गोपाल बघेल 'मधु'

गोपाल बघेल ‘मधु’ अध्यक्ष अखिल विश्व हिन्दी समिति आध्यात्मिक प्रबंध पीठ मधु प्रकाशन टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा www.GopalBaghelMadhu.com

तुम सुर में बसी उनकी झलक!

तुम सुर में बसी उनकी झलक,  लख लिया करो; भाए न भाए उनकी ग़ज़ल,  गा लिया करो !  दरम्यान उनके औ तुम्हारे, दूरियाँ कहाँ; दरवाज़ा खोल बार बार, मिल लिया करो ! आँखों का नूर चित को चूर, करता रहा है; आहिस्ते बना रिश्ते खुद को,  खो दिया करो ! खोये वहीं हैं हर ही सबब, शब्द में सोये; चुपचाप उनकी चाप सुने,…

नेत्र जब नवजात का झाँका किया!

नेत्र जब नवजात का झाँका किया, शिशु जब था समय को समझा किया; पात्र की जब विविधता भाँपा किया, देश की जब भिन्नता आँका किया ! हर घड़ी जब प्रकृति कृति देखा किया, हर कड़ी की तरन्नुम ताका किया; आँख जब हर जीव की परखा किया, भाव की भव लहरियाँ तरजा किया ! रहा द्रष्टा पूर्व हर जग दरमियाँ, बाद में वह स्वयं को निरखा किया; देह मन अपना कभी वह तक लिया, विलग हो आभास मैं पन का किया ! महत से आकर अहं को छू लिया, चित्त को करवट बदलते लख लिया; पुरुष जो भीतर छिपा प्रकटा किया,…

राज हर कोई करना है जग चह रहा !

राज हर कोई करना है जग चह रहा, राज उनके समझना कहाँ वश रहा; राज उनके कहाँ वो है रहना चहा, साज उनके बजा वह कहाँ पा रहा ! ढ़पली अपनी पै कोई राग हर गा रहा, भाव जैसा है उर सुर वो दे पा रहा; ताब आके सुनाए कोई जा रहा, सुनके सृष्टा सुमन मात्र मुसका रहा ! पद के पंकिल अहं कोई फँसा जा रहा, उनके पद का मर्म कब वो लख पा रहा; बाल बन खेल लखते मुरारी रहे, दुष्टता की वे सारी बयारें सहे ! सृष्टि सारी इशारे से जिनके चले,  सहज होके वे जगती पै क्रीड़ा करे; जीव गति जान कर तारे उनको चले,…