देश की संसद अर्थात शीर्ष सभा के सभासद कैसे हों ? – इस पर अपना मत व्यक्त करते हुए ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि ” सभा में चारों वेद, कारण अकारण का ज्ञाता न्यायशास्त्र, निरुक्त, धर्मशास्त्र आदि के वेत्ता विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ सभासद् हों। देश विषयक प्रमुख निर्णय लेने वाली सभा में दस विद्वानों से न्यून न होने चाहियें।”
स्वामी दयानंद जी महाराज ने यहां पर स्पष्ट किया है की सभा में चारों वेदों के ज्ञाता उपस्थित होने चाहिए। प्रश्न है कि स्वामी जी ने सबसे पहले चारों वेदों के ज्ञाता को ही शीर्ष सभा का सभासद होने के लिए योग्य क्यों माना ? इसका उत्तर केवल एक है कि वेद सृष्टि का आदि संविधान है। ईश्वर प्रदत्त सबसे पहला संविधान है। यह संविधान हमें चार अरब 32 करोड़ के सृष्टि काल के लिए मिला है। यद्यपि ईश्वर का यह ज्ञान सृष्टि दर सृष्टि यथावत चलता रहता है। वेद नाम के इस संविधान की व्यवस्थाओं का अर्थात विधिक व्यवस्थाओं का मर्मज्ञ होता है, वही धर्मज्ञ होता है। उससे अपेक्षा की जा सकती है कि वह संसार के लिए उपयोगी चिंतन करेगा और ऐसा कोई भी कार्य नहीं करेगा जिससे किसी का अहित होता हो। वह अपने विवेक का संतुलन बनाकर काम करेगा। विवेक का संतुलन बनाकर ही नीतियों का निर्धारण करेगा और विवेक का संतुलन बनाकर ही उन नीतियों को लागू करेगा। ऐसे व्यक्ति से कभी भी किसी भी प्रकार के उत्पात, उन्माद या उग्रवाद की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
तीन सभासद मिलकर व्यवस्था करें
स्वामी दयानंद जी की यह भी मान्यता रही है कि ” जिस सभा में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद के जानने वाले तीन सभासद् होके व्यवस्था करें उस सभा की की हुई व्यवस्था का भी कोई उल्लंघन न करे। यदि एक अकेला सब वेदों को जानने वाला द्विजों में उत्तम संन्यासी जिस धर्म, कर्तव्य, सिद्धान्त व नीति की व्यवस्था करे, वही श्रेष्ठ धर्म व न्याय है क्योंकि अज्ञानियों के सहस्रों लाखों करोड़ों लोग मिल के जो कुछ व्यवस्था करें उस को कभी न मानना चाहिये।”
स्वामी दयानंद जी महाराज ने कहा कि सभाओं में विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ सभासद् हों’ जब ऐसे लोगों को प्रजा के बीच से निकालकर संसद तक भेजा जाएगा या संसद में स्थान दिया जाएगा तो वह विद्वानों की सभा होगी। न्यायकारी सभासदों से सुभूषित होगी। ऐसे लोग भूसुर कहलाते हैं। भूसुर ही संसार में व्यवस्था बना सकते हैं।
इसलिए भूसुरों को संसद में स्थान मिले, सम्मान मिले – यही ऋषि दयानंद जी का मंतव्य रहा। भूसुरों को जब आप संसद में भेजेंगे तो वे वहां रहकर न्यायपूर्ण नीतियों का विधान करेंगे।
महर्षि दयानन्द जी महाराज की स्पष्ट मान्यता रही कि यदि आप किसी एक व्यक्ति विशेष के हाथों में सारे अधिकार सौंप देंगे तो न्याय, नीति और धर्म तीनों ही मर जाएंगे। स्वामी जी का स्पष्ट कहना था कि ” एक व्यक्ति वा राजा को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देना चाहिए किन्तु राजा जो सभापति, तदधीन सभा, सभाधीन राजा, राजा और सभा प्रजा के आधीन और प्रजा राजसभा के आधीन रहें।”
