-अशोक “प्रवृद्ध”
गुमला जिले के डुमरी प्रखंड अंतर्गत झारखण्ड व छतीसगढ़ की सीमावर्ती लुचुतपाट की पहाड़ी श्रृंखला में स्थित टांगीनाथ धाम झारखण्ड का एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक, पर्यटक और ऐतिहासिक स्थल है। इस स्थल पर भगवान शिव चन्दन वृक्ष की खोड़हर में काष्ठ रूप में विराजित, सदियों से पूजित हैं, लेकिन इसकी मुख्य विशेषताओं में जमीन से चार सौ मीटर ऊंची लुचुतपाट की पहाड़ी में विष्णु अवतार भगवान परशुराम का अस्त्र फरसा अर्थात टांगी का गड़ा होना है। जमीन के ऊपर इस फरसे की ऊंचाई लगभग 4-5 फीट दिखती है, लेकिन यह जमीन के अंदर कितना गहरा गड़ा है, यह आज भी अज्ञात है। मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान परशुराम ने त्रिशूल सदृश्य दिखाई देने वाले अपने प्रमुख अस्त्र परशु अर्थात फरसा को जमीन में गाड़कर यहीं पर घोर तपस्या की थी। स्थानीय भाषा में फरसा को टांगी कहे जाने के कारण झारखण्ड के इस स्थान का नाम टांगीनाथ पड़ा। यहां विराजित शिव को टांगीनाथ बाबा और इस स्थल को टांगीनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। टांगीनाथ धाम में गड़ा हुआ फरसा एक अद्भुत लौह स्तंभ के रूप में सदियों से खुले आसमान के नीचे होने के बावजूद भी इसमें कभी जंग नहीं लगा है, जो आज भी एक रहस्य बना हुआ है। प्राचीन समय से ही यह शिव उपासना का केंद्र रहा है। यहां प्राचीन काल के सैकड़ों शिवलिंग और कलात्मक प्रतिमाएं इधर- उधर बिखरी हुई हैं। इसे भगवान शिव और शक्ति की साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। प्रमुख उत्सव के रूप में यहां महाशिवरात्रि और सावन के महीने में भव्य मेलों का आयोजन होता है, जिसमें झारखण्ड के अलावा बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा आदि पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्तों का मानना है कि इस पवित्र स्थान के दर्शन मात्र से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और संकटों का नाश होता है।
टांगीनाथ धाम की प्राचीन कथा मुख्य रूप से भगवान परशुराम के प्रायश्चित और भगवान शिव की भक्ति से जुड़ी है। इसके पीछे अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। परशुराम का क्रोध और प्रायश्चित से संबंधित प्रचलित कथा के अनुसार जब भगवान श्रीराम ने राजा जनक के दरबार में शिव धनुष तोड़ा, तो परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर वहां पहुंचे। लक्ष्मण से विवाद होने के बाद जब उन्हें ज्ञात हुआ कि राम स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं, तो उन्हें अपनी भूल और क्रोध पर गहरी आत्मग्लानि हुई। प्रायश्चित करने के लिए वे डुमरी के इन पहाड़ों पर चले आए और अपना परशु (फरसा) जमीन में गाड़कर भगवान शिव की घोर तपस्या में लीन हो गए। एक स्थानीय लोककथा लोहार समुदाय और इस त्रिशूल के शाप से संबंधित है। कथा के अनुसार एक बार एक लोहार ने इस गड़े हुए फरसे को काटने की कोशिश की थी। प्रयास के दौरान उस व्यक्ति की अकाल मृत्यु हो गई। माना जाता है कि इसी घटना के कारण टांगीनाथ धाम के 12 किलोमीटर के दायरे में आज भी लोहार समुदाय के लोग निवास नहीं करते हैं।
टांगीनाथ धाम की एक अन्य कथा शनि देव और शिव के प्रहार से संबंधित है। मान्यतानुसार महादेव ने एक बार शनि देव के किसी अपराध पर क्रोधित होकर उन पर अपना त्रिशूल (परशु) फेंका था। वह त्रिशूल इसी पहाड़ी पर आकर धंस गया, जिसका ऊपरी हिस्सा आज भी फरसे के रूप में दिखाई देता है। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार भगवान शिव इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और एकांत से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने यहीं निवास करने का निर्णय लिया। जब एक भक्त उनकी बातों को या उनके दिव्य रूप के रहस्य को जान लिया, तब महादेव उस रहस्य को सुरक्षित रखने और अपनी लीला को विराम देने के लिए समीप स्थित एक चन्दन के वृक्ष के खोखले भाग (खोड़हर) में विलीन, अंतर्ध्यान हो गये। टांगीनाथ धाम से संबंधित एक कथा मझगांव और स्वर्ण मृग की कहानी से भी जुडी हुई बताई जाती है। स्थानीय बैगा (पुजारी) परंपरा में कही जाने वाली इस कहानी के अनुसार टांगीनाथ बाबा ने एक बार स्वर्ण मृग का रूप धारण किया था। शिकारियों द्वारा पीछा किए जाने पर वे इस पहाड़ी पर अंतर्ध्यान हो गए और एक खेरवार (बैगा) समुदाय के भक्त की लगन से प्रसन्न होकर वहीं वास करने लगे। शिव जी ने उस भक्त की लगन से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि भविष्य में उसी के वंशज यहां पूजा-अर्चना करेंगे। यही कारण है कि यहां ब्राह्मणों के बजाय खेरवार समुदाय (बैगा आदिवासी पुजारी) के लोग पूजा संपन्न करते हैं। वे संस्कृत के मंत्रों के स्थान पर स्थानीय नागपुरी, सादरी भाषा में पूजन की सम्पूर्ण प्रक्रियाएं पूर्ण करते, कराते हैं। इस स्थान के महिमा से संबंधित एक अन्य कथा एक बुढ़िया और उसके वरदान से प्राप्त पुत्र धर्मेश से जुडी हुई है, जिसमें उस बुढ़िया के परिवार पर एक राक्षस के कारण आये संकट से धर्मेश ने बचाव किया था, जिसकी कथा अलग है।
टांगीनाथ धाम न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला और पुरातात्विक संपदा का एक अनमोल खजाना भी है। टूटकर यत्र-तत्र बिखरे पड़े टांगीनाथ धाम की वास्तुकला में गुप्त काल और नागर शैली की स्पष्ट झलक ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में देखने को मिलती है। यहां की मूर्तियां और मंदिर 7वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच के माने जाते हैं। 1989 में यहां हुई पुरातत्व विभाग की खुदाई में हीरा जड़ित मुकुट और सोने-चांदी के आभूषण मिले थे, जो आज भी डुमरी थाने के मालखाने में सुरक्षित हैं। उस समय खुदाई को रहस्यमयी कारणों से बीच में ही रोक दिया गया था, जिसके बाद से यहां कोई बड़ा वैज्ञानिक शोध नहीं हुआ है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 1989 में की गई इसी खुदाई ने इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को विश्व के सामने रखा। मंदिर परिसर के शिलालेखों में सरगुजा के रक्षेलवंशी राजाओं, छोटानागपुर के नागवंशी राजाओं और बरवे राज्य के इतिहास का उल्लेख मिलता है। यहां सैकड़ों प्राचीन शिव लिंगों के साथ-साथ भगवान विष्णु, माँ लक्ष्मी, सूर्य देव और गणेश, भवानी, दुर्गा की खंडित और पूर्ण प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं, जो गुप्त काल से लेकर मध्यकाल के बीच की मानी जाती हैं। यहां पूरे परिसर में खुले आसमान के नीचे सैकड़ों शिवलिंगों और विभिन्न देवी-देवता की पत्थर की बनी प्राचीन और कलात्मक प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हैं। यहां लगभग 108 शिवलिंग एक व्यवस्थित ढंग से स्थापित हैं। इनमें से कुछ शिवलिंगों की विशेषता यह है कि उन पर पर बुद्ध की आकृतियां भी उकेरी गई हैं। यहां स्थित सूर्य कुंड और प्राचीन शिलालेख इतिहासकारों के लिए आज भी एक पहेली बने हुए हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मुख्य शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि वह एक प्रस्तरीकृत (पत्थर से बने) वृक्ष के तने जैसी आकृति का प्रतीत होता है। टांगीनाथ धाम की यह विशेषता इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग बनाती है, जहां प्रकृति और देवत्व का ऐसा अनोखा मिलन देखने को मिलता है। आज भी मंदिर के गर्भगृह में स्थित मुख्य शिवलिंग को गौर से देखने पर वह किसी पत्थर बन चुके वृक्ष के तने जैसा प्रतीत होता है। स्थानीय लोग इसे उसी दिव्य चन्दन वृक्ष का हिस्सा मानते हैं जिसमें भगवान शिव अंतर्ध्यान हुए थे। इसी घटना के बाद शिव जी ने उस क्षेत्र के खेरवार (बैगा) समुदाय को वरदान दिया कि वे ही उनके मुख्य पुजारी होंगे। और बैगा परंपरा की शुरुआत हुई। यह कथा टांगीनाथ धाम को एक ऐसी जगह बनाती है जहां प्रकृति और शिव एक-दूसरे में समाहित हो गए हैं। यही कारण है कि यहां की पूजा पद्धति और परंपराएं आज भी अद्वितीय हैं। यहां की पूजा में आदिवासी और सनातन परंपराओं का एक अद्भुत मेल देखने को मिलता है, जो झारखण्ड की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है।