लेख

साम्राज्य और साहित्य दोनों के सर्जक:अयोध्या के महाराजा मानसिंह

आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी 

महाराजा मानसिंह को अयोध्या का पावन भूमि भी दीर्घ समय तक अपने अंचल की छाया में ना रख सकी थी। उन्होंने अपने पिता और तातुल्य से बचपन से ही युद्ध- कौशल का साक्षात्कार किया और साम्राज्य को विभिन्न संरचनाओं द्वारा विस्तृत आयाम भी दिया लेकिन मन में वैराग्य आने पर सब कुछ तिलांचलकर वृंदावन में भक्ति रस की साधना में लीन हो शाश्वत साहित्य का सृजन भी किया।

अतीत का इतिहास :- 

शाकद्वीपीय ब्राह्मण सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था जो अयोध्या के पलिया में आकर बस गये थे। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। इनमें से तीन ओरी सिंह , दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार किया था। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी दैवी कारणों या अपने विस्तार वादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व बचा ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए तिरोहित हो गए होंगे।ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह निसंतान थे। उन्होंने अपने भतीजे अर्थात भाई दर्शन सिंह के पुत्र मान सिंह को गोद ले लिया था। ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह की भांति उनके भाई दर्शन सिंह ने मिलकर मेहदौना की जागीर को बहुत आगे बढ़ाया था। 2/5 पैतृक और दोनों द्वारा अर्जित संपत्ति के मालिक मान सिंह हो ही गए थे। पिता की पीढ़ी में एक मात्र इच्छा सिंह का पृथक अस्तित्व रहा। जो सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे। इस प्रकार मान सिंह उनके हिस्से के भी वारिस हो गए। उनके शेष दो पितृव्य शिवदीन और देवीप्रसाद के बारे में कोई उल्लेख न मिलने से उनका हिस्सा भी इन्हीं मानसिंह के पास आ गया होगा।

अनेक उपाधियो के धारक :- 

महाराजा मानसिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड (Knighthood) के तहत सम्मानित व्यक्तियों को दी जाने वाली ‘सर’ की एक सर्वोच्च उपाधि प्रदान की थी । यह सम्मान कला, साहित्य, खेल, विज्ञान या सार्वजनिक सेवा में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। उन्हें एक और सम्मानजनक उपाधि बहादुर भी मिली थी जो तुर्की भाषा से आई है, जिसका अर्थ “वीर” या “साहसी” होता है। ब्रिटिश शासन के दौरान, यह उपाधि विशिष्ट जन कल्याणकारी कार्यों या निष्ठापूर्ण सेवा के लिए दी जाती थी। 

के.सी.एस.आई.KnightCommander of the Order of the Star of India

नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया (KCSI) 1861 में महारानी विक्टोरिया द्वारा स्थापित ‘द मोस्ट एक्सॉल्टेड ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया’ का दूसरा सबसे वरिष्ठ वर्ग था। यह ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय रियासतों के शासकों, सरदारों और अधिकारियों को उनकी निष्ठा और सेवाओं के सम्मान में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित नाइटहुड (Sir) खिताब था। इस गौरव को भी मानसिंह जी ने हासिल कर लिया था।

क़ायमजंग जिसका अर्थ स्थिर या दृढ़ युद्ध होता है। यदि इसे उर्दू/फारसी शब्दों (Qayam = स्थिर, Jang = युद्ध) के संयोजन के रूप में देखा जाए, तो इसका मतलब ‘लंबे समय तक चलने वाली’ या ‘दृढ़ता से लड़ी जाने वाली’ लड़ाई हो सकता है। यह एक ऐसी जंग या संघर्ष को दर्शाता है जो रुकी नहीं है और निरंतर जारी है। इस उपाधि को भी मानसिंह जी अर्जित कर चुके थे। इसके अलावा 

द्विजदेव (साहित्यिक ) उपाधि भी उन्होंने अंगीकार कर लिया था और उच्च कोटि की साहित्यिक रचना का सृजन किया था।

