संदर्भः गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर विशेष आलेख-
प्रमोद भार्गव
दुनिया के गणतंत्रों में भारत प्राचीन गणतंत्रों में से एक है। यहां के मथुरा, पद्मावती और त्रिपुरी जैसे अनेक हिंदू राष्ट्र दो से तीन हजार साल पहले तक केंद्रीय सत्ता से अनुशासित लोकतांत्रिक गणराज्य थे। केंद्रीय मुद्रा का भी इनमें चलन था। लेकिन भक्ति, अतिरिक्त उदारता, सहिश्णुता, विदेषियों को षरण और वचनबद्धता जैसे भाव व आचरण कुछ ऐसे उदात्त गुणों वाले दोश रहे, जिनकी वजह से भारत विडंबनाओं और चुनौतियों के ऐसे देश में बदलता चला गया कि राजनीति का एक पक्ष यहां समस्याओं को यथास्थिति में रखने की पुरजोर पैरवी करने लग जाता है। घुसपैठियों के भी समर्थन में आ खड़ा होता है। आतंक और नक्सलवाद में भी इस विपक्ष की दृश्टि और नीति स्पष्ट नहीं है। विपक्षी दलों के ऐसे स्थाई भाव के चलते चुनौतियों से निपटना और आजादी के बाद सभी अनुत्तरित रह गए प्रश्नों के व्यावहारिक हल खोजना मुष्किल हो रहा है। फिर भी नरेंद्र मोदी सरकार ने धारा-370, 35-ए, तीन तलाक और वक्फ बोर्ड जैसी समस्याओं के हल तलाष कर देष की संप्रभुता की महिमा लौटाई है। राम मंदिर के वैभवशाली पुनर्निमाण ने भारतीयों के गौरव को बढ़ाने का काम किया है। परंतु अभी भी समान नागरिक संहिता, आबादी नियंत्रण और धर्मांतरण पर अंकुष के स्थायी कानूनी हल स्थापित करना बांकी है।
यह विडंबना इसलिए भी है, कि जब हमारे स्वतंत्रता सेनानी ब्रिटिश हुकूमत से लड़ रहे थे, तब वे अभावग्रस्त और कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद अपने पारंपरिक ज्ञान और चेतना से इतने बौद्धिक थे कि किसान-मजदूर से लेकर हर उस वर्ग को परस्पर जोड़ रहे थे, जिनका एक-दूसरे के बिना काम चलना मुशिकल था। इस दृष्टि \ से महात्मा गांधी ने चंपारण के भूमिहीन किसानों, कानपुर, अहमदाबाद, ढाका के बुनकरों और बंबई के वस्त्र उद्यमियों के बीच सेतु बनाया। नतीजतन इनकी इच्छाएं आम उद्देष्य से जुड़ गईं और यही एकता कालांतर में षक्तिषाली ब्रिटिष राज से मुक्ति का आधार बनी। इसीलिए देश के स्वतंत्रता संग्राम को भारतीय स्वाभिमान की जागृति का संग्राम भी कहा जाता है। राजनीतिक दमन और आर्थिक शोषण के विरुद्ध लोक-चेतना का यह प्रबुद्ध अभियान था। यह चेतना उत्तरोत्तर ऐसी विस्तृत हुई कि समूची दुनिया में उपनिवेशवाद के विरुद्ध मुक्ति का स्वर मुखर हुआ। परिणामस्वरूप भारत की आजादी एशिया और अफ्रीका की भी आजादी लेकर आई। भारत के स्वतंत्रता समर का यह एक वैश्विक आयाम था, जिसे कम ही रेखांकित किया जाता है। इसके वनिस्पत फ्रांस की क्रांति की बात कही जाती है। निसंदेह इसमें समता, स्वतंत्रता एवं बंधुता के तत्व थे, लेकिन एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की अवाम उपेक्षित थी। अमेरिका ने व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता और सुख के उद्देश्य की परिकल्पना तो की, परंतु इसमें स्त्रियां और हब्शी गुलाम बहिष्कृत रहे। मार्क्स और लेनिनवाद ने एक वैचारिक पैमाना तो दिया, किंतु वह अंततः तानाशाही साम्राज्यवाद का मुखौटा ही साबित हुआ। इस लिहाज से गांधी का ही वह विचार था, जो सम्रगता में भारतीय हितों की चिंता करता था। इसी परिप्रेक्ष्य में दीनदयाल उपध्याय ने एकात्म मानववाद और अंत्योदय के विचार दिए, जो संसाधनों के उपयोग से दूर अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के उत्थान की चिंता करते हैं।
कमोबेष इन्हीं भावनाओं के अनुरूप डॉ भीमराव अंबेडकर ने संविधान को आकार दिया। इसीलिए जब हम सत्तर साल पीछे मुड़कर संवैधानिक उपलब्धियों पर नजर डालते हैं तो संतोश होता है। प्रजातांत्रिक मूल्यों के साथ राश्ट्र-राज्य की व्यवस्थाएं जीवंत हैं। बीच-बीच में आपातकाल जैसी अतिरेक और अराजकता भी दिखाई देती है, लेकिन अंततः मजबूत संवैधानिक व्यवस्था के चलते लंबे समय तक ये स्थितियां गतिशील नहीं रह पाती। फलतः तानाशाही ताकतें स्वयं ही इन पर लगाम लगाने को विवश हुई हैं। यही कारण है कि प्रजातंत्र, समता, न्याय और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के साथ विधि का शासन अनवरत है। भारत की अखंडता और संप्रभुता स्थापित करने की दृश्टि से सरदार पटेल जैसे लोगों ने कूटनीतिक कड़ाई से 600 से भी ज्यादा रियासतों का विलय कराया। हैदराबाद व जम्मू-कष्मीर रियासतों का विलय हुआ। जमींदारी उन्नमूलन व भूमि-सुधार हुए। सर्वोदयी नेता विनोबा भावे ने सामंतों की भूमि को गरीब व वंचितों में बांटने का उल्लेखनीय काम किया। पुर्तगाल और फ्रांस से भी भारतीय भूमि को मुक्त कराया। गोवा आजाद हुआ और सिक्किम का भारत में विलय हुआ।
चीन और पाकिस्तान के आक्रमणों से सामना किया। इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान को विभाजित कर दो देशों में बांटने का दुस्साहसिक कार्य किया। इसी पृष्ठभूमि में गुटनिरपेक्ष व शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व वाली ठोस विदेश नीति अपनाई। विकेंद्रीकरण की नीति अपनाते हुए इंदिरा गांधी ने ही राजाओं के प्रिवीपर्स बंद किए और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। देश में औद्योगीकरण की बुनियाद रखने के साथ सामरिक महत्व के इसरो व डीआरडीओ जैसे संस्थान अस्तित्व में आए। इन्हीं की बदौलत हम प्रक्षेपास्त्र और अंतरिक्ष में उपग्रह स्थापित करने में सक्षम हुए। इस अंतरिक्ष और रक्षा क्रांति को नरेंद्र मोदी ने प्रोत्साहित किया। हरित क्रांति की शुरुआत करके खाद्यान्न के क्षेत्र में न केवल आत्मनिर्भर हुए, बल्कि कृषि उपजों के निर्यात से विदेशी मुद्रा कमाने में भी समर्थ हुए। ये उन्नति के कार्य इसलिए संपन्न हो पाए, क्योंकि 1990 से पहले तक हमारे राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी सही रूप में बौद्धिक होने के साथ स्वदेशी की भावना रखते थे और नैतिक दृष्टि से कमोवेश ईमानदार थे। इसलिए ग्रामों से ज्यादा पलायन नहीं हुआ और खेती-किसानी समृद्ध बने रहे।
सरकारी षिक्षा की पाठषालाओं से निकले इस कालखंड के षिक्षित लोग ही श्रेश्ठ वैज्ञानिक अभियंता और चिकित्सक बने। यही नहीं आज हम जिन प्रवासी भारतीयों की बौद्धिक व आर्थिक उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, वह आठवें दषक के अवसान और नौंवे दशक के आरंभ की वह पीढ़ी है, जो कनस्तर और बिस्तरबंद के साथ सरकारी विद्यालयों में पढ़कर देष व दुनिया में छा गई थी। बावजूद अंग्रेजी, विदेषी और निजी षिक्षा को सरंक्षण देने की दृश्टि से हमने कई ऐसे नीतिगत उपाय कर दिए, जिससे समूची सरकारी षिक्षा व्यवस्था निराषा और हीनताबोध से ग्रस्त होती चली गई। अब तो प्राथमिक षिक्षा से लेकर उच्च षिक्षा तक के संस्थान भी छात्रवृत्तियों और मध्यान्य भोजन के बहाने भीख के कटोरों के बूते चल रहे हैं। जबकि यह वही देष है, जहां मिट्टी के द्रोणाचार्य ने एकलव्य से धनुर्धर गढ़े और अर्जुन की सीख ने अभिमन्यू को गर्भ में ही चक्रव्यूह भंग करने में दीक्षित किया।
बहरहाल तमाम उपलब्धियों के बीच षिक्षा में ही नहीं सभी क्षेत्रों में नैतिक मूल्यों का क्षरण हुआ। आपातकाल के उपरांत जनता दल की गठबंधन सरकार गिरने के बाद संजय गांधी की युवा-टोली को राजनीति में प्रवेष मिला, उसने मूल्यों के अवमूल्यन की पृश्ठभूमि रची। हाषिए पर पड़े सामंत और जमींदार बड़ी संख्या में एकाएक राजनीति की केंद्रीय भूमिका में आ गए। जब ये विधायक एवं सांसद के रूप में सत्ता-तंत्र में हस्तक्षेप के अधिकारी हुए तो इन्होंने पुनः मृतप्रायः समंती दुश्प्रवृत्तियों को सींचकर हरा-भरा कर लहलहा दिया। स्वतंत्रता संग्राम और स्वदेशी के निष्ठावान अनुयायी लगभग निर्वासित कर दिए गए। नतीजतन 1984 में पंजाब में पनपे उग्रवाद के चलते इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो प्रतिकार स्वरूप पूरे देश में कांग्रेसी सत्ता के संरक्षण में सांप्रदायिक हिंसा हुई। इसी की पृष्ठभूमि से भाषाई, जातीय व क्षेत्रीय अस्मिताएं प्रखर आंदोलन के रूप में उभरीं। 1989 में जब वीपी सिंह की सरकार को देवीलाल ने अस्थिर किया तो उन्होंने मंडल का पिटारा खोल दिया। इसे लेकर मंडल-कमंडल में भी हिंसक टकराव देखने में आए। फलस्वरूप राममनोहर लोहिया के जो अनुयायी भाशाई आंदोलन चला रहे थे, उनकी प्राथमिकता पिछड़ों के जातीय और क्षेत्रीय हितों में जमींदोज हो गई। मुलायम, लालू, षरद, नीतीष