तैमूरलंग का आतंकी अभियान

डॉ राकेश कुमार आर्य

सिकन्दर बुतशिकन

कश्मीर वैसे तो हमारी भारतीय सांस्कृतिक विरासत का बेजोड़ उदाहरण है, पर पिछले कुछ समय से कश्मीरियत का अभिप्राय कश्मीर की उस ' गंगा - जमुनी तहजीब' से लगाया जा रहा है, जिसमें वहाँ के हिन्दुओं को कश्मीर छोड़ने के लिए बाध्य किया गया है। जब से कश्मीर में इस्लाम का प्रवेश हुआ तभी से वहाँ पर मानो पानी में आग लग गई। शान्त वादी में अशान्ति के स्वर सुनाई देने लगे और जो कश्मीर वास्तव में सफेद चादर से ढका रहता था , उसकी सफेद चादर पर खून के दाग दिखाई देने लगे।

शान्ति, त्याग, तपस्या और साधना की प्रतीक कश्मीर की घाटी में सिकन्दर शाह मीरी ने इस्लामिक कट्टरता की कई रक्त से भरी कहानियाँ लिखीं।


  हिन्दुओं के प्रति निर्ममता और निर्दयता ली हुई इन कहानियों को पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कश्मीर में हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाले इस सिकंदर शाह मीरी को बुतशिकन इसीलिए कहा गया कि उसने साम्प्रदायिक उन्माद में पगलाकर हिन्दुओं पर अप्रत्याशित अत्याचार किए। उनके धर्म स्थलों का विनाश किया और मूर्तियाँ जहाँ भी दिखाई दीं वहीं तोड़ डालीं।

ऐसा नहीं था कि उसने केवल हिन्दुओं के साथ ही अत्याचार किए, उनके अतिरिक्त उसने बौद्ध धर्म के धार्मिक स्थलों को भी तोड़ा और उनको इस्लाम स्वीकार करने या कश्मीर छोड़ने पर बाध्य किया। इस प्रकार कश्मीर से हिन्दुओं का पलायन करवाना कल परसों की बात नहीं है, अपितु मुसलमानों का यह बहुत पुराना पेशा है। जब जब यहाँ पर इस्लामिक अत्याचार बढ़े हैं तब तब यहाँ के हिन्दुओं को कश्मीर छोड़ने के लिए बाध्य किया गया है।

सामाजिक पर्वों पर भी लगा दिया प्रतिबन्ध

सिकंदर शाह ने अपनी साम्प्रदायिक सोच और नीतियों का परिचय देते हुए गैर-इस्लामिक लोगों की धार्मिक सामाजिक परम्पराओं पर भी प्रतिबन्ध लगाने का काम किया। उसने गैर मुस्लिमों के पूजा-अर्चना, नृत्य, गायन, संगीत, शराब पीने और धार्मिक उत्सवों पर पूर्णतया प्रतिबन्ध लगा दिया। ऐसी स्थिति में हिन्दुओं के लिए कश्मीर में रहना बड़ा कठिन हो गया। उनके सामने जीवन मरण का प्रश्न खड़ा हो गया। लाखों करोड़ों वर्ष से जो परिवार कश्मीर को अपना घर मानकर रहते चले आ रहे थे उनके लिए अब यहाँ से बोरिया बिस्तर बाँध कर भाग जाना ही एकमात्र विकल्प रह गया। ऐसी परिस्थिति में कई हिन्दुओं ने इस प्रकार के उत्पीड़न और अत्याचारों से अपना बचाव करने के दृष्टिकोण से या तो इस्लाम स्वीकार कर लिया या फिर कश्मीर से पलायन कर दिया। इसके अतिरिक्त कुछ लोग ऐसे भी रहे होंगे जिन्होंने दोनों ही परिस्थितियों में अपने आपको असुरक्षित समझा होगा और तब उन्होंने आत्महत्या को ही एकमात्र विकल्प समझा होगा। जबकि कुछ लोग ऐसे भी रहे जो मुस्लिमों से हुए संघर्ष में मार दिए गए।

जीवन मरण का प्रश्न हमारे सम्मुख आया बार-बार ।
बिना उफ किए मृत्यु को हरदम किया था स्वीकार ।।