हमारे ऋषि पूर्वज इस प्रकार के मानवीय स्वभाव की तानाशाही से पूर्व में ही परिचित रहे हैं। यही कारण रहा कि उन्होंने ” शक्ति पृथक्करण ” के सिद्धांत को अपनाया। महर्षि मनु की मनुस्मृति इस संबंध में हमारा सही मार्गदर्शन करती है।
न्याय और दया में है सूक्ष्म अंतर
महर्षि दयानन्द जी महाराज कहते हैं :-
” ईश्वर दयालु एवं न्यायकारी है। न्याय और दया में नाम मात्र ही भेद है, क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से। दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंद होकर दु:खों को प्राप्त न हो, वही दया कहलाती है। जिसने जैसा जितना बुरा कर्म किया है उसको उतना है दण्ड देना चाहिये , उसी का नाम न्याय है। जो अपराध का दण्ड न दिया जाय तो न्याय का नाश हो जाय। क्योंकि एक अपराधी को छोड़ देने से सहस्त्रों धर्मात्मा पुरुषों को दु:ख देना है। जब एक को छोड़ने से सहस्त्रों मनुष्यों को दु:ख प्राप्त होता हो तो वह दया किस प्रकार हो सकती है ? दया वही है कि अपराधी को कारागार में रखकर पाप करने से बचाना। निरन्तर एवं जघन्य अपराध करने पर मृत्यु दण्ड देकर अन्य सहस्त्रों मनुष्यों पर दया प्रकाशित करना।
संसार में तो सच्चा झूठा दोनों सुनने में आते हैं। किन्तु उसका विचार से निश्चय करना अपना अपना काम है। ईश्वर की पूर्ण दया तो यह है कि जिसने जीवों के प्रयोजन सिद्ध होने के अर्थ जगत में सकल पदार्थ उत्पन्न करके दान दे रक्खे हैं। इससे भिन्न दूसरी बड़ी दया कौन सी है ? अब न्याय का फल प्रत्यक्ष दीखता है कि सुख दुख की व्याख्या अधिक और न्यूनता से प्रकाशित कर रही है। इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सबको सुख होने और दुख छूटने की इच्छा और क्रिया करना है वह दया और ब्राह्य चेष्टा अर्थात बंधन छेदनादि यथावत दण्ड देना न्याय कहलाता है। दोनों का एक प्रयोजन यह है कि सब को पाप और दुख से प्रथक कर देना।”
न्यायपरक लोकतंत्र और वेद की व्यवस्था
स्वामी जी ने वेद मंत्रों के आधार पर इस व्यवस्था को दिया। वेद वास्तविक न्यायपरक लोकतंत्र के समर्थक हैं। वेद की लोकतंत्र की इसी पवित्र भावना का सम्मान करते हुए महर्षि मनु द्वारा मनुस्मृति में राजधर्म का प्रतिपादन किया गया। वह भी इसी मत के थे। वेद की स्पष्ट मान्यता रही है कि किसी भी एक व्यक्ति के हाथों में सत्ता सौंपना मनुष्य की अधिनायकवादी प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना होता है। जैसे ही मनुष्य को यह आभास होता है कि अब वह सबसे ऊपर हो गया है और सभी लोग उसकी बुद्धि का लोहा मान रहे हैं अथवा उसके बाहुबल के समक्ष नतमस्तक हैं, तुरंत वह घमंड से फूल जाता है। ऐसा व्यक्ति सत्ता के मद में चूर होकर जनता के हितों के साथ खिलवाड़ कर सकता है। जैसा कि हमने मुस्लिम शासकों को जनता पर अत्याचार करते हुए देखा भी है।
