कमलेश पांडेय
भारतीय जनता पार्टी अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की सियासी कमर तोड़कर निरंतर आगे बढ़ रही है। इससे भाजपा नीत एनडीए का कुनबा भी लगतार मजबूत हो रहा है। देश के मतदाता भी जातीय और भाषाई प्रतिद्वंद्विता से ऊपर उठकर धुर मुस्लिम तुष्टिकरण की चुनावी राजनीति की बखिया उघेड़ रहे हैं जबकि फ्रीबिज की घोषणाओं पर अब भी मतदाता फिदा हैं। 29 अप्रैल को देश के पांच राज्यों—पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी—के विधानसभा चुनावों के जो एग्जिट पोल आए, उससे भी इसी बात के संकेत मिल रहे हैं। इससे भाजपा और उसके एनडीए साथियों की बल्ले बल्ले है।
वैसे तो अंतिम परिणाम 4 मई को ही आएंगे, लेकिन अब मीडिया की सजगता से अधिकांश एग्जिट पोल के औसत सत्य के निकट होते हैं। लिहाजा यदि एग्जिट पोल सही होते हैं तो इससे जो बड़ा राजनीतिक निष्कर्ष निकलकर सामने आया है, वह यह है कि देश की राजनीति में भाजपा के बेहतर प्रदर्शनों के बावजूद क्षेत्रीय दल अभी भी मजबूत स्थिति में हैं, क्योंकि देश पर 12 वर्षों से शासन कर रही भाजपा, बहुतेरे प्रशासनिक मामलों में कांग्रेस और समाजवादियों की राजनीतिक नकल करके और जरूरत के मुताबिक हिंदुत्व के चोलों को उतार फेंककर उन राज्यों में भी अव्वल प्रदर्शन करती दिखाई दे रही है जहां अल्पसंख्यक मुस्लिम और ईसाई वोट अबतक निर्णायक रहते आये हैं।
ऐसा उलटफेर करके भाजपा/एनडीए कई राज्यों में अपनी पकड़ बढ़ाते दिख रहे हैं। खासकर उत्तरपूर्वी, दक्षिणी और जम्मूकश्मीर जैसे राज्यों में, जो उसकी बड़ी सफलता है। इससे आम चुनाव 2029 में भी उसे राजनीतिक फायदा मिलेगा, क्योंकि भाजपा समेत एनडीए को इससे नई सोच और नई ऊर्जा मिलेगी। जबकि इंडिया गठबंधन की आपसी रस्साकशी उन्हें 2024 की आंशिक सफलता के बाद निरंतर कमजोर करते हुए रसातल की ओर ले जा रही है। इससे कांग्रेस सुप्रीमो राहुल गांधी को राजनीतिक सबक लेनी होगी, क्योंकि वर्ष 2027 और 2028 में भी दर्जनाधिक राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।
यदि राजनीतिक बारीकीपूर्वक इन एग्जिट पोल्स से संकेतों को पढ़ा जाए तो स्पष्ट दिखाई दे रहा हैं कि उत्तर भारत, पश्चिम भारत, मध्य भारत, पूर्वी भारत में मजबूत सियासी पैठ बना चुकी भाजपा अब उत्तर-पूर्व समेत पूर्वी भारत में अपना विस्तार बनाए हुए है। जबकि दक्षिण भारत में भी अपने विरोधियों को राजनीतिक रूप से तोड़ने में वह सफल हो चुकी है। तमिलनाडु में डीएमके और केरल में एलडीएफ का कमजोर होकर सत्ता गंवाने की ओर बढ़ना यह सियासी चुगली कर रहा है कि जल्द ही भाजपा दक्षिण भारत में भी उसी तरह का करिश्मा करेगी, जैसा कि उसने उत्तर-पूर्व के असम और त्रिपुरा में किया है, जबकि पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल में करने जा रही है। इसी प्रकार तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना आदि उसकी पकड़ में जल्द आएंगे। वहीं कर्नाटक में तो वह मजबूत है ही और आंध्रप्रदेश में एनडीए की सरकार है।
यह बात दीगर है कि अपने सियासी गर्दिश के दिनों में भी कांग्रेस दक्षिण भारत, खासकर केरल में पुनर्जीवन के संकेत दे रही है। ऐसा पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर के पुनः कांग्रेस के खेमे में सटने से हुआ। वहीं, क्षेत्रीय दल—डीएमके, टीएमसी आदि—अब भी अपने-अपने राज्यों में थोड़ा कमजोर होने के बावजूद निर्णायक बने हुए दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा, 2029 लोकसभा चुनाव की दिशा में ये चुनाव “राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय राजनीति” की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं। दक्षिण भारत में भाजपा अभी भी पूर्ण प्रभुत्व से दूर दिख रही है, जबकि बंगाल उसका सबसे बड़ा विस्तार क्षेत्र बना हुआ है। पुड्डुचेरी में भी एनडीए मजबूत हुआ है।