जब सिकंदर बुतशिकन कश्मीर के हिन्दू पुस्तकालयों को जला-जलाकर नष्ट कर रहा था, तब राष्ट्रभक्त धर्मवीर हिन्दुओं को उसका यह कृत्य अच्छा नहीं लग रहा था। अपनी आँखों के सामने अपने सांस्कृतिक वैभव को उजड़ते देखकर हिन्दुओं को असीम वेदना की अनुभूति हो रही थी। इसलिए उन्होंने भी अपने ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों को हिमाचल की कंदराओं में या दुर्गम जंगलों में ले जाकर छिपाने का प्रयास किया।

शिक्षा केंद्रों को भी जलाकर कर दिया राख

उस समय कश्मीर विद्या का एक केन्द्र था। यहाँ के अनेकों विद्यालयों और वैदिक शिक्षा के केंद्रों को जलाकर राख कर दिया गया था। श्रीवर ने अपनी राजतरंगिणी में लिखा है-“मुसलमानों के द्वारा किये गये इस ज्ञान संहार की ताण्डव लीला को देखकर उस समय के विद्वान् लोग पुस्तकों को किसी प्रकार बचाने के लिए छद्मवेष धारण करके कुछ एक पुस्तकों को लेकर दुर्गम पहाड़ों को पार करके यहाँ से भाग गये। इस प्रकार वर्षों तक इन कश्मीरी पण्डितों ने जंगलों इत्यादि में छिपकर भारत की प्राचीन संस्कृति की रक्षा की। इसके उपरान्त भी असंख्य दुर्लभ ग्रन्थ सुल्तानों के हमामों और भट्टियों में जलकर राख हो गये।”

कश्मीर हिन्दुओं के रक्त पिपासु लोगों के लिए उस समय एक तीर्थ ही बन गया था। हजारों सैयद कश्मीर में आकर भारतीयों के धर्मांतरण की प्रक्रिया में लग गये थे। इन लोगों को ऐसा कार्य करते हुए इतिहास में कुछ इस प्रकार दिखाया गया है कि जैसे यह पहले से ही ज्ञान विज्ञान के केंद्र रहे कश्मीर में आकर कश्मीरियों पर बहुत बड़ा उपकार कर रहे थे। जबकि सच यह था कि अपने इस कार्य के माध्यम से यह लोग भी इस्लाम की ‘उत्कृष्ट सेवा’ कर रहे थे अर्थात् लोगों का धर्मांतरण करने में सहायक बनकर ये इस्लाम की मौन रहकर बहुत बड़ी सेवा कर रहे थे।

 ये सैयद लोग पूर्व और मध्य एशिया से आये थे। इनके अत्याचारों की करुण कहानी का वर्णन श्रीवर राजतरंगिणी में करते हुए लिखता है-

सैयदों के अत्याचारों की कहानी अति भयंकर है। वे मानवता एवं क्रूरता की सीमा पार कर गये थे। वैद्य पण्डित भुवनेश्वर को सैयदों ने मारकर उसके चन्दन लिप्त मस्तक को काटकर राजपथ पर रख दिया था। सैयदों ने जनता में भय उत्पन्न करने के लिए कटे सिरों को वितस्ता के तट पर कोयलों और लकडियों में रख दिया।

वह आगे लिखता है कि  हिन्दुओं के शव वितस्ता नदी में फेंक दिये जाते थे। तैरते हुए वे दुर्गंध करते थे। महायदमसर में बहते चले जाते थे। उनका अन्तिम संस्कार करने का भी कोई विचार नहीं करता था। वितस्ता के दोनों ओर तटों पर आने वाली स्त्रियों को बाणों से बींधकर अंग विदीर्ण कर देना साधारण बात थी। वितस्ता तट पर रोककर प्रतिदिन दो तीन व्यक्तियों को सूली पर चढ़ा देते थे। रूई की गद्दी पर रखे उपधान के स्पर्श का उत्तम सुख प्राप्त करने वाले सुंदर श्रृंगार परिपूर्ण वे भूमि (सम्भ्रांत सामंतों की ओर संकेत है) पर नग्नावस्था में काक, कुक्कुट, वृकों के भोजन बनते, खाये गये मेदा, मांस बंसा से निकलते कृमियों सहित तथा दुर्गंध युक्त देखे गये। समुद्र मठ से लेकर पूर्वाधिष्ठान तक मार्गों में ईंधन के गट्ठर के समान निर्वस्त्र शव पड़े हुए थे। अधिकारियों का वध बिना न्याय किये ही कर दिया जाता था। उनके शवों के साथ क्रूरता की जाती थी। 

राजप्रासाद के प्रांगण से चाण्डालों के कूल्हों में रस्सी बाँधकर उन्हें (ताज एवं याचक को) खींचा, उनके शरीर के अंग मलयुक्त हो गये थे। वे कुत्तों के भोजन बने। सैनिकों के पराजित होने पर उनका मस्तक काटकर उन्हें झण्डों पर टाँग दिया जाता था।”

जहाँ तक बल प्रयोग की बात है तो मुहम्मद बिन तुगलक के विषय में मसालिक उल अंसार’ एलियट एण्ड डाउसन खण्ड तृतीय, पृष्ठ 580, से हमें पता चलता है कि “सुल्तान गैर मुस्लिमों (हिंदुओं) पर युद्ध करने के अपने सर्वाधिक उत्साह में कभी भी कोई कैसी भी कमी नहीं करता। हिन्दू बंदियों की संख्या इतनी अधिक थी कि प्रतिदिन अनेकों हजार हिन्दू बेच दिये जाते थे।”

इसी प्रकार यह भी दृष्टव्य है- "सर्वप्रथम युद्ध के मध्य बंदी बनाये गये, काफिर राजाओं की पुत्रियों को अमीरों और महत्वपूर्ण विदेशियों को उपहार में भेंट कर दिया जाता था। इसके पश्चात् अन्य काफिरों की पुत्रियों को सुल्तान दे देता था, अपने भाइयों व संबंधियों को।" (संदर्भ : 'तुगलक कालीन भारत' एस.ए. रिजवी भाग 1 पृष्ठ 189)


 इब्नबतूता हमें बताता है-"तब सुल्तान (मुहम्मद बिन तुगलक) शिकार के अभियान के लिए बारान गया, जहाँ उसके आदेशानुसार सारे हिन्दू देश को लूट लिया गया और विनष्ट कर दिया गया। हिन्दू सिरों को एकत्र कर लाया गया तथा बारान के किले की चहारदीवारी पर टांग दिया।"

सैयद राजवंश

सैयद वंश का शासन काल मात्र 37 वर्ष का रहा। 1414 ईस्वी से लेकर 1451ई0 तक इस वंश के कई शासकों ने शासन किया। यद्यपि इनका शासनकाल संक्षिप्त है और यह पारस्परिक कलह में ही अधिक फँसे रहे, परन्तु इस सबके उपरान्त भी ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि इन्होंने हिन्दुओं के प्रति कहीं दयालुता का व्यवहार किया हो या तुर्क शासक अपनी परम्परागत हिन्दू नीति में किसी प्रकार का आमूलचूल परिवर्तन करने में सफल हुए हों? कहने का अभिप्राय है कि हिन्दू विरोध की तुर्क और इस्लामिक परम्परा इनके शासन काल में भी यथावत बनी रही।

लोदी वंश

जितने भी तुर्क शासक हुए उन सबका राज धर्म से कोई किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं था। लूट धर्म में विश्वास रखने वाले ये लोग भारत को लूटने खसोटने और यहाँ के लोगों पर अत्याचार करने को ही अपना राजधर्म मानते थे। वास्तव में भारत में इस्लामिक शासकों का शासन काल वह काल है जिसे अराजकता, शोषण, अत्याचार, दमन, दलन और उत्पीड़न का काल कहा जाना ही उचित होगा। गैर मुस्लिमों को इस काल में किसी प्रकार के अधिकार नहीं थे। एक प्रकार से देश के मुंसिफ कातिल बन चुके थे।

इसी प्रकार के अराजकतावादी काल में जब लोदी वंश का शासन आया तो इस वंश के शासक सिकन्दर लोदी व बहलोल खान के शासन काल में हिन्दुओं को जलाकर मारने की बहुत ही हृदयविदारक और पैशाचिक घटनाएँ हुई। यह आज हमारे लिए चाहे पैशाचिक और हृदयविदारक घटनाएँ हैं, परन्तु उस समय के शासक वर्ग के लिए यह आनंददायक घटनाएँ थीं। क्योंकि साम्प्रदायिकता का भूत उनके सिर पर चढ़कर बैठा था। जो उन्हें आग से जलकर मर रहे हिन्दुओं की हृदयविदारक चीत्कार से आनन्दित करता था।

1499 ई0 की एक बड़ी इतिहास प्रसिद्ध घटना है। जब एक बंगाली ब्राह्मण हिन्दू और मुस्लिमों के बीच एकता का भाव पैदा करने का सराहनीय कार्य कर रहा था। उसके विचारों को सुनकर बहुत से हिन्दू और मुसलमान उसके शिष्य हो गए थे। उसका कहना था कि यह दोनों धर्म ही सच्चे हैं जो ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग मनुष्य को बताते हैं।

सिकन्दर को जब इस ब्राह्मण के इस प्रकार के विचारों की जानकारी हुई तो उसने अपने इस्लामिक विशेषज्ञों को बुलाकर उनसे परामर्श लिया। कट्टरवादी सोच से ग्रसित इस्लामिक विद्वानों ने सिकंदर को बताया कि यह सोच अपने आप में पूर्णतः गलत है। इस्लामिक विद्वानों ने सिकन्दर को उस ब्राह्मण को इस्लाम अपनाने या मारे जाने में से एक चुन लेने के लिये कहा। सिकन्दर ने ऐसा ही किया। पर ब्राह्मण ने अपना मत बदलने से इन्कार कर दिया, तब उस ब्राह्मण को मार दिया गया।

इस प्रकार वास्तविक अर्थों में गंगा जमुनी संस्कृति का निर्माण करने वाले उसी ब्राह्मण को इस्लाम की तलवार ने मौत के घाट उतार दिया। वास्तव में सच यही है कि जो लोग गंगा जमुनी संस्कृति की सच्चाई को यथार्थ के धरातल पर उतारने का प्रयास करते हैं उन्हें इस्लाम की तलवार जीवित नहीं रहने देती। वास्तव में गंगा जमुनी संस्कृति का अर्थ यह है कि हिन्दू दमन को मौन रहकर सहन करता रहे और इस्लाम अपना विचार विस्तार अपने स्वेच्छाचारी स्वरूप को अपनाकर करता रहे।

उत्तर प्रदेश के एक समकालीन इतिहासकार ने लिखा है कि - "लोधी इतना कट्टर मुसलमान था कि उसने काफिरों के पूजास्थलों को बड़े पैमाने पर नष्ट किया। मथुरा जो कि मूर्तिपूजा का प्रमुख गढ़ था, वहाँ के मन्दिरों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। वहाँ स्थापित मूर्तियों को कसाइयों को मांस तौलने के काम में लेने के लिये दे दिया। सभी हिन्दुओं के सिर और दाढ़ी मूण्डने पर पाबन्दी लगा दी। इस तरह पूरा शहर इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार चलने लगा।" - (तारीख-ए-दाउदी )

 इस प्रकार के सारे वर्णन और तथ्य स्पष्ट करते हैं कि मजहब ही लोगों को एक-दूसरे से वैर करना सिखाता है। क्योंकि मज्जहब का मूल स्वभाव ही तोड़फोड़ कराने, एक-दूसरे को नीचा दिखाने, एक-दूसरे के प्रति घृणा व्यक्त करने और एक-दूसरे के अधिकारों का हनन करने की सीख देना है।

धर्म हमारा तलवार से जो लोग थे मिटाने को चले।
बड़ी दुष्टता से वे नीचजन पूर्वजों को थे हमारे रौंदते ।।
उनके नीच व्यवहार से ना तनिक हम भयभीत थे।
क्योंकि उस काल में भी न्याय व धर्म हमारे मीत थे।।
क्रमशः

( मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना ” नामक मेरी पुस्तक से )

डॉ राकेश कुमार आर्य

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