विश्ववार्ता

हार्मुज़ पर टैक्स की जंग : किसका समुद्र, किसका अधिकार 

डॉ. घनश्याम बादल

युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं लड़े जाते, वे समुद्रों, व्यापार मार्गों, अर्थव्यवस्था और कूटनीति पर भी लड़े जाते हैं। आज फारस की खाड़ी का प्रवेश द्वार, हार्मुज़ जलडमरूमध्य, इसी प्रकार के संघर्ष का केंद्र बन गया है। ईरान और अमेरिका एक-दूसरे पर युद्धविराम की शर्तें तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं। एक ओर ईरान अपने समुद्री क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों पर नियंत्रण और शुल्क लगाने की बात कर रहा है, तो दूसरी ओर अमेरिका भी समुद्री सुरक्षा के नाम पर जहाजों से 20 प्रतिशत शुल्क वसूलने की घोषणा कर चुका है। दोनों पक्ष अपने-अपने कदम को वैध ठहरा रहे हैं, किंतु प्रश्न यह है कि इसकी कीमत कौन चुकाएगा? उत्तर स्पष्ट है— दुनिया।

ताज़ा घटनाक्रम में दोनों देश युद्धविराम के उल्लंघन के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं। अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने हार्मुज़ में जहाजों की आवाजाही बाधित कर समझौते की भावना का उल्लंघन किया, जबकि ईरान का कहना है कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई, नाकेबंदी और इज़राइल को समर्थन ने युद्धविराम को अर्थहीन बना दिया। स्वतंत्र रूप से इन दावों की पूरी पुष्टि संभव नहीं है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि दोनों पक्ष युद्धविराम की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं और यही टकराव का सबसे बड़ा कारण बन गया है।

इस पूरे संकट में इज़राइल की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। ईरान का आरोप है कि इज़राइल की सैन्य गतिविधियों को अमेरिकी समर्थन प्राप्त है, जबकि अमेरिका इसे क्षेत्रीय सुरक्षा का प्रश्न बताता है। परिणाम यह है कि युद्ध केवल ईरान और अमेरिका के बीच सीमित नहीं रह गया, बल्कि पूरा पश्चिम एशिया उसकी चपेट में आ गया है।

हार्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा है। सामान्य परिस्थितियों में विश्व के समुद्री तेल व्यापार का लगभग पाँचवाँ हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यदि इस मार्ग पर कोई भी पक्ष कर लगाए, जहाजों को रोके या सैन्य नियंत्रण स्थापित करे, तो उसका प्रभाव केवल खाड़ी तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की कीमतें बढ़ेंगी, समुद्री बीमा महँगा होगा, माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी और अंततः पूरी दुनिया में महँगाई का दबाव बढ़ेगा।

सबसे रोचक और विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि दोनों पक्ष लगभग एक जैसी नीति अपना रहे हैं। ईरान कहता है कि वह अपनी समुद्री सीमा और सुरक्षा के लिए शुल्क लेगा। अमेरिका कहता है कि वह समुद्री सुरक्षा उपलब्ध करा रहा है, इसलिए उसके लिए भी शुल्क लिया जाना चाहिए। नाम अलग-अलग हो सकते हैं—’टैक्स’, ‘टोल’, ‘सुरक्षा शुल्क’ या ‘प्रतिपूर्ति’—लेकिन अंततः भुगतान जहाज मालिकों को करना होगा और उसका भार दुनिया के उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना है।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का मूल सिद्धांत यह है कि अंतरराष्ट्रीय नौवहन मार्गों पर निर्बाध आवागमन सुनिश्चित किया जाए। किसी एक देश द्वारा समुद्री मार्ग को आर्थिक या राजनीतिक दबाव का साधन बनाना वैश्विक व्यापार व्यवस्था की भावना के विरुद्ध माना जाता है। यही कारण है कि दोनों पक्षों के दावों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रश्न उठ रहे हैं।

भारत के लिए यह संकट विशेष चिंता का विषय है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग आयात करता है और उसका महत्वपूर्ण हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है। यदि हार्मुज़ में तनाव बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी, पेट्रोल और डीज़ल महँगे होंगे, परिवहन लागत बढ़ेगी, उर्वरकों की कीमत प्रभावित होगी और अंततः महँगाई का दबाव आम नागरिक तक पहुँचेगा। इसके अतिरिक्त खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों की सुरक्षा और भारतीय निर्यात-आयात पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

खाड़ी देशों की स्थिति भी कम कठिन नहीं है। वे एक ओर अमेरिका के सुरक्षा सहयोगी हैं, दूसरी ओर उनकी अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार और ऊर्जा निर्यात पर निर्भर है। इसलिए वे किसी भी ऐसे संघर्ष से बचना चाहते हैं जिससे व्यापार बाधित हो। लंबे समय तक तनाव बना रहा तो खाड़ी देशों की आर्थिक वृद्धि और निवेश दोनों प्रभावित होंगे।

वास्तविकता यह है कि आधुनिक युद्धों में ‘आर-पार की जीत’ अब लगभग असंभव हो गई है। अमेरिका जैसी महाशक्ति भी ईरान जैसे क्षेत्रीय शक्ति-संपन्न देश को स्थायी रूप से झुका नहीं सकती, और ईरान भी अमेरिका को सैन्य रूप से पराजित करने की स्थिति में नहीं है। दोनों देशों के पास एक-दूसरे को क्षति पहुँचाने की क्षमता अवश्य है, लेकिन निर्णायक विजय की संभावना अत्यंत सीमित है। ऐसे में यह संघर्ष सैन्य से अधिक राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक बन जाता है।

दुर्भाग्य यह है कि दोनों पक्षों की सरकारें अपने-अपने राष्ट्रीय गौरव, राजनीतिक प्रतिष्ठा और रणनीतिक संदेश को पीछे हटने नहीं देना चाहतीं। परिणामस्वरूप समझौते की गुंजाइश लगातार संकुचित होती जा रही है। इतिहास बताता है कि जब राष्ट्रीय अहंकार संवाद पर हावी हो जाता है, तब युद्ध लंबे होते हैं और उनकी कीमत निर्दोष नागरिक तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था चुकाती है।

इस युद्ध का समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं निकल सकता। आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र, खाड़ी सहयोग परिषद, यूरोपीय शक्तियाँ और तटस्थ मध्यस्थ देश मिलकर ऐसा तंत्र विकसित करें जिसमें हार्मुज़ जलडमरूमध्य को किसी एक देश की राजनीतिक सौदेबाजी का साधन बनने से रोका जा सके। समुद्री आवागमन की स्वतंत्रता, युद्धविराम की स्पष्ट शर्तें और पारदर्शी निगरानी व्यवस्था ही स्थायी समाधान का आधार बन सकती हैं।

हार्मुज़ आज केवल एक जलडमरूमध्य नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन है। चाहे टैक्स ईरान लगाए या अमेरिका, उसका बोझ अंततः विश्व व्यापार और आम उपभोक्ता पर पड़ेगा। इसलिए यह संघर्ष किसी एक क्षेत्र का नहीं, पूरी मानवता का प्रश्न बन चुका है। यदि अमेरिका और ईरान वास्तव में शांति चाहते हैं तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि प्रतिष्ठा की लड़ाई में आर्थिक स्थिरता और वैश्विक विश्वास को दाँव पर नहीं लगाया जा सकता। आधुनिक विश्व में स्थायी विजय युद्ध से नहीं, संवाद और संतुलित कूटनीति से ही प्राप्त होती है।

डॉ घनश्याम बादल