोटा लेवत सखि जब गावत, ब्रह्मानन्द उमगि उर आवत; शीरी वायु गगन ते धावत, ध्यानावस्थित मोहि करि जावत ! श्याम- शाम शीतल सुर करवत, गान बहाय श्याम पहुँचावत;…