विश्ववार्ता

इस्लामिक नाटो की चुनौती : भारत के लिए कितना नुकसान, कितनी संभावना?

सौरभ वार्ष्णेय
दुनिया की बदलती भू राजनीतिक परिस्थितियों में नए सामरिक गठबंधनों का उभरना किसी एक देश की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका प्रभाव क्षेत्रीय स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ता है। हाल ही में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच रक्षा सहयोग तथा मुस्लिम देशों के बीच सामरिक समन्वय को लेकर हुई गतिविधियों ने भारत की विदेश नीति के सामने नए सवाल खड़े किए हैं। इन देशों के बीच उभरते रक्षा सहयोग को कुछ विश्लेषक ‘इस्लामिक नाटोÓ की संज्ञा दे रहे हैं। हालांकि, इसे नाटो जैसा औपचारिक, एकीकृत सैन्य गठबंधन मानना अभी जल्दबाजी होगी। भारत के लिए असली प्रश्न यह है कि इस बदलते समीकरण से उसकी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
नाटो एक औपचारिक सैन्य गठबंधन है, जिसकी सदस्यता, संस्थागत व्यवस्था और सामूहिक रक्षा संबंधी स्पष्ट प्रतिबद्धताएं हैं। इसके विपरीत, मुस्लिम बहुल देशों के बीच रक्षा समझौतों और सहयोग की पहल को उसी स्तर का गठबंधन मानने से पहले उसकी शर्तों, सैन्य प्रतिबद्धताओं और वास्तविक कार्यप्रणाली को समझना आवश्यक है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के हित कई मुद्दों पर समान हो सकते हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकताएं हर विषय पर एक जैसी नहीं हैं।
सऊदी अरब की प्राथमिकता अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और आर्थिक विकास की रक्षा करना है। पाकिस्तान अपनी सैन्य और कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करना चाहता है, जबकि तुर्किये क्षेत्रीय राजनीति में अपनी भूमिका बढ़ाने का इच्छुक है। इन देशों का आपसी सहयोग भविष्य में कितना व्यापक होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे साझा हितों को ठोस सुरक्षा व्यवस्था में कितना बदल पाते हैं।
भारत के लिए पहली चिंता पाकिस्तान की भूमिका है। पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध लंबे समय से आतंकवाद, सीमा पार घुसपैठ और सुरक्षा संबंधी विवादों से प्रभावित रहे हैं। यदि किसी नए रक्षा सहयोग के माध्यम से पाकिस्तान को अतिरिक्त सैन्य संसाधन, तकनीकी सहायता, खुफिया सहयोग या कूटनीतिक समर्थन मिलता है, तो इससे भारत की सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। हालांकि, केवल रक्षा समझौते के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सहयोगी देश पाकिस्तान के प्रत्येक कदम का समर्थन करेंगे।
दूसरी चिंता कश्मीर और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरुद्ध संभावित कूटनीतिक लामबंदी की है। यदि कुछ देश पाकिस्तान के पक्ष में साझा रुख अपनाते हैं, तो भारत को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए अधिक कूटनीतिक प्रयास करने पड़ सकते हैं। लेकिन मुस्लिम देशों को एक ही राजनीतिक दृष्टिकोण वाला समूह मानना भी गलत होगा। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के भारत के साथ व्यापार, निवेश और ऊर्जा संबंध हैं, जिनका महत्व उनके पाकिस्तान के साथ संबंधों से अलग है।
तीसरा पहलू रक्षा और सामरिक संतुलन का है। यदि भविष्य में इन देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास, उन्नत हथियारों की आपूर्ति या खुफिया सूचनाओं का व्यापक आदान-प्रदान बढ़ता है, तो भारत को पश्चिमी एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीति की समीक्षा करनी पड़ सकती है। भारत को अपनी समुद्री निगरानी, रक्षा उत्पादन, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी क्षमताओं को लगातार मजबूत करना होगा।
चौथी चिंता ऊर्जा सुरक्षा की है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पश्चिम एशिया के देशों से महत्वपूर्ण मात्रा में तेल और गैस प्राप्त करता है। यदि क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़कर संघर्ष में बदलती है, तो तेल की कीमतों, समुद्री परिवहन और बीमा लागत पर दबाव पड़ सकता है। इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है।
इस बदलते समीकरण का दूसरा पक्ष भी है। सबसे पहला लाभ यह हो सकता है कि भारत अपनी रक्षा तैयारियों और रणनीतिक आत्मनिर्भरता को और गति दे। किसी भी संभावित चुनौती के मद्देनजर स्वदेशी हथियार निर्माण, आधुनिक निगरानी प्रणालियों, मिसाइल रक्षा और समुद्री सुरक्षा में निवेश बढ़ाना दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित में होगा। इससे भारत केवल किसी एक गठबंधन की प्रतिक्रिया में नहीं, बल्कि अपनी व्यापक सुरक्षा जरूरतों के अनुरूप मजबूत बन सकेगा।
दूसरा अवसर कूटनीति का है। भारत के सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और अन्य खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा, व्यापार, निवेश तथा भारतीय प्रवासियों से जुड़े गहरे संबंध हैं। इन देशों के साथ भारत की साझेदारी केवल धार्मिक या राजनीतिक समीकरणों पर आधारित नहीं, बल्कि पारस्परिक आर्थिक हितों पर टिकी है। इसलिए भारत के लिए जरूरी होगा कि वह पाकिस्तान के साथ उनके संबंधों को अपने द्विपक्षीय रिश्तों पर हावी न होने दे।तीसरा लाभ भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने में छिपा है। भारत अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध रखता है। किसी नए क्षेत्रीय गठबंधन के उभरने पर भारत अपनी बहुपक्षीय कूटनीति को और प्रभावी बना सकता है। साथ ही, आतंकवाद विरोधी सहयोग, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के मुद्दों पर साझेदार देशों के साथ संवाद बढ़ा सकता है।
चौथा अवसर यह है कि भारत को पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका स्पष्ट करने का मौका मिल सकता है। यदि भारत आर्थिक सहयोग, निवेश, तकनीक, ऊर्जा साझेदारी और क्षेत्रीय शांति के क्षेत्र में भरोसेमंद भागीदार बना रहता है, तो किसी भी नए सामरिक समीकरण के बावजूद उसकी उपयोगिता बनी रह सकती है।
भारत को इस संभावित गठबंधन को लेकर न तो अनावश्यक भय पैदा करना चाहिए और न ही इसके प्रभाव को कम करके आंकना चाहिए। विदेश नीति का संचालन भावनाओं और धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों, राष्ट्रीय हितों और दीर्घकालीन रणनीति के आधार पर होना चाहिए। भारत को पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों पर सतर्क रहना चाहिए, लेकिन सऊदी अरब, तुर्किये और अन्य मुस्लिम बहुल देशों के साथ अपने संबंधों का मूल्यांकन प्रत्येक देश के वास्तविक व्यवहार के आधार पर करना चाहिए।भारत को खाड़ी देशों के साथ रक्षा संवाद, ऊर्जा आपूर्ति की विविधता, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को मजबूत करना होगा। साथ ही, किसी भी उभरते सैन्य गठबंधन की वास्तविक गतिविधियों, समझौतों और क्षेत्रीय प्रभाव का निरंतर आकलन आवश्यक है।