जीवन परिचय :- 

‘तारीखें अयोध्या’ की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि उनका जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई को बहराइच, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि.तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं कहीं उनको 1871 में मृत्यु दिखाया गया है। 

         राजा दर्शनसिंह के मरने पर सारे राज में गड़बड़ मच गया।जिन ताल्लुकेदारों का राज राजा बख़तावर सिंह ने ले लिया था, सब बिगड़ गये और अपनी-अपनी ज़मींदारी दबा बैठे हुए थे। इन्हें बड़ी सूझ बूझ से राजा मान सिंह ने सुलझाया था। उनके पिता अयोध्या के राजा दर्शनसिंह थे उनके तीन बेटे थे – 

1.रामाधीन सिंह – बड़े होने के कारण राजा रामाधीन पाठक सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। ये बड़े शिव भक्त थे। राज काज में रुचि कम थी। बाद में अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ शाहगंज का महल छोड़ बनारस का रुख कर लिया। वहां वह शिव भक्ति में खूब रम गए और प्रसन्न भी थे। शासकीय जीवन में 

1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921- 1.II देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। अपनी पीढ़ी के अपने बड़े भाई और अपना हिस्सा तो इन्होंने पहले ही पा लिया था।

2.रघुबर दयाल सिंह – 

दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि)की उपाधि पाए थे 

 वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली। राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी। बस्ती जिले के हर्रैया तहसील के परशुराम पुर ब्लाक में गोण्डा के सीमा पर धनुगवां के दो गांव है एक धनुगवां खुर्द और दूसरा धनुगवां कला जो बस्ती से 52 किमी. और परशुरामपुर से 8- 9 किमी. की दूरी पर बस्ती गोंडा के सीमा पर यह गांव पर बसा हुआ है।

3.हनुमान सिंह उर्फ राजा मान सिंह :- 

इनको फौज की कमान मिली हुई थी। 

जमींदारी छोड़ अंग्रेजों की शरण में जाने की मंत्रणा इनके कुल खानदान में हो रही थी। इनके कुछ और प्रतिष्ठित अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि ये अपना देश छोड़ कर अंग्रेजी राज में चले जायें। जो धन अपने पास है उससे दिन कट जायँगे। उस समय महाराजा मानसिंह जिनका पूरा नाम हनुमानसिंह था, केवल 18 वर्ष के थे। उनकी छोटी अवस्था के कारण उनकी कोई सुनता न था। महाराजा मानसिंह में उत्साह भरा हुआ था। उन्होंने यह सोचा कि बादशाही को छोड़ कर अंग्रेजी राज में जाकर रहना, खाना और पाँव फैला कर सोना बनियों का काम है। हमारे पूर्व-पुरुषों   

ने बड़ी वीरता दिखाई जिससे उनको इतनी प्रतिष्ठा मिली। हमको भी चाहिये कि ऐसे राज को न छोड़ें जो लाखों रुपये के व्यय से प्राप्त हुआ है। लोग यही कहेंगे कि राजा दर्शनसिंह के मरने पर उनकी सन्तान में कोई ऐसा न निकला जो राज को सँभालता और अपने घर को देखभाल करता। हम लोग ऐसे उत्साहहीन हुये कि बिना लड़े भिड़े अपने बाप दादों की कमाई खो बैठे।”

राजकवि लक्षिराम लछिराम के भाव- 

दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।

बादसाह मनसब दियौ,देसअवध सब ठौर।

श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।

अरि-गन-गजपै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।

तिनको लघुभूपालमनि,मानसिंह महाराज।

जिनकीनेलछिरामकौं,निजद्वारे कविराज।।

    इनको अपनी वीरता तथा कौशल के कारण राजाबहादुर की उपाधि मिली थी। राज्य में अशांति होने पर इन्होंने अनेक बार राज्य-व्यवस्था कायम की थी। तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया। किंवदंती है कि द्विजदेव ने भिनगा नरेश पर आक्रमण किया। राजा ने द्विजदेव को एक कवित्त लिखकर भेजा –