मनुष्य को कभी बेलगाम नहीं होने देना चाहिए। उस पर ऐसी दूसरी बुद्धियों का पहरा रहना चाहिए जो उसकी बुद्धि से कहीं अधिक पवित्र और निर्मल हों। यदि दुर्बुद्धि मनुष्य किसी सद्बुद्धि वाले मनुष्य के ऊपर बैठा दिए जाएंगे तो बहुत संभव है कि वह उस सद्बुद्धि वाले मनुष्य की बुद्धि को ही भ्रष्ट कर दें। इसलिए यह आवश्यक है कि बुद्धिमान के ऊपर और भी अधिक बुद्धिमान व्यक्तियों को बैठाया जाए। जिससे न्याय की परंपरा बनी रहे और मनुष्य किसी का शोषण करने के लिए स्वच्छंदी न होने पाए। इसी को शक्ति पृथक्करण भी कहते हैं। शक्ति पृथक्करण में तीनों सभाएं अपने आप में स्वाधीन होती हैं, परंतु इसके उपरांत भी उनके ऊपर एक राजा नियुक्त किया जाता है। स्पष्ट है कि तीनों सभाओं के सभासद जहां अत्यंत बुद्धिमान और विद्वान लोग बैठे हों तो उनके ऊपर बैठने वाला राजा भी बहुत अधिक बुद्धिमान, न्यायशील, विचारशील, कर्तव्य परायण, संयमी और धर्मशील होना चाहिए।
वैदिक विद्वान और राजा
जब सारी सभाएं अलग-अलग शक्ति संपन्न होकर कार्य करती हैं तो कोई भी एक सभा या उसका सभापति अपने आप को सर्वोच्च नहीं मान सकता। यदि तीनों सभाओं का एक सभापति या सभेश हो तो उसके ऊपर भी ऐसे महामेधा संपन्न लोग बैठे हों जो उसको कभी अनियंत्रित न होने देंगे अथवा तानाशाह नहीं बनने देंगे। राजा के साथ बैठने वाले इन महामेधासंपन्न वैदिक विद्वानों की सम्मति को मानना राजा के लिए आवश्यक होता है।
इससे लोकतंत्र का लोककल्याणकारी स्वरूप सुरक्षित रहता है। जनता के बीच से विभिन्न बौद्धिक शक्तियों को जनप्रतिनिधि के रूप में सभाओं में ले जाकर के बैठाने का उद्देश्य यही होता है कि वे सब स्वतंत्र होकर अपना मत रखें और किसी भी एक व्यक्ति को तानाशाह बनने से रोक दें। लोकतंत्र के साथ-साथ जनता के हितों का संरक्षण हो और धर्म व नीति की व्यवस्था सुचारू रूप से कार्य करती रहे।
यदि आज की व्यवस्था को हम देखें तो शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को अपनाने के उपरांत भी शासन की शक्तियां सामान्य रूप से एक व्यक्ति के हाथों में केन्द्रित रहती हैं। दिखाने के लिए संवैधानिक प्रावधान इस प्रकार के हैं कि हम किसी एक व्यक्ति को तानाशाह बनने देने के विरुद्ध हैं, परंतु व्यावहारिक स्वरूप में जो प्रधानमंत्री सारी शक्तियों को अपने हाथों में केंद्रित करने में सफल हो जाता है, वही सफल माना जाता है। आज का संविधान लोकतंत्र में भी तानाशाही प्रवृत्ति को रोक नहीं पाया है। इसका कारण है कि हम अपने जनप्रतिनिधियों की योग्यताओं को स्पष्ट नहीं कर पाए।
लोकतंत्र में अधिनायकवाद
जब देश स्वाधीन हुआ तो उस समय से ही इस प्रकार की व्यवस्था काम करने लगी। इस प्रकार की प्रवृत्ति अथवा परंपरा लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए घातक है। इससे हमारे देश के विधानमंडलों में पहुंचने वाले जनप्रतिनिधियों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। हमने लोकतंत्र इसलिए अपनाया था कि इसमें हम योग्य से योग्य व्यक्तियों को विधानमंडलों में भेज कर उनकी बौद्धिक शक्तियों का सदुपयोग करते हुए राष्ट्र की उन्नति के कार्य को संपन्न करने में सफल होंगे। परंतु व्यावहारिक रूप में इसके विपरीत कार्य हो रहा है। हमारे जितने भी जनप्रतिनिधि देश के विधानमंडलों में पहुंचते हैं, उनमें से बहुत कम ऐसे होते हैं जिनका बौद्धिक स्तर राष्ट्र की समस्याओं को सुलझाने के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य करने में समर्थ होता है । सामान्य रूप से ये सारे के सारे जनप्रतिनिधि अपने नेता के संकेत पर काम करते हैं। इस प्रकार लोकतंत्र में अधिनायकवाद लोकतंत्र के लोककल्याणी स्वरूप पर भारी हो गया है।
