26 नवम्बर, संविधान दिवस
ओ पी सोनिक
हमारे समाज में माना जाता है कि बच्चा जन्म से ही अपनी मुट्ठी में तकदीर लेकर आता है पर भारतीय समाज की संरचना में यह धारणा सटीक नहीं बैठती। जातियों के जंजाल में फंसे समाज में बच्चे की तकदीर और उसके भविष्य की तस्वीर, दोनों को तय करने में जाति की मुख्य भूमिका रही है। इतिहास गवाह है कि इस विषमतावादी संरचना का समाज को अक्सर खामियाजा उठाना पड़ा है। साथ ही सामाजिक संरचना ने भारत की महानता को इस हद तक प्रभावित किया कि भारत को गुलामी के लम्बे दौर से गुजरना पड़ा। आजादी का सपना सामाजिक पृष्ठभूमि से जन्म लेता है, यानी कि आजादी के कई मायने होते हैं।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात करें तो डा0 अम्बेडकर ने कई बार सामाजिक आजादी के सपने को आकार देने की बात की क्योंकि वो कांग्रेस के स्वतंत्रता आन्दोलन को राजनीतिक आजादी का आन्दोलन अधिक मानते थे। एक तरफ राजनीतिक आजादी के कारण एक निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री बन सकता है। महिलाएं भी राष्ट्रपति तक बन सकती हैं। एक दलित महिला बड़े प्रदेश की कई बार मुख्यमंत्री बन सकती है पर आजादी के बाद भी समाज में व्याप्त जातीय शोषण की बढ़ती घटनाएं डा0 अम्बेडकर की आशंकाओं की पुष्टि कर रही हैं।
अगर डा0 अम्बेडकर को आजाद भारत के संविधान निर्माण में मुख्य भूमिका निभाने का अवसर न मिलता तो अंदाजा लगा सकते हैं कि आज के भारत की तस्वीर कैसी होती। डा0 अम्बेडकर ने संविधान सौंपते हुए कहा था कि हमने राजनीतिक लोकतंत्र तो हासिल कर लिया है पर अब इसे सामाजिक लोकतंत्र में बदलना सत्ताधारियों की जिम्मेदारी है। समाज का रूढ़िवादी वर्ग अक्सर संविधान की मूल भावना के विरूद्ध रहा है और परिवर्तनवादियों ने हमेशा संविधान को दिल से लगाया है। यही कारण है कि भारत में कभी संविधान से खतरा बताकर तो कभी संविधान को खतरे में बताकर सत्ता तक पहुँचने के राजनीतिक प्रयास होते रहे हैं। हमारे देश की राजनीति लोगों को यह समझाने में असफल रही है कि हमारा संविधान हर उस खतरे से सुरक्षा की गारंटी देता है जो देश की एकता को चुनौती देने का प्रयास करे।
भारत में पिछले कुछ वर्षों से संविधान को लेकर फिर से एक राजनीतिक बैचेनी का माहौल देखने को मिल रहा है। कभी डा0 अम्बेडकर को संविधान सभा में पहुंचने से रोकने के प्रयास करने वाली राजनीति ने पिछले लोकसभा चुनावों में संविधान को खतरे में बताकर मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया जिसका असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिला। लोगों में संविधान के प्रति जागरूकता के अभाव में राजनीति ऐसे प्रभाव छोड़ पाती है। डा0 अम्बेडकर को मानने वाले प्रत्येक वर्ष 26 नवम्बर को संविधान दिवस के रूप में मनाकर जागरूकता अभियान जरूर चलाते हैं।
सरकारी प्रयासों के क्रम में एक अगस्त 2025 को लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में पेश जानकारी के अनुसार संविधान अंगीकरण के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा 26 नवंबर 2024 को एक वर्ष का स्मरणोत्सव प्रारंभ किया गया जिसे संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि संविधान के स्मरणोत्सव अभियान की थीम ‘‘हमारा संविधान, हमारा स्वाभिमान‘‘ लोगों को आकर्षित करती है। जन चेतना में भारत के संविधान के लिए एक दृश्य चिन्ह बनाना, भारत के संविधान के विवरण के बारे में जागरूकता बढ़ाना, संविधान के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाने वाले महापुरूषों और राजनेताओं को याद कर उसे सार्वजनिक पटल पर लाना, भारत के लोगों में संविधान के प्रति गौरव की भावना पैदा करना, ऐसे तमाम उद्देश्य उपरोक्त अभियान का हिस्सा बने। उक्त जानकारी मिलने तक करीब 140 करोड़ की आबादी वाले भारत में कुल तेरह हजार सात सौ से अधिक संबंधित कार्यक्रम आयोजित किए गए जिनमें एक करोड़ से अधिक नागरिकों ने भाग लिया।
संविधान को याद करना निश्चित रूप से भारत की आजादी के संघर्ष की याद दिलाता है। हमारा संविधान सामाजिक परिवर्तन और देश की प्रगति की गारंटी देने वाला एक ऐसा दस्तावेज है जो सभी नागरिकों को गर्व की अनुभूति कराता है। यह भी सच है कि उपरोक्त गारंटी को नीति और नीयत के फर्क को मिटाकर ही हासिल किया जा सकता है। डा0 अम्बेडकर को संविधान निर्माण कार्य में प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में अहम जिम्मेदारी देकर राजनीतिक उदारता का परिचय देने का जो प्रयास हुआ, वह राजनीतिक मजबूरी थी या डा0 अम्बेडकर की विद्वता का प्रभाव था, लोग इसका आंकलन अपनी सुविधानुसार करते हैं। संविधान दिवस एक ऐसा दिन है जो केवल एक दस्तावेज को याद करने के लिए नहीं बल्कि उस ऐतिहासिक चिंतन, संघर्ष और दूरदर्शिता को समझने के लिए मनाया जाता है जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी। डा0 अम्बेडकर का योगदान सिर्फ संविधान लिखने भर तक सीमित नहीं था बल्कि उन्होंने भारत के सामाजिक ढ़ांचे, न्याय, समानता और मानवाधिकारों की नई परिभाषा गढ़ी।
1946 में जब संविधान सभा का गठन हुआ तब भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा था जहां सामाजिक असमानता जातिगत भेदभाव आर्थिक समानता और औपनिवेशिक शासन की छाया बहुत गहरी थी। देश को एक ऐसी रूपरेखा चाहिए थी जो न केवल शासन चलाने में सक्षम हो बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर भी सुनिश्चित करें। इसके लिए जरूरी है कि संविधान की साक्षरता का देशव्यापी कार्यक्रम भी चलाया जाना चाहिए जिसकी शुरूआत स्कूली बच्चों को संविधान की संक्षिप्त प्रति वितरित करके की जा सकती है। जब सरकार स्कूली बच्चों को मुफ्त पुस्तकें उपलब्ध करा सकती है तो संविधान की प्रतियां भी उपलब्ध करा सकती है। संविधान सभा में देश के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व शामिल था। संविधान हमारी आजादी का एक ऐसा दस्तावेज है जो हमें दुनिया को संदेश देता है कि आजाद भारत की महानता का प्रमाण है संविधान। इस महानता को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम संवैधानिक उद्देश्यों की प्राप्ति को सुनिश्चित करें।
ओ पी सोनिक