कविता कविता – अस्तित्व February 20, 2013 / February 20, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment घुप्प अंधेरे में टिमटिमाता है एक दीया मेरे कमरे में । जानता हूँ अच्छी तरह नहीं मिटा सकती अंधेरे को उसकी रोशनी । उधर चाँद झांकता है और कतरा-दर-कतरा घुसता है उसकी रोशनी मेरे अंधेरे कमरे में । फिरभी नहीं मिटता अंधेरा और मैं टटोलता हूँ दो दिन की पड़ी बासी रोटी […] Read more » कविता - अस्तित्व