शतपथ ब्राह्मण काण्ड ( 13/2/33 ) के आधार पर स्वामी दयानंद जी महाराज दिखते हैं कि :-
‘राष्ट्रमेव विश्या हन्ति तस्माद्राष्ट्री विशं घातुकः।।
विशमेव राष्ट्रायाद्यां करोति तस्माद्राष्ट्री विशमत्ति न पुष्टं पशुं मन्यत इति।।’
” यदि प्रजा से स्वतन्त्र व स्वाधीन राजवर्ग रहे तो वह राज्य में प्रवेश करके प्रजा का नाश किया करे और अकेला राजा स्वाधीन वा उन्मत्त होके प्रजा का नाशक होता है अर्थात् वह राजा प्रजा को खाये जाता है। इसलिये किसी एक को राज्य में स्वाधीन न करना चाहिये। जैसे मांसाहारी सिंह हृष्ट पुष्ट पशु को मार कर खा लेते हैं, वैसे स्वतन्त्र राजा प्रजा का नाश करता है अर्थात् किसी को अपने से अधिक न होने देता, श्रीमानों व धनिकों को लूट खूंट अन्याय से दण्ड देके अपना प्रयोजन पूरा करेगा।”
राजनीतिशास्त्रियों ने किस प्रकार की शासन व्यवस्था के बाद कैसी शासन व्यवस्था आ जाती है ? – इस पर माथापच्ची करते हुए ऐसे निष्कर्ष निकाले हैं कि जब लोकतंत्र में गिरावट आ जाती है और अधर्मी लोगों का वर्चस्व बढ़ जाता है तो उसकी परिणति तानाशाही और स्वेच्छाचारी शासन के रूप में देखी जाती है। जब हम इन राजनीति शास्त्रियों के इस प्रकार के निष्कर्ष पर विचार करते हैं अथवा उन्हें पढ़ते हैं तो उनकी बौद्धिक क्षमताओं के सामने अक्सर लोग झुक जाते हैं। वे सोचते हैं कि इस प्रकार का निष्कर्ष निकालने वाले राजनीतिशास्त्री वास्तव में कितने महान हैं और उनकी बौद्धिक क्षमताएं कितनी व्यापक हैं ? जबकि हमको ज्ञात होना चाहिए कि लोकतंत्र को मारकर जब लोग शासन सत्ता को असुरक्षित हाथों में सौंप देते हैं या कोई भी उन शासकीय अधिकारों का हनन कर लेता है तो वही होता है जो स्वामी दयानंद जी महाराज ने उपरोक्त वेद मंत्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है।
इसका अभिप्राय है कि हमारे वेदों में ही यह स्पष्ट है कि शासन किन हाथों में सुरक्षित रह सकता है और किन हाथों में शासन की बागडोर जाने पर लोकतंत्र लूटतंत्र में परिवर्तित हो जाता है ? इसलिए स्वामी जी कहते थे कि ” वेदों की ओर लौटो।” उनका ऐसा कहने का अर्थ था कि यदि आप वेदों की ओर लौटेंगे तो आपके और वेदों के बीच में किसी दूसरे की भ्रष्ट बुद्धि खड़ी दिखाई नहीं देगी। भ्रष्ट बुद्धि से हमारा अभिप्राय है ऐसे लोग जो अपनी प्रशंसा कराने के चक्कर में हमें वेद के प्रकाश से वंचित कर देते हैं।
आज ऐसे अनेक तथाकथित बुद्धिजीवी हैं जिन्होंने अपनी आरती उतरवाने के चक्कर में हमें वेदों से दूर कर दिया है।
स्वामी दयानंद जी की मान्यता
