महर्षि मनु महाराज भारत की अनमोल विरासत हैं। उनके विचार मानवता के मोती हैं। उनका चिंतन मानवता की धरोहर है। उनका विशाल व्यक्तित्व विश्व इतिहास का एक कौतूहल है और उनका कृतित्व संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है। महर्षि मनु की मनुस्मृति भारत का गौरव है। मानवता का सबसे मूल्यवान विश्वास है। मानवीय समाज की एक व्यवस्था का नाम है। राजनीति की पवित्रता का सबसे विश्वसनीय स्रोत है। जी हां , एक ऐसा स्त्रोत जिससे आज भी मानवता का कल्याण हो सकता है और प्राणी मात्र का उद्धार हो सकता है।
विराट व्यक्तित्व के धनी मनु महाराज
महर्षि मनु के क्रांतिकारी विचारों ने प्राचीन काल में भारत के साहित्य को बड़ी गहराई से प्रभावित किया। उनके विशाल व्यक्तित्व ने जिस ऊंचाई को प्राप्त किया था, उससे लोगों ने युग युगों तक प्रेरणा प्राप्त की। वह एक ज्योति स्तंभ के रूप में स्थापित हुए और उस ज्योति ने इतिहास की दीर्घकालिक परंपरा पर अपना प्रकाश फैलाने में सफलता प्राप्त की। यही कारण है कि उन जैसा व्यक्तित्व इतिहास में अन्यत्र खोजना संभव नहीं। उनका मानवतावाद और उनकी अहिंसा,उनकी प्रेम और करुणा उनके आदि संविधान मनुस्मृति में स्पष्ट दिखाई देती हैं। यही भारत की वह आदर्श परंपरा है जिस पर उसे पहले दिन से गर्व था, आज भी गर्व है और आने वाले समय में भी गर्व रहेगा। उनके मानवतावाद और अहिंसा में किसी प्रकार का छल नहीं था। किसी प्रकार का कपट नहीं था। किसी प्रकार का दोगलापन नहीं था।
महर्षि मनु के विराट व्यक्तित्व के कारण ही उनके विधान की चर्चा रामायण, महाभारत, पुराण, ब्राह्मण ग्रंथ आदि में विशेष रूप से की गई है। इन सभी ग्रंथों में उनकी विधि को सर्वमान्य विधि के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। वह ब्रह्मचर्य का दैदीप्यमान सूर्य थे। इसलिए उनके भीतर सात्विक बल था। यह सात्विक बल ही मानवता के लिए सबसे अधिक उपयोगी होता है। यही कारण था कि उनके राजा बनने पर उनके पिता ब्रह्मा जी को ऐसा अनुभव हो रहा था कि जैसे वह स्वयं ही राजा बन रहे हों। महर्षि मनु राजा बने तो उन्होंने मनुस्मृति का निर्माण संसार के पहले संविधान के रूप में किया। जब हम इस ग्रंथ का अध्ययन करते हैं तो पता चलता है कि इसके कुल 12 अध्यायों में महर्षि मनु ने जीवन के किसी क्षेत्र को छोड़ा नहीं है , जिस पर उन्होंने कोई न कोई व्यवस्था न दी हो अथवा जिसके लिए विधि का निर्माण न किया हो ?
मनुस्मृति की महानता
इन अध्यायों के विषय की गंभीरता को समझने से पता चलता है कि महर्षि मनु का चिंतन और दृष्टिकोण बहुत अधिक व्यापक था। संसार के जितने भर भी संविधान वर्तमान काल में प्रचलित हैं, उनमें किसी में भी विषय की इतनी गंभीरता और व्यापकता परिलक्षित नहीं होती, जितनी महर्षि मनु की मनुस्मृति में होती है। इस प्रकार समस्त संसार के प्रचलित सभी संविधान एक ओर और महर्षि मनु का आदि संविधान अर्थात मनुस्मृति एक ओर रखकर तराजू में टोले जाएं तो भी मनु महाराज की मनुस्मृति ही भारी दिखाई देगी।
महर्षि मनु मनुष्य को पूर्ण न मानकर एक ऐसा विद्यार्थी मानते हैं, जिसे पहले समझाने की आवश्यकता होती है। धीरे-धीरे उसे मनुष्य से देव बनाने की ओर लेकर चला जाता है। मनु की मान्यता थी कि मनुष्य रूपी इस विद्यार्थी को पहले पूर्णत्व की प्राप्ति का मार्ग बताया जाए अर्थात एक सुंदर सी व्यवस्था में ढाला जाए और उसके उपरांत उससे अपेक्षा की जाए कि वह विधि का पालन करेगा। महर्षि मनु की इस सोच को उनका यह धर्म ग्रंथ स्पष्ट करता है। जिसे समझ कर यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि आज जिस प्रकार लॉ कॉलेजों में विद्यार्थियों को कानून पढ़ाने पर समय, धन और ऊर्जा को नष्ट किया जा रहा है, वह सारा निरर्थक ही है। आज का कानून मनुष्य को पूर्ण मानकर चलता है। उसे एक सुव्यवस्थित व्यवस्था में ढालने का प्रयास नहीं करता अर्थात उसे मनुष्य बनाने पर ध्यान केंद्रित नहीं करता। उसकी यह मान्यता है कि मैं जिस पर लागू हो रहा हूं, वह सब कुछ जानता है और इसलिए उसे मेरा पालन करना ही चाहिए।