चूंकि 2027 और 2028 में भी कई महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिन पर इन पांच राज्यों के चुनावी फलाफल का असर पड़ेगा। 2027 में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, उनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब,
उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात जैसे अहम राज्य शामिल हैं। वहीं, 2028 में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, उनमें कर्नाटक, मध्य प्रदेश,
राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड
मिजोरम जैसे महत्वपूर्ण राज्य शामिल हैं। चूंकि इन चुनावों की अंतिम तिथियाँ भारत निर्वाचन आयोग की अधिसूचना के अनुसार तय होंगी, इसलिए कार्यक्रम में बदलाव संभव है।
इसलिए मौजूदा चुनावी एग्जिट पोल के कतिपय मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:
पहला, असम में भाजपा मजबूत हुई है, क्योंकि एग्जिट पोल भाजपा-एनडीए को लगातार तीसरी बार स्पष्ट बहुमत देते दिख रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि हिमंता विश्व सरमा (Himanta Biswa Sarma) की नेतृत्व शैली और भाजपा का पूर्वोत्तर मॉडल अभी भी प्रभावी है।
दूसरा, भाजपा की रणनीति से पुडुचेरी में भी एनडीए को फायदा होता हुआ नजर आ रहा है, क्योंकि एग्जिट पोल एनडीए की वापसी दिखा रहे हैं। यहां भाजपा ने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर अपना आधार मजबूत किया है।
तीसरा, पश्चिम बंगाल में टीएमसी और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर के बीच भाजपा को बढ़त मिलने के स्पष्ट आसार नजर आ रहे हैं। क्योंकि अधिकांश एग्जिट पोल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच बेहद करीबी मुकाबला दिखाया गया है। वहीं कुछ सर्वे यानी 5 में से 4 भाजपा को सीधी बढ़त दे रहे हैं, जबकि कुछ ममता बनर्जी की वापसी बता रहे हैं। इसका मतलब है कि बंगाल में सत्ता विरोधी लहर और ध्रुवीकरण दोनों साथ-साथ काम कर रहे हैं। चूंकि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत लाखों वोटरों के नाम हटाने को लेकर विवाद है, जिसे भाजपा ने बोगस वोट हटाने के रुप में सही ठहराया है, जबकि टीएमसी ने इसे अपने वोटरों को हटाने की साज़िश बताया है। रुझानों के मुताबिक, महिलाओं ने ममता बनर्जी पर पुनः भरोसा जताया है,जो टीएमसी की बड़ी ताकत है।
चौथा, तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति कायम लेकिन नया मोड़ आने के आसार क्योंकि टीवीके मजबूती से उभरी है और राज्य की सत्ता पाने के करीब पहली बार में ही पहुंच चुकी है। भले ही अधिकांश सर्वे डीएमके गठबंधन की वापसी का संकेत दे रहे हैं, लेकिन अभिनेता विजय (Vijay) की पार्टी टीवीके (TVK) को बड़ी ताकत के रूप में उभरता दिखाया गया है। इसका मतलब है कि एआईडीएमके (AIDMK) का सहयोग टीवीके (TVK) को तमिल राजनीति में मिला तो एक नया राजनीतिक ध्रुव भी बन सकता है।
पांचवां, केरल में कांग्रेस गठबंधन की वापसी से इंडिया गठबंधन को कुछ राहत मिल सकती है। चूंकि
लगभग सभी एग्जिट पोल कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ को बढ़त दे रहे हैं। इसलिए यह संकेत मिलता है कि वाम मोर्चे की लगातार दो कार्यकाल वाली सरकार के खिलाफ सत्ता परिवर्तन की भावना बनी है। इससे कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ को फायदा मिला, जो कांग्रेस के राजनेता शशि थरूर की बड़ी उपलब्धि है।
यदि समग्र राजनीतिक निष्कर्ष निकाला जाए तो भाजपा उत्तर-पूर्व और पूर्वी भारत में विस्तार बनाए हुए है।
कांग्रेस दक्षिण भारत, खासकर केरल में पुनर्जीवन के संकेत दे रही है। क्षेत्रीय दल—डीएमके, टीएमसी आदि—अब भी अपने राज्यों में निर्णायक हैं। 2029 लोकसभा चुनाव की दिशा में ये चुनाव “राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय राजनीति” की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं। दक्षिण भारत में भाजपा अभी भी पूर्ण प्रभुत्व से दूर दिख रही है, जबकि बंगाल उसका सबसे बड़ा विस्तार क्षेत्र बना हुआ है।
कमलेश पांडेय