स्वामी दयानंद जी की मान्यता रही कि ” यदि एक अकेला, सब वेदों का जाननेहारा व द्विजों में उत्तम संन्यासी जिस धर्म की व्यवस्था करे, वही श्रेष्ठ धर्म है क्योंकि अज्ञानियों के सहस्रों लाखों करोड़ों मिल के जो कुछ व्यवस्था करें उस को कभी न मानना जो ब्रह्मचर्य, सत्यभाषदणादि व्रत, वेदविद्या वा विचार से रहित जन्ममात्र से अज्ञानी वा शूद्रवत् वर्तमान हैं उन सहस्रों मनुष्यों के मिलने से भी सभा नहीं कहलाती। जो अविद्यायुक्त मूर्ख वेदों के न जाननेवाले मनुष्य जिस धर्म को कहे, उस को कभी न मानना चाहिये। क्योंकि जो मूर्खों के कहे हुए धर्म के अनुसार चलते हैं, उनके पीछे सैकड़ों प्रकार के पाप लग जाते हैं। इसलिये तीनों विद्यासभा, धर्मसभा और राज्यसभाओं में मूर्खों को कभी भरती न करें। किन्तु सदा विद्वान और धार्मिक पुरुषों का ही स्थापन करें।”
संस्कृत संस्कार और संस्कृति से हीन मूर्ख लोगों को आज हम संसद सहित देश के प्रत्येक विधानमंडल में भेज रहे हैं। सारी व्यवस्था को इन संस्कारहीन लोगों ने अपने अधीन कर लिया है। रही सही कमी देश के वयस्क मताधिकार ने पूरी कर दी है। जिसके फलस्वरुप हत्यारे, लुटेरे, बदमाश किस्म के लोग भी देश के विधानमंडलों में पहुंच रहे हैं। जनता जनप्रतिनिधि चुनते समय जाति, संप्रदाय, भाषा, प्रांत के आधार पर लोगों को अपना मत देती है। जिससे देश के विधानमंडलों में भी जाति, संप्रदाय, भाषा, प्रांत की बातें देखने व सुनने को मिलती रहती हैं । राजनीति में रहने वाले लोग अक्सर अपने भाषणों में ऐसा कहते मिलते हैं कि मेरे लिए मेरी भाषा पहले है, मेरा प्रांत पहले है या मेरा संप्रदाय पहले है। अन्य सब कुछ मेरे लिए बाद में है। जब जनप्रतिनिधियों की या राजनीति में रहने वाले लोगों की सोच इस प्रकार की हो गई हो तो आप इसके अंतिम परिणाम का अनुमान अपने आप लगा सकते हैं ?
आज के विधानमंडलों की स्थिति
मूर्खों को जनप्रतिनिधि बनाकर विधानमंडलों में भेजना आज के समय में सरल हो गया है। जबकि विद्वानों को विधानमंडलों में शोभायमान करना अत्यंत कठिन हो गया है। उनकी स्थिति ‘ बेचारे ‘ की हो गई है। हमारे वर्तमान संविधान में सौ से अधिक संशोधन हो चुके हैं। ये सारे के सारे संवैधानिक संशोधन तथाकथित लचीले संविधान को और अधिक जनोपयोगी बनाने के नाम पर किए गए हैं। परंतु इस पर कोई संवैधानिक संशोधन नहीं लाया गया है कि संविधान की वर्तमान शासन प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए कैसे विद्वान लोगों को जनप्रतिनिधि बनाकर भेजा जाए और मूर्ख व अपराधी किस्म के लोगों को जनप्रतिनिधि बनने से रोका जाए ? मनु महाराज की व्यवस्था है कि : –
शुचिना सत्यसन्धेन यथाशास्त्रानुसारिणा ।
प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥
भावार्थ : धन आदि से पवित्रात्मा, सत्य संकल्प, न्यायशास्त्र के अनुसार चलने वाले,उत्तम सहायकों – परामर्शदाताओं से युक्त, बुद्धिमान् राजा से वह दण्डविधान न्यायानुसार चलाना सम्भव है। कहने का तात्पर्य है कि राजा के सहायक और परामर्शदाता धन आदि से पवित्र आत्मा वाले होने चाहिए, न्यायशास्त्र के अनुसार चलने वाले होने चाहिए। उनकी नियत में किसी भी प्रकार का खोट नहीं होना चाहिए। चरित्र उज्जवल होना चाहिए। सोच स्पष्ट होनी चाहिए। हृदय में पवित्रता होनी चाहिए। अंत:करण मलीन वासनाओं से मुक्त होना चाहिए। उनके लिए समाज सेवा और राष्ट्र सेवा प्रथम होनी चाहिए। मानव सेवा उनके रोम-रोम में बसी होनी चाहिए।
