गोपाल बघेल 'मधु'

गोपाल बघेल ‘मधु’ अध्यक्ष अखिल विश्व हिन्दी समिति आध्यात्मिक प्रबंध पीठ मधु प्रकाशन टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा www.GopalBaghelMadhu.com

विश्वास में बसा है यहाँ!

विश्वास में बसा है यहाँ,  सारा सिलसिला; मिट जाता जो भी आता,  जगती जड़ का ज़लज़ला!  चैतन्य सत्ता सतत रहती, शून्य समाई; अवलोके लोक लुप्त भाव, ललित लुभाई!  लावण्य हरेक गति में रहा, हर लय छाई; लोरी लिए ही लखते रहो, उनकी खुदाई!  खेलो खिलाओ वाल सरिस,  बुधि न लगाओ; कान्हा की श्यामा श्याम रंग, घुल मिल जाओ!  वसुधा हुई है ध्यान मग्न,  काल भुलाईं; ‘मधु’ कोंपलों में परागों का, प्राण है ढला! ...

वे ही बने हैं वर्ण पर्ण!

वे ही बने हैं वर्ण पर्ण, वरण विभु किए; धारण किए हैं धर्म, मर्म वे ही हर छुए! हर रण में रथ उन्हीं का रहा, सारथी वे ही; हर देही चक्र शोध किए, शाश्वत वही!  वे व्योम वायु ज्वाल जलधि भूतल भास्वर; उर चेतना से चित्र चित्त, बनाए अधर!  साहित्य संस्कृति है रही, उनसे ही उभर; अध्यात्म ज्ञान गह्वर के, वे ही सुर प्रवर! राजा व प्रजा वे ही बने, जगत चलाए; ‘मधु’ महत मखे अहं चित्त, नाच नचाए!   ✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’ 

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