14 सितम्बर: हिन्दी दिवस विशेष
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
शिक्षा भारत की प्रगति के प्राण तत्त्व में से एक है, अनादि काल से शिक्षा संस्कृति ने भारत की प्रगतिशीलता की नींव को मज़बूत किया है और इसी के कारण आज भारत विश्व गगन में अपनी शक्ति, शौर्य, सजगता, सहजता, सरलता और संस्कारों का परचम लहरा रहा है। विश्व में भारत आज जिस प्रभुत्वसम्पन्नता का नगाड़ा बजा रहा है, उसकी आधारशिला भारत की भाषा, संस्कार और संस्कृति के साथ-साथ राष्ट्र निर्माता शिक्षक भी हैं।
किसी भाषा का भविष्य केवल उसके बोलने वालों की संख्या से तय नहीं होता, बल्कि इस बात से तय होता है कि उसकी नई पीढ़ी उस भाषा में सोचती, सीखती और सपने देखती है या नहीं। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह मनुष्य की स्मृतियों, संस्कारों, संवेदनाओं और ज्ञान की सबसे सशक्त वाहक होती है। हिंदी के संदर्भ में यह बात और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि हिंदी करोड़ों भारतीयों के जीवन, व्यवहार, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक चेतना से जुड़ी हुई भाषा है। हिंदी का विस्तार केवल साहित्यकारों, पत्रकारों, लेखकों या राजनेताओं के प्रयासों से संभव नहीं है। हिंदी को जन-जन की भाषा, ज्ञान-विज्ञान की भाषा और रोज़गार की भाषा बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका जिस वर्ग की हो सकती है, वह है अध्यापक वर्ग।
अध्यापक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह विद्यार्थियों के विचारों को आकार देता है, उनकी भाषा को संस्कारित करता है और उनके भीतर अपनी संस्कृति तथा समाज के प्रति दृष्टि विकसित करता है।
आज विश्व हिंदी पर गर्व करता नज़र आ रहा है, विश्व में भारत सबसे बड़ा बाज़ार है। जनसंख्या की दृष्टि से देखें तब भी विश्व के सबसे बड़े देशों में भारत अग्रणी है और इसके कारण ही बाज़ार का महत्त्व भी अधिक है और बाज़ार की भाषा हिन्दी है।
एक विद्यार्थी अपने शिक्षक से केवल विषय का ज्ञान नहीं प्राप्त करता, बल्कि उसके बोलने, लिखने, व्यवहार करने और सोचने की शैली से भी बहुत कुछ सीखता है। शिक्षक जिस भाषा को सम्मान देता है, विद्यार्थी भी उसी भाषा को सम्मान देना सीखते हैं। यदि अध्यापक स्वयं हिंदी बोलने में संकोच करे, हिंदी लिखने में लापरवाही बरते या विद्यार्थियों के सामने हिंदी को केवल एक परीक्षा-विषय के रूप में प्रस्तुत करे, तो विद्यार्थी के मन में भी हिंदी के प्रति वही दृष्टिकोण विकसित होगा। इसके विपरीत, यदि शिक्षक सहजता और गर्व के साथ हिंदी का प्रयोग करे, हिंदी में ज्ञान-विज्ञान की चर्चा करे और यह विश्वास पैदा करे कि हिंदी में आधुनिक विषयों को समझना और समझाना पूरी तरह संभव है, तो विद्यार्थियों की भाषा संबंधी मानसिकता बदल सकती है।
आज देश में आवश्यकता है कि शिक्षक वर्ग स्वयं भी कक्षा में हिंदी में संवाद करें, बच्चों को हिंदी बोलने से रोके नहीं, हिंदी को केवल विषय की तरह नहीं, जीवन की भाषा की तरह समझाएँ, भाषा के प्रति हीनभावना समाप्त करें, विद्यालय के नोटिस, कार्यक्रमों के निमंत्रण, प्रमाण-पत्र, प्रोजेक्ट निर्देश, अध्ययन सामग्री और कक्षा संबंधी संवाद में हिंदी का सुंदर और व्यावहारिक प्रयोग सिखाएँ, हिंदी और रोज़गार के बारे में सिखाएँ, अवसर उपलब्ध करवाएँ, कक्षा को हिंदी की प्रयोगशाला बनाएँ, विद्यालय में हिंदी पखवाड़े तक सीमित न रहें, बल्कि पूरे वर्ष हिंदी के लिए गतिविधियाँ संचालित करें। विद्यार्थियों को हिंदी में लिखने, पढ़ने, बोलने और सृजन करने के अवसर दें।
एक शिक्षक यदि प्रतिवर्ष केवल सौ विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति सकारात्मक दृष्टि पैदा करता है और उनमें से दस विद्यार्थी आगे चलकर हिंदी के लिए काम करते हैं, तो यह एक दीर्घकालीन भाषाई आंदोलन का आधार बन सकता है। भाषा आंदोलनों को केवल बड़े मंचों की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी एक शिक्षक की कक्षा ही सबसे बड़ा मंच बन जाती है।
आज के अध्यापक के हाथ में केवल चॉक या कलम नहीं है, उसके हाथ में आने वाली पीढ़ी की भाषाई चेतना है। वह चाहे तो हिंदी को केवल एक विषय बनाए रख सकता है और चाहे तो उसे विद्यार्थियों के आत्मविश्वास, ज्ञान और भविष्य की भाषा बना सकता है। अध्यापक अपनी कक्षा से हिंदी के नवजागरण का शंखनाद करें। अध्यापक राष्ट्र का निर्माता है इसलिए भी उनसे हिंदी के प्रखर ध्वजवाहक बनने की अपेक्षा है।
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’