स्वामी दयानंद जी महाराज उपरोक्त श्लोक का अर्थ करते हुएलिखते हैं- ” इसलिए जो पवित्र, सत्पुरुषों का संगी, राजनीतिशास्त्र के अनुकूल चलने हारा, धार्मिक पुरुषों के सहाय से युक्त बुद्धिमान् राजा हो, वही इस दण्ड को धारण करके चला सकता है।”
वही राजा यशस्वी होता है…
स्वामी जी की यह भी मान्यता थी कि जो राजा अपने इस प्रकार के परामर्शदाता विद्वानों के कहे अनुसार चलता है और न्याय के अनुसार दंड देता है, उस राजा के यश में वृद्धि होती है। मनु महाराज कहते हैं कि ऐसे राजा का यश वैसे ही दूर-दूर तक संपूर्ण जगत में फैल जाता है, जैसे पानी पर डालने से तेल की बूंद चारों ओर फैल जाती है। यह आवश्यक नहीं है कि ऐसे राजा के पास बड़े-बड़े खजाने हों। वह धनहीन होकर भी यश प्राप्त करता है और यही उसका सबसे बड़ा धन होता है। इसके सामने अच्छे-अच्छे लोग नतमस्तक हो जाते हैं।
राजधर्म संबंधी विषय पर विचार करते हुए और व्यवस्थाएं देते हुए मनु महाराज स्पष्ट करते हैं कि न्यायविरुद्ध आचरण करने से राजा का यशोनाश होता है।
अतस्तु विपरीतस्य नृपतेरजितात्मनः ।
संक्षिप्यते यशो लोके घृतबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३४॥
( विशुद्ध मनुस्मृति)
भावार्थ : जो राजा न्याय और सावधानीपूर्वक दंड का व्यवहार नहीं करता है और अजितेंद्रिय होता है, न्याय के पथ को छोड़कर अर्थात न्याय के विपरीत आचरण करते हुए आगे बढ़ता है और लोगों के अधिकारों का हनन करते हुए अपराध पूर्ण आचरण करता है, उसके बारे में समझ लेना चाहिए कि उसका यश जल में पड़े घी के बिन्दु के समान लोक में कम होता जाता है। उसका यश धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है और कई बार ऐसा राजा जीते जी ही यशोनाश होने से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
राजा को यशोनाश से बचना चाहिए
राजा का यशोनाश न हो और उसकी निरंतर यशवृद्धि होती रहे, इसके लिए आवश्यक है कि वह सदा विद्वानों के बीच बैठकर सदग्रंथों पर चिंतन-मंथन करता रहे। लोक कल्याण के लिए जिस पवित्र बुद्धि की आवश्यकता होती है, उसका परिष्कार करता रहे। राजा के लिए कुसंग विष के समान होता है। जिस व्यक्ति की बुद्धि मलीन होती है, वह राजा को भ्रष्टाचार के लिए उकसा सकता है। व्यभिचार के लिए उकसा सकता है या ऐसे किसी कायरतापूर्ण कार्य के लिए उकसा सकता है जो राष्ट्र के लिए घातक हो सकता है। उसके पराक्रम पर ग्रहण लगा सकता है अथवा उसे पुरुषार्थ से मुख मोड़ने की शिक्षा दे सकता है। इसलिए विद्वानों , विचारकों और राष्ट्रभक्तों के बीच से अयोग्य लोगों को लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से विधानमंडलों का सदस्य बनाकर उन्हें जनप्रतिनिधि बनाना राष्ट्र के साथ छल करने के समान है।
