विश्वास में बसा है यहाँ

विश्वास में बसा है यहाँ!

विश्वास में बसा है यहाँ,  सारा सिलसिला; मिट जाता जो भी आता,  जगती जड़ का ज़लज़ला!  चैतन्य सत्ता सतत रहती, शून्य समाई; अवलोके लोक लुप्त भाव, ललित लुभाई!  लावण्य हरेक गति में रहा, हर लय छाई; लोरी लिए ही लखते रहो, उनकी खुदाई!  खेलो खिलाओ वाल सरिस,  बुधि न लगाओ; कान्हा की श्यामा श्याम रंग, घुल मिल जाओ!  वसुधा हुई है ध्यान मग्न,  काल भुलाईं; ‘मधु’ कोंपलों में परागों का, प्राण है ढला! ...

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