यादेँ व उम्मीद :-सौरभ चतुर्वेदी

Posted On by & filed under कविता

मयस्सर डोर से फिर एक मोती झड़ रहा है , तारीखों के जीने से दिसम्बर उतर रहा है | कुछ चेहरे घटे , चंद यादें जुड़ीं गए वक़्त में, उम्र का पंछी नित दूर और दूर उड़ रहा है |… गुनगुनी धूप और ठिठुरती रातें जाड़ो की, गुजरे लम्हों पर झीना-झीना पर्दा गिर रहा है।… Read more »