समाज

सड़ांध मारती व्यवस्थाओं का नतीजा है इंदौर का भागीरथपुरा प्रकरण . . ..

(लिमटी खरे)

एक सप्ताह से अधिक समय हो चुका है, प्रदेश की आर्थिक राजधानी और देश के सबसे साथ सुथरे शहर का तमगा पाने वाले इंदौर शहर के भागीरथपुरा मोहल्ले में अभी भी घरों पर प्रलाप, विलाप की आवाजें सुनाई दे रहीं हैं। दूषित पेयजल के सेवन से 15 लोग काल कलवित हो चुके हैं, जिसमें बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक शामिल हैं।

इस पूरे मामले को अब सियासी रंग में रंगा जा चुका है। कोई भाजपा के साथ है तो कैलाश विजयवर्गीय के साथ नहीं, कोई दोनों के साथ है तो कोई कैलाश विजयवर्गीय के साथ दिख रहा है पर भाजपा के साथ नहीं . . ., कुल मिलाकर सभी दूषित पानी पर ही चर्चारत दिख रहे हैं। इसी बीच कैलाश विजयवर्गीय जिनके विधानसभा क्षेत्र का यह मामला है और वे जिस नगरीय कल्याण विभाग के मंत्री हैं उसी के अधीन नगर निगम की विफलता को लगभग ढांकते हुए कैलाश विजयवर्गीय जैसे उमरदराज, अनुभवी नेता किस राह पर ले चले हैं। एक पत्रकार के साथ साक्षात्कार में वे घंटा जैसे शब्द का उपयोग करते हैं, कहते हैं, फोकट के सवाल मत पूछा करो. . ., पत्रकार यह भी कह रहे हैं कि शब्दों का चयन ठीक से करिए . . ., क्या है यह, किस राह पर चल पड़े हैं आज के सियासी नुमाईंदे! क्या वे यह चाहते हैं कि समाज का दर्पण कहा जाने वाला पत्रकार जगत अपनी नंगी जीभ से उनके तलुओं को साफ करे! ऐसी स्थिति में पत्रकारों के हितों के संवंर्धन की जवाबदेही अपने कांधों पर उठाने का दावा करने वाले पत्रकार संघों को भी स्वसंज्ञान से कैलाश विजयवर्गीय के उन वक्तव्यों और भावभंगिमाओं का विरोध करना चाहिए था, भले ही कैलाश विजयवर्गीय के द्वारा क्षमायाचना कर ली गई हो।

कैलाश विजयवर्गीय का घंटा प्रकरण अनेक दृष्टिकोण खड़े कर रहा है। आज विपक्ष किस तरह का विरोध करता दिखता है। क्या विपक्ष ने कभी प्रभावी विरोध दर्ज कराया है! विपक्ष में चाहे भाजपा रही हो या कांग्रेस सदैव ही विरोध इस तरह का दिखा मानो सत्ता और विपक्ष के आला नेताओं के बीच एक अघोषित करार हुआ हो कि विरोध इतना करना गुरू कि कुर्सी भर न गिरने पाए . . . .

आजाद भारत में लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, छत, स्वच्छ पेयजल, परिवहन के सुगम साधन आदि मुहैया करवाना हुक्मरानों का नैतिक दायित्व है। ये सुविधाएं मूलभूत सुविधाओं की श्रेणी में ही आती हैं। जिनके घर में 80 से अधिक आयु के बुजुर्ग मौजूद हों उनसे पूछा जाए तो पता चलेगा कि मूलभूत सुविधाएं क्या होती हैं। हमारे दादा जी हमें बताया करते थे कि आजादी के पूर्व गोरे अंग्रेज अफसर घोड़ों पर आते थे और पानी, बिजली की मांग करने पर कहा करते थे कि पानी और बिजली सरकार की जवाबदेही नहीं है। यही कारण है कि आजादी के बाद भी कमोबेश हर घर में एक कुंआ जरूर होता था। आज आजाद भारत में अगर लोगों को साफ पानी नहीं मिल पा रहा है और सेमीनार, कांफ्रेंसेज आदि में नेताओं, अफसरों के सामने बोतलबंद पानी रखा हो तो समझा जा सकता है कि जमीनी हालात किस तरह के हैं। इन हालातों को जानते सभी हैं, पर सुधारने का जतन कोई करना ही नहीं चाहता है।

इंदौर के भागीरथ पुरा में लगातार ही गंदे पानी की शिकायत मिलने के बाद भी नगर निगम ध्रतराष्ट्र के मानिंद ही बैठा रहा। जब लोग बीमार पड़ना आरंभ हुए, तब भी नहीं जागा नगर निगम! महापौर कहते हैं कि अफसर सुनते नहीं, यह बात सही मानी जा सकती है क्योंकि प्रदेश में शिवराज सिंह चोहान के कार्यकाल से ही अफसरशाही के बेलगाम घोड़े जिस रफ्तार से दौड़ रहे हैं वह किसी से छिपी नहीं है। महापौर तो महापौर आलम यह है कि विधायक और कई बार तो सांसदों को भी इससे दो चार होना पड़ा है।

देश का शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहां पेयजल की पाईप लाईन्स नाले, नालियों अथवा सीवर लाईन से होकर न गुजर रही हों, पर इंदौर जिसे देश का सबसे स्वच्छ शहर होने का तमगा कई बार मिल चुका है वहां तो सीवर लाईन अभी डाली गई हैं, और उसके अंदर से पाईप लाईन अगर गुजर रही है तो यह तो आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आने वाला काम है। इसके लिए जब भी यह किया गया हो उस दौरान उस कार्य को प्रमाणित करने वाले, उसका भुगतान करने वाले अधिकारियों पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया जाना चाहिए क्योंकि इसके चलते ही पेयजल काल बन गया है।

देखा जाए तो इंदौर के भागीरथपुरा में हुई यह घटना केवल इन्दौर तक सीमित नहीं है बल्कि यह देश के अन्य महानगरों के साथ ही साथ छोटे, बड़े शहरों के लिए भी चेतावनी ही मानी जा सकती है। भारत के विभिन्न महानगरों में ऐसी समस्या को रोकने के लिए आपातकालीन दल तैयार होनी चाहिए और सीवर लाइनों के रखरखाव व जल परीक्षण का कार्य निश्चित अंतराल पर अनिवार्य रूप से होता रहना चाहिए।

देखा जाए तो इस पूरे प्रकरण ने देश के हृदय प्रदेश की राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली और क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है और विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर मिल गया है। हम तो बस यही कहना चाहेंगे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव और नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से कि यह मामला दूषित पेयजल का नहीं वरन जीवन का है, जिसकी रक्षा की जिम्मेदारी हुक्मरानों पर ही आहूत होती है, वे ठहाके लगाकर, घण्टा जैसे शब्दों का प्रयोग करके, कोई सुनता नहीं, यह कहकर अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते, उन्हें जबवादेह बनना होगा, और अगर वे जवाबदेह नहीं हैं तो विपक्ष को निहित स्वार्थ तजकर रियाया के प्रति उन्हें जवाबदेह बनाने में पूरी ताकत झोंकना होगा . . .