बिनु मकरंद बृंद कुसुम समूहन के,

कौलों दिन बीतिहैं मलिदं के कलीन तें।

बिनु चारु चेटक चिलक चोखी चंद्रिकाकी,

कौलों हौंस राखिहैं चकोर चिनगीन तें।।

जुबराज कौलों बिनु ब्रजराज प्रानप्यारे,

 कौन जिय राखिहै या मदन मलीन तें।

मुकुट कलिज मानसर बिनु आली अब,

कौलों काल कटिहैं मराल पोखरीन तें।।’’

       इसका उत्तर द्विजदेव ने इस प्रकार दिया था –

आजु तैं कोटि हार बरीस लौं, 

रीति यहै नित ही चलि आई।

लाहु लह्यो तिनहीं जग में जिन्ह, 

कीन्हीं कछू न कछू सिवकाई।

ऐ नृपहंस! विचार विचारु, 

रहौ किन आपने काज लजाई।

आपही दूरी बसे तो कहा 

कहौ मानसरोवर की कृपनाई।।

    इस प्रकार युद्ध समाप्त हो गया। द्विजदेव के हृदय की सरसता उनकी समरतत्परता के साथ ही प्रस्तुत थी जो कठोरत एवं मृदुता का अपूर्व समन्वय उपस्थित करती है। सं. 1913 में बादशाह की मृत्यु हो जाने के पश्चात् इन्हें अंग्रेजों की शत्रुता का भरपूर सामना करना पड़ा, किंतु कुछ ही समय पश्चात् सं. 1916 वि. में लखनऊ दरबार में अंग्रेजी शासन की ओर से इन्हें ‘महाराजा’ की तथा सं. 1926 वि. में ‘के.सी.एस.आई.’ की उपाधियाँ मिलीं।

मानसिंह महाराज को, छायो प्रबल प्रताप।

सुहृद सुमन सीतल करन,अरि घन-वन-तन ताप।।

जाकौ जस लखि भुअन में, चंद चंद अनुरूप।

कबिगन कौ सुरतरु सुभग, सागर सील स्सरूप।।

 x        x        x       x         x        x       

मानसिंह महाराज को, सुभा सितारा हिंद

कायमगंज बहादुरी, के.सी.एस. कल इंद।।

विरोधियों को मात दिया :- 

ऐसा विचार कर के उन्होंने अपने भाईयों से कहा कि आपलोगअंग्रेजी राज में जायँ,  मैं यहीं रहूँगा। उनके पास उस समय न कोष था और न सेना थी। इसी से बिना पूछे थोड़े से वीरों के साथ निकल पड़े और कुछ विरोधियों से भिड़ गये। इसमें उनकी जीत हुई। इससे उनके सारे राज में उनकी धाक बंध गई। उस समय किसी कारण से राजा बखतावरसिंह बादशाही में नजरबन्द थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर उन्हें भी छुड़ाया और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये। महाराजा मानसिंह के सुप्रबन्ध का समाचार बादशाह के कानों तक पहुँचा। 

प्रजा की रक्षा की प्राथमिकता:- 

महाराजा मानसिंह का उदय अयोध्या का महल उस समय शांति और गर्व दोनों का प्रतीक था, लेकिन राजा दर्शन सिंह के निधन के बाद राज्य में हलचल की लहर दौड़ गई। लोगों के मन में भय और अनिश्चितता ने जगह बना ली थी। वहीं, युवा मानसिंह, जिसे लोग प्यार से हनुमान सिंह कहते थे, अपने पिता की मृत्यु की खबर सुनकर गंभीर हो गया। “मैं अब अकेला हूँ… पर प्रजा को मेरी रक्षा चाहिए,” मानसिंह ने खुद से कहा, उसकी आँखों में वीरता और दृढ़ संकल्प की झलक थी।

युद्ध और प्रशासन :- 

अयोध्या के चारों ओर के क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखना महाराजा मानसिंह के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य था। विद्रोही और डाकू लगातार राज्य की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन महाराजा के साहस और दूरदर्शिता ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया। वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे।

