डॉ. शैलेश शुक्ला
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब वैश्विक समुदाय ने संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की स्थापना की, तब उसका मूल उद्देश्य स्पष्ट था—भविष्य में युद्धों को रोकना, राष्ट्रों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना तथा वैश्विक शांति और सुरक्षा को स्थायी आधार प्रदान करना किंतु इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में जब विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में एक साथ अनेक युद्ध और सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ अपने मूल उद्देश्य में सफल रही हैं। यूक्रेन, गाजा, सूडान, यमन और कई अन्य क्षेत्रों में लगातार जारी हिंसा इस बात का संकेत देती है कि वैश्विक शांति व्यवस्था का ढांचा गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सामूहिक प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।
उप्साला कॉन्फ्लिक्ट डेटा प्रोग्राम के अनुसार वर्ष 2023 में विश्व में 59 राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष दर्ज किए गए जो 1946 के बाद सबसे अधिक संख्या है। यह आंकड़ा केवल संघर्षों की वृद्धि ही नहीं बल्कि इस तथ्य का भी प्रमाण है कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जिस शांति काल की आशा की जा रही थी, वह अपेक्षा के अनुरूप स्थायी नहीं हो सका। उसी वर्ष वैश्विक स्तर पर संगठित हिंसा से लगभग 154000 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई जबकि 2022 में यह संख्या 310000 थी। यद्यपि मृत्यु दर में उतार-चढ़ाव देखा गया किंतु सक्रिय संघर्षों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि विश्व व्यवस्था में अस्थिरता गहराती जा रही है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इन संघर्षों को रोकने या नियंत्रित करने में सीमित सफलता ही प्राप्त कर पा रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को वैश्विक शांति और सुरक्षा का मुख्य संरक्षक माना जाता है किंतु व्यवहार में उसकी संरचना और निर्णय प्रक्रिया कई बार उसकी प्रभावशीलता को सीमित कर देती है। स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो अधिकार के कारण कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव केवल इसलिए पारित नहीं हो पाते क्योंकि महाशक्तियों के भू-राजनीतिक हित उनसे टकराते हैं। यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में रूस ने अनेक प्रस्तावों पर वीटो का प्रयोग किया, जबकि गाजा संघर्ष के दौरान भी विभिन्न प्रस्ताव स्थायी सदस्यों के मतभेदों के कारण लंबित या विफल रहे। इस स्थिति ने संयुक्त राष्ट्र की निष्पक्षता और क्षमता दोनों पर प्रश्न खड़े किए हैं, क्योंकि जब वही राष्ट्र, जिन पर शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी है, स्वयं संघर्षों में पक्षकार बन जाते हैं या अपने सहयोगियों के पक्ष में निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, तब संस्था की विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सीमित प्रभावशीलता का एक अन्य संकेत वैश्विक सैन्य व्यय में लगातार हो रही वृद्धि है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार वर्ष 2024 में विश्व का कुल सैन्य व्यय 2.718 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे अधिक स्तर है और पिछले 10 वर्षों से लगातार बढ़ रहा है। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 2.5 प्रतिशत भाग सैन्य खर्च पर व्यय किया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि राष्ट्र सुरक्षा के लिए सामूहिक संस्थाओं पर भरोसा करने के बजाय अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल हथियारों की दौड़ को बढ़ावा देती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की उस भूमिका को भी कमजोर करती है, जिसमें वे सामूहिक सुरक्षा और संघर्ष-निवारण के माध्यम से युद्ध की आवश्यकता को कम करने का प्रयास करती हैं।
हाल के वर्षों में विश्व के कई प्रमुख संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मध्यस्थता और शांति स्थापना प्रयासों की प्रभावशीलता सीमित होती जा रही है। यूक्रेन युद्ध के दो वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद स्थायी और सर्वमान्य समाधान नहीं निकल सका। इसी प्रकार पश्चिम एशिया में इजराइल और हमास के बीच हिंसा बार-बार युद्धविराम के बावजूद पुनः भड़क उठती है। सूडान में आंतरिक संघर्ष ने मानवीय संकट को जन्म दिया, किंतु अंतरराष्ट्रीय समुदाय समय रहते निर्णायक हस्तक्षेप नहीं कर सका। इन सभी उदाहरणों में यह देखा गया कि संस्थाएँ बयान जारी करने, मानवीय सहायता प्रदान करने और कूटनीतिक प्रयास करने तक तो सक्रिय रहीं, किंतु संघर्षों को शीघ्र समाप्त कराने या दीर्घकालिक शांति स्थापित करने में अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की इस विफलता के पीछे कई संरचनात्मक और राजनीतिक कारण हैं। संयुक्त राष्ट्र की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति संतुलन पर आधारित है, जबकि आज का विश्व बहुध्रुवीय हो चुका है। नए उभरते राष्ट्र और क्षेत्रीय शक्तियाँ वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रही हैं, किंतु सुरक्षा परिषद की संरचना में अब तक व्यापक सुधार नहीं हो सका है। परिणामस्वरूप, अनेक राष्ट्र स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से बाहर या हाशिये पर महसूस करते हैं, जिससे संस्थाओं की वैधता और प्रभावशीलता दोनों प्रभावित होती हैं।
इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय कानून और संस्थाओं की शक्ति मुख्यतः सदस्य राष्ट्रों की सहमति और सहयोग पर निर्भर करती है। यदि कोई शक्तिशाली राष्ट्र किसी निर्णय को मानने से इनकार कर देता है या प्रतिबंधों को नजरअंदाज करता है, तो संस्थाओं के पास उसे बाध्य करने के सीमित साधन ही होते हैं। यही कारण है कि कई बार अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों या परिषदों के निर्णय नैतिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हुए भी व्यवहार में लागू नहीं हो पाते। इससे यह संदेश जाता है कि वैश्विक व्यवस्था में नियमों से अधिक शक्ति और प्रभाव का महत्व है, जो संस्थागत व्यवस्था के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है।
निरंतर हो रहे युद्धों का मानवीय और आर्थिक प्रभाव भी इस विफलता को और अधिक स्पष्ट करता है। युद्धों के कारण लाखों लोग विस्थापित हो रहे हैं, शरणार्थी संकट बढ़ रहा है और अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाएँ अस्थिर हो रही हैं। जब अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इन संकटों को समय रहते रोक नहीं पातीं, तो उनका ध्यान संघर्ष के बाद राहत और पुनर्वास पर केंद्रित हो जाता है जबकि मूल उद्देश्य युद्ध को रोकना और शांति बनाए रखना था। इस प्रकार संस्थाएँ प्रतिक्रियात्मक भूमिका में सिमट जाती हैं, जबकि उनसे अपेक्षा सक्रिय और निवारक भूमिका की थी।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि आधुनिक युद्धों का स्वरूप पारंपरिक युद्धों से भिन्न हो गया है। अब केवल दो राष्ट्रों के बीच सीधी लड़ाई ही नहीं, बल्कि प्रॉक्सी युद्ध, साइबर आक्रमण, आतंकवाद और गैर-राज्यीय सशस्त्र समूहों की भूमिका भी बढ़ गई है। इन जटिल और बहुस्तरीय संघर्षों से निपटने के लिए पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संस्थागत ढांचे पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हैं। जब संघर्ष स्पष्ट रूप से दो राष्ट्रों के बीच न होकर अनेक पक्षों और गुटों में बंटा हो, तब मध्यस्थता और शांति स्थापना और भी कठिन हो जाती है।
इसके बावजूद यह कहना भी पूर्णतः उचित नहीं होगा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ पूरी तरह विफल हो चुकी हैं। उन्होंने अनेक अवसरों पर शांति वार्ताओं को संभव बनाया, मानवीय सहायता पहुंचाई और अंतरराष्ट्रीय कानून तथा मानवाधिकार के मानकों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किंतु समस्या यह है कि उनकी सफलता अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है, जबकि उनकी विफलताएँ व्यापक और प्रत्यक्ष रूप से सामने आती हैं। जब युद्ध रुकता है तो उसे कूटनीतिक सफलता के रूप में कम देखा जाता है लेकिन जब युद्ध जारी रहता है तो संस्थाओं की सीमाएँ स्पष्ट रूप से उजागर हो जाती हैं।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य यह संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में संरचनात्मक सुधार, निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता, क्षेत्रीय संगठनों के साथ बेहतर समन्वय और वैश्विक शक्ति संतुलन के अनुरूप प्रतिनिधित्व आवश्यक है। यदि सुरक्षा परिषद जैसे प्रमुख निकायों में सुधार नहीं किए जाते और वीटो जैसे प्रावधानों की समीक्षा नहीं होती, तो यह संस्थाएँ धीरे-धीरे अपनी प्रभावशीलता और नैतिक अधिकार दोनों खो सकती हैं।
अंततः निरंतर हो रहे अंतरराष्ट्रीय युद्ध केवल राष्ट्रों के बीच असहमति का परिणाम नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक शासन व्यवस्था की सीमाओं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सामूहिक विफलता का भी संकेत हैं। जब विश्व समुदाय ने इन संस्थाओं का निर्माण किया था तब आशा थी कि भविष्य की पीढ़ियाँ युद्ध की भयावहता से मुक्त रह सकेंगी किंतु आज भी यदि संघर्ष और हिंसा वैश्विक राजनीति का प्रमुख साधन बने हुए हैं, तो यह आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय आत्ममंथन करे और यह स्वीकार करे कि केवल संस्थाओं का अस्तित्व पर्याप्त नहीं है; उन्हें समय के अनुसार सशक्त, लोकतांत्रिक और प्रभावी बनाना भी उतना ही आवश्यक है। तभी यह संभव होगा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ केवल कागजी ढांचे न रहकर वास्तव में वैश्विक शांति और सुरक्षा की विश्वसनीय संरक्षक बन सकें।
डॉ. शैलेश शुक्ला