जनप्रतिनिधि केवल अपने नेता के पीछे चलने वाले न हों। न ही वे संसद में केवल हाथ उठाने या अपने नेता के किसी कथन पर मेजें थपथपाने का काम करने वाले हों। उनके भीतर अपना विवेक होना चाहिए और राष्ट्र के कल्याण के लिए अपने स्वस्थ विचारों को प्रकट करने की बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए। उन्हें जनता के धन से चुनकर देश के विधान मंडलों में भेजा जाता है और जनता का धन ही उनकी सुविधाओं पर खर्च किया जाता है। यह केवल लोकतंत्र की प्रक्रिया की खानापूर्ति करने के लिए नहीं है, अपितु लोकतंत्र की अनिवार्यता है। इस अनिवार्यता का प्रतिफल केवल एक ही हो सकता है कि उनके भीतर भरपूर बौद्धिक क्षमताएं होनी चाहिए। उनका विद्वान होना अनिवार्य किया जाना चाहिए । राष्ट्र की समस्याओं को वे समझने वाले हों, यह भी अनिवार्य किया जाना चाहिए। उनकी विद्वता और जितेन्द्रियता लोगों के लिए अनुकरणीय होनी चाहिए। मनु महाराज के दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो हमारे सांसदों के लिए संविधान में इस प्रकार की स्पष्ट व्यवस्था की जानी समय की आवश्यकता है।
राजा सभी वर्णस्थ धर्म का रक्षक
आगे महर्षि मनु बहुत पते की बात लिखते हुए कहते हैं :-
स्वे धर्मे निविष्टानां सर्वेषामनुपूर्वशः ।
वर्णानामाश्रमाणां च राजा सृष्टोऽभिरक्षिता ॥ ३५॥ (वही )
भावार्थ: राजा सभी वर्णस्थ्य धर्मों कर रक्षक होना चाहिए। राजा के बारे में हमें ध्यान रखना चाहिए कि वह सभी प्राजजनों का रक्षक होने से सर्वरक्षक परमेश्वर का प्रतिनिधि हो जाता है। इसलिए राजा को कभी प्रजा का हितभक्षक नहीं होना चाहिए। “अपने-अपने धर्मों में राजा को बनाया है अर्थात् राजा के पद पर आसीन क्रमशः चारों वर्णों और आश्रमों के ‘रक्षक’ के रूप में व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह सब वर्णस्थ और आश्रमस्थ व्यक्तियों को उनके धर्मों में प्रवृत्त रखे और उनकी सुरक्षा करे। समाज को धर्म अर्थात् नियम व्यवस्था में चलाने के लिए और उसकी सुरक्षा के लिए ही राजा और राज्य की संकल्पना होती है।”
ऐसे प्रजा हितरक्षक राजा के लिए मनु व्यवस्था करते हैं कि राजा वेदवेत्ता आचार्यों की मर्यादा में रहे। ऐसे वेदवेत्ता आचार्य राजा को कभी पथभ्रष्ट नहीं होने देंगे। यदि राजा किसी स्वार्थवश धर्मभ्रष्ट अथवा पथभ्रष्ट होने का प्रयास भी करेगा तो भी उसे संभाल लिया जाएगा। राजा के लिए मनुस्मृति में उपदेश किया गया है कि वह प्रातः काल में विद्वानों से शिक्षा ग्रहण करे। आचरण चरित्र की शिक्षा प्राप्त करें। विद्वानों की संगति यदि निरंतर मिलती रहेगी तो राजा कभी भी पतित नहीं होगा। महर्षि मनु योग्य, कुलीन, साहसी और विद्या में निपुण लोगों को जनप्रतिनिधि, मंत्री और अमात्य बनाने के समर्थक थे।
महर्षि मनु की मान्यता थी कि मंत्रियों के बिना राज्य का कार्य वैसे ही असंभव है जैसे पहियों के बिना रथ का चलाना।
वे 7-8 ईमानदार मंत्रियों के परामर्श पर बल देते थे।
नोट: लेखक की ” मनुस्मृति और भारतीय संविधान ” नामक पुस्तक से जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है। पुस्तक का मूल्य ₹250 है।
डॉ राकेश कुमार आर्य