सूरजपुर गढ़ी में कैदियों को मुक्त कराया :- 

एक दिन सूचना मिली कि सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर लिया गया है। महाराजा ने तुरंत अपने सेनापतियों को बुलाया। “तीन हजार सिपाही गढ़ी में हैं,” सेनापति ने डरते हुए कहा, “यदि हम सीधे हमला करेंगे तो भारी नुकसान हो सकता है।”

    मानसिंह ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “हमारा उद्देश्य केवल जीत नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा है। जो रास्ता सबसे कठिन है, वही हमें अपनाना होगा।” रात के अंधेरे में महाराजा ने गुप्त मार्गों से सेना भेजी। स्वयं महाराजा एक छोटी इकाई के साथ गढ़ी में घुसा। तलवारों की चमक, युद्ध की चिल्लाहट और सिपाहियों की दौड़- हर क्षण रोमांच से भरा हुआ था। 

राज्य के विद्रोहियों ने इस अवसर का फायदा उठाना शुरू कर दिया। तीन हजार सिपाही अचानक सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर रहे थे। कोई भी सामान्य सेनापति इतनी संख्या के सामने डर जाता, लेकिन मानसिंह ने अपनी तलवार उठाई और रणनीति बनाई। उसने रात के अंधेरे का फायदा उठाया। गुप्त मार्गों से सेना को भेजा और स्वयं गढ़ी में घुसा। भीषण युद्ध हुआ। तलवारें चमकीं, घोड़े दौड़े, और चिल्लाहटें गूंज उठीं। तीन हजार सिपाही भयभीत हो गए और बंदियों को मुक्त करने के बाद भाग खड़े हुए।अंततः तीन हजार सिपाही भयभीत होकर भाग खड़े हुए, और बंदियों को मुक्त कराया गया।

     जैसे ही वह बाहर आया, सैनिकों ने नतमस्तक होकर कहा, “महाराज, आपकी वीरता ने हमें जीने की राह दिखाई।” मानसिंह ने गंभीरता से उत्तर दिया, “वीरता केवल युद्ध में नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा में है। हम अयोध्या को सुरक्षित रखेंगे, चाहे किसी भी कीमत पर।”

     इस घटना के बाद महाराजा मानसिंह की ख्याति दूर -दूर तक फैल गई। राज्य के लोग उसे केवल राजा नहीं, बल्किअयोध्या का संरक्षक और धर्म का प्रहरी माननेलगे।

सूरजपुर के किले पर विजय:- 

राजा मान सिंह ने  सूरजपुर के किले पर विजय प्राप्त की और  दिल्ली के राजा ने उन्हें “राजा-बहादुर” की उपाधि से सम्मानित किया। बाद में “कायम – जंग” की उपाधि उन्हें प्रदान की गई। जब राजा बख्तावर सिंह की मृत्यु हुई, तो मान सिंह  अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन गए। उन्हें लखनऊ दरबार में 1859 में रु। 7000 की राशि के साथ “महाराजा ” की उपाधि दी गई थी। वे इस क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण तालुकदारों में से एक थे और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा नाइट कमांडर्स स्टार ऑफ़ इंडिया (KCSI) का खिताब भी दिया गया था। 

सीहीपूर के विद्रोहियों का दमन :- 

कुछ महीनों बाद सीहीपूर में डाकूओं का आतंक बढ़ गया। महाराजा ने बिना किसी विलंब के अभियान शुरू किया। उन्होंने छिपकर गढ़ी के आसपास की पहाड़ियों पर कब्ज़ा किया, और रणनीति के अनुसार हमला किया। डाकुओं ने कभी मुकाबला नहीं किया- उनकी हिम्मत महाराजा की दूरदर्शिता और वीरता के सामने ठहर नहीं सकी।उनकी रणनीति, साहस और दूरदर्शिता ने राज्य की स्थिरता और प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित की।महाराजा मानसिंह ने न केवल युद्ध कौशल में महारत हासिल की, बल्कि प्रशासन में भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाई। उन्होंने जनता की समस्याओं को ध्यान से सुना, कर प्रणाली में सुधार किया और किसानों के लिए नई योजनाएँ बनाईं।

    एक रात, अपने निजी कक्ष में बैठकर उन्होंने चुपचाप कहा, “मेरे पिता ने मुझे वीरता और धर्म की नींव दी। अब यह जिम्मेदारी मेरी है कि मैं इसे आगे बढ़ाऊँ। अयोध्या केवल हमारी धरती नहीं, बल्कि हमारे वंश की पहचान है।”

     उस समय महाराजा के मन में एक अटूट विश्वास और निश्चय था-वीरता, न्याय और धर्म का पालन ही शाकद्वीपी वंश की असली शक्ति है।

शाहगंज के विद्रोहियों का दमन 

सीहीपुर की भांति शाहगंज की गढ़ी पर विद्रोहियों को परास्त करना भी महाराजा के साहस और चतुराई का प्रतीक बना। उन्होंने न केवल तलवार और सेना का उपयोग किया, बल्कि कूटनीति और प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया।

प्रशासन में सुधार

युद्ध की समाप्ति के बाद महाराजा ने प्रशासन में सुधार किए। उन्होंने कर प्रणाली में पारदर्शिता लाई, किसानों और व्यापारियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की, और न्यायप्रियता के नए मानक स्थापित किए। एक शाम महाराजा अपने निजी कक्ष में बैठकर चुपचाप बोले, “युद्ध केवल शक्ति का खेल नहीं है। यदि हम न्याय, धर्म और प्रजा की रक्षा के उद्देश्य से लड़ें, तो हर कठिनाई संभव है। यही वीरता और शासन का असली अर्थ है।”

   महाराजा मानसिंह की यह दृष्टि अयोध्या को न केवल सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रखती थी, बल्कि राज्य में स्थिरता और प्रजा में विश्वास भी बनाए रखती थी।

वंश और उत्तराधिकार :- 

अयोध्या का सिंहासन केवल शक्ति का प्रतीक नहीं था; यह वंश और धर्म की विरासत भी था। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह ने अपने जीवनकाल में अपने उत्तराधिकारियों को तैयार किया ताकि उनका राज्य सुरक्षित और प्रजा खुशहाल रहे। कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927 वि. को महाराजा मानसिंह का देहावसान हो गया। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से  मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। वे निसंतान थे। इनकी एक कन्या थी, जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह ने गोद ले लिया। यही मानसिंह की मृत्यु के पश्चात्, अयोध्या के राजा हुए।

जागीर त्याग कर भक्ति में लीन :- 

1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें जागीर मिली थी, लेकिन बाद में वे सब कुछ त्याग कर वृंदावन चले गए।

उनकी कविता में राधा-माधव प्रेम का चित्रण, प्रांजल भाषा और कवित्त/सवैया छंदों का प्रयोग प्रमुख था।

‘द्विजदेव’ साहित्यिक उपाधि :- 

रीतिकालीन स्वच्छंद काव्य परंपरा के अंतिम कवि अयोध्या के महाराजा मानसिंह का साहित्यिक नाम ‘द्विजदेव’ है, जो रीतिकालीन स्वच्छंद मुक्तक काव्य परंपरा के अंतिम प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। वे रीतिकाल के श्रृंगार रस के कवि थे ।

वे बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनके भतीजे महाराज थे और बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनकी कविता में सरसता, सरल भाववेग, सुकुमार कल्पना, सूक्ष्म अनुभूति तथा अप्रतिम सौंदर्य बोध है।

     हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल समेत अनेक विद्वानों ने इन्हें रीतिकाल के शृंगारी कवियों की परम्परा में रीतिमुक्त कविता का अन्तिम प्रसिद्ध कवि माना है। भाषा की प्रांजलता, बखान की सजीवता और भाव-व्यंजना की सूक्ष्मता के साथ द्विजदेव की कविता छप्पय, दोहा, सवैया, घनाक्षरी आदि विभिन्न छन्दों के माध्यम से प्रेम के अनन्य सनातनी प्रतीक राधा-माधव को अपनी कविता का विषय बनाती है। ऐसे भावमयी अलौकिक वर्णन के साथ द्विजदेव भक्ति में संयोग और विरह का अछोर निर्मित करते हैं। इस अध्ययनपरक ग्रन्थ को, ऐसे महाकवि के सन्दर्भ में रचा गया है, जिन्हें समकालीन अर्थों में देखने, समझने की नयी दृष्टि मिलती है। द्विजदेव की शृंगारिक कविता को काव्य-रसिकों के बीच पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से प्रणीत यह मनोहारी शोध रीतिकाल को समग्रता में देखने की कोशिश है। इस अध्ययन की गम्भीर अर्थ भंगिमा पूर्वज कवियों के प्रति लेखिका का साहित्यिक अर्थों में कृतज्ञता ज्ञापन है।

1.’श्रृंगारबत्तीसी’ 

2.श्रृंगारलतिका’

3. ‘शृंगार चालीसी’ 

4. ‘अवमुक्त पंचदशी’ 

5. ‘मान मयंक’ 

श्रृंगारलतिका :- 

‘श्रृंगारलतिका’ का एक बहुत ही विशाल और सटीक संस्करण महारानी अयोध्या की ओर से हाल में प्रकाशित हुआ है। इसके टीकाकार भूतपूर्व अयोध्या नरेश महाराज प्रतापनारायण सिंह जी हैं ।

श्रृंगारबत्तीसी :- 

‘श्रृंगारबत्तीसी’ भी एक बार छपी थी। द्विजदेव के कवित्त काव्य प्रेमियों में वैसे ही प्रसिद्ध हैं जैसे पद्माकर के। ब्रजभाषा के श्रृंगारी कवियों की परंपरा में इन्हें अंतिम प्रसिद्ध कवि समझना चाहिए। जिस प्रकार लक्षण ग्रंथ लिखनेवाले कवियों में पद्माकर अंतिम प्रसिद्ध कवि हैं उसी प्रकार समूची श्रृंगार परंपरा में ये। इनकी सी सरस और भावमयी फुटकल श्रृंगारी कविता फिर दुर्लभ हो गई।

‘मान मयंक’ :- 

मान मयंक के अन्तर्गत संकलित छंदों में अधिक संख्या प्रेम रस अथवा शृंगार रस से संबंधित पदों की ही है। यद्यपि शास्त्रीय दृष्टि से तो इनके शृंगार निरूपण का महत्व अधिक नहीं है क्योंकि द्विजदेव रीतिमुक्त काव्य परंपरा के कवि हैं। उन्होंने शृंगार रस का लक्षणबद्ध विवेचन अपने काव्य में नहीं किया है तथापि उनके वर्णन-पक्ष पर दृष्टि डालकर निःसंकोच यह कहा जा सकता है कि कवि ने भावात्मक परितोष के लिए शृंगार रस का जी खोलकर वर्णन किया है। कवि ने नायिका भेद की चर्चा करते हुए शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का सुंदर ढंग से निर्वाह किया है।

शृंगार चालीसी’:- 

शृंगार चालीसी’ में राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं के स्थान पर लौकिक नायक-नायिका के विरह और मिलन का भी सरस वर्णन मिलता है। 

लतिका सौरभ:- 

दोहा:

तिन कौ सुत अति अल्प-मति, ‘मानसिंह’ ‘द्विजदेव’।

किय ‘सिँगार-लतिका ‘ललित, हरि-लीला पर भेव॥

भावार्थ: जिनके पुत्र महाराज‘मानसिंह’ ने जिनका कविता का नाम ‘द्विजदेव’ है ‘शृंगार लतिका’ नामक ग्रंथ श्रीराधा कृष्ण की लीला के विषय में लिखा।

भाषा :- 

इनमें बड़ा भारी गुण है भाषा कीस्वच्छता। अनुप्रास आदि चमत्कारों के लिए इन्होंने भाषा भद्दी कहीं नहीं होने दी है। ऋतु वर्णनों में इनके हृदय का उल्लास उमड़ पड़ता है। बहुत से कवियों के ऋतुवर्णन हृदय की सच्ची उमंग का पता नहीं देते, रस्म सी अदा करते जान पड़ते हैं। पर इनके चकोरों की चहक के भीतर इनके मन की चहक भी साफ़ झलकती है। एक ऋतु के उपरांत दूसरी ऋतु के आगमन पर इनका हृदय अगवानी के लिए मानो आप से आप आगे बढ़ता था- 

मिलि माधावी आदिक फूल के ब्याज विनोद-लवा बरसायो करैं।

रचि नाच लतागन तानि बितान सबै विधि चित्त चुरायो करैं।

द्विजदेव जू देखि अनोखी प्रभा अलिचारन कीरति गायो करैं।

चिरजीवो बसंत! सदा द्विजदेव प्रसूननि की झरि लायो करैं।।

आजु सुभायन ही गई बाग, बिलोकि प्रसून की पाँति रही पगि।

ताहि समय तहँ आये गोपाल, तिन्हें लखि औरौ गयो हियरो ठगि।

पै द्विजदेव न जानि परयो धौं कहा तेहि काल परे अंसुवा जगि।

तू जो कही सखि! लोनो सरूप सो मो अंखियान कों लोनी गईलगि।।

सुर ही के भार सूधो सबद सुकीरन के

मंदिरन त्यागि करैं अनत कहूँ न गौन।

द्विजदेव त्यौं ही मधुभारन अपारन सों

नेकु झुकि झूमि रहै मोगरे मरुअ दौन

खोलि इन नैनन निहारौं तौ निहारौं कहा?

सुषमा अभूत छाय रही प्रति भौन भौन।

चाँदनी के भारन दिखात उनयो सो चंद,

गंधा ही के भारन बहत मंद मंद पौन।।

बोलि हारे कोकिल, बुलाय हारे केकीगन,

सिखै हारी सखी सब जुगुति नई नई।

द्विजदेव की सौं लाज बैरिन कुसंग इन

अंगन हू आपने अनीति इतनी ठई।

हाय इन कुंजन तें पलटि पधारे स्याम,

देखन न पाई वह मूरति सुधामई।

आवन समै में दुखदाइनि भई री लाज,

चलत समैं मे चल पलन दगा दई।

बाँके संकहीने राते कंज छबि छीने माते,

झुकिझुकि, झूमिझूमि काहू को कछू गनैन

द्विजदेव की सौं ऐसी बनक बनाय बहु,

भाँतिन बगारे चित चाहन चहूँधा चैन

पेखि परे प्रात जौ पै गातिन उछाह भरे,

बार बार तातें तुम्हैं बूझती कछूक बैन।

एहो ब्रजराज! मेरो प्रेमधान लूटिबे को,

बीराखाय आये कितै आपके अनोखे नैन।।

भूले भूले भौंर बन भाँवरें भरैंगे चहूँ,

फूलि फूलि किंसुक जके से रहि जायहैं।

द्विजदेव की सौं वह कूजन बिसारि कूर,

कोकिल कलंकी ठौर ठौर पछिताय हैं

आवत बसंत के न ऐहैं जो पै स्याम तौ पै,

बावरी! बलाय सों हमारेऊ उपाय हैं।

पीहैं पहिलेई तें हलाहल मँगाय या,

कलानिधिकी एकौ कला चलन न पायहैं।।

घहरि घहरि घन सघन चहूँधा घेरि,

छहरि छहरि विष बूँद बरसावै ना।

द्विजदेव की सौं अब चूक मत दाँव, 

एरे पातकी पपीहा तू पिया की धुनि गावैना

फेरि ऐसो औसर न ऐहै तेरे हाथ, 

एरे मटकि मटकि मोर सोर तू मचावै ना।

हौं तौ बिन प्रान, प्रान चाहत तजोई अब,

कत नभ चंद तू अकास चढ़ि धावै ना।।