महर्षि मनु के चिंतन और वर्तमान संविधानविदों या विधि विशेषज्ञों अथवा विधिशास्त्रियों के दृष्टिकोण में यह मौलिक अंतर है। जिसके कारण महर्षि मनु सम्मान के उच्चतम शिखर पर आज भी आसीन हैं। उन्हें उनके इस उच्चतम स्थान से अथवा शिखर से कोई इधर-उधर नहीं कर पाया और न कर पाएगा।
डॉ सुरेंद्र कुमार जी और मनुस्मृति
महर्षि मनु की मनुस्मृति को डॉ. सुरेंद्र कुमार जी ने “विशुद्ध मनुस्मृति” के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। जिसमें से उन सभी प्रक्षिप्त अंशों अथवा श्लोकों को बाहर निकालने का स्तुत्य प्रयास किया गया है, जिनके कारण मनु महाराज को कुछ लोगों की आलोचना का पात्र बनना पड़ा है।
डॉ सुरेंद्र कुमार जी के इस ग्रंथ के आधार पर हम यहां पर महर्षि मनु द्वारा मनु स्मृति में उठाए गए कुछ महत्वपूर्ण विषयों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे, जिन्हें समझ कर यह स्पष्ट हो जाएगा कि महर्षि मनु का चिंतन वर्तमान संविधानों की अपेक्षा कितना व्यापक था ? हमें इस बात को समझने में भी सहायता प्राप्त होगी कि हम वर्तमान में ऐसा कोई संविधान किसी भी देश में लागू होता हुआ नहीं देखते जो महर्षि मनु के इस आदि संविधान की बराबरी कर सकता हो ? इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि महर्षि मनु द्वारा स्पष्ट किए गए विषयों पर दी गई व्यवस्थाओं अथवा निर्मित की गई विधि के दृष्टिगत वर्तमान संविधान कितने बौने हैं ?
महर्षि मनु ने मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय पर विधि स्पष्ट की है। इसी अध्याय में कुछ महर्षियों के द्वारा मनु से वर्ण – आश्रम- धर्म के बारे में प्रश्न किए गए हैं। जिनका उन्होंने बहुत ही सटीक उत्तर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जगत की उत्पत्ति से पूर्व जगत की स्थिति क्या थी ? जगत उत्पत्ति और उसका क्रम क्या है ? प्रकृति से महत् आदि तत्वों की उत्पत्ति का रहस्य क्या है ?
पञ्चमहाभूतों की सृष्टि का वर्णन,सूक्ष्म शरीर से आत्मा का संयोग, समस्त विनश्वर संसार की उत्पत्ति, वेदशब्दों से नामकरण एवं विभाग, वेदों का आविर्भाव, धर्म-अधर्म सुख-दुःख आदि का विभाग, सूक्ष्म से स्थूल के क्रम से सृष्टि का वर्णन, जीवों का कर्मों से संयोग, प्राणियों की उत्पत्ति का प्रकार, जरायुज-जीव,अण्डज-जीव, स्वेदज-जीव, उद्भिज्ज-जीव तथा औषधियाँ, वृक्षों में अन्तश्चेतना, परमात्मा की जाग्रत एवं सुषुप्ति अवस्थाएँ, परमात्मा की सुषुप्ति अवस्था में जगत् की प्रलयावस्था, काल-परिमाण
सूर्य द्वारा दिन-रात का विभाग, दैवी दिन-रात उत्तरायण-दक्षिणायन, ब्रह्मा के दिन-रात का वर्णन, युगों का परिमाण,सूक्ष्म पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति के क्रम में आकाश की उत्पत्ति, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी की उत्पत्ति,ब्राह्मण आदि वर्णस्थों के कर्म,धर्मोत्पत्ति विषय ,सदाचार परम धर्म
आचार-हीन को वैदिक कर्मों की फल-प्राप्ति नहीं, सदाचार धर्म का मूल है, विद्वानों द्वारा सेवित धर्म का वर्णन-प्रारम्भ,
धर्म के मूल-स्रोत और आधार श्रुति और स्मृति का परिचय भी दिया गया है।
डॉ राकेश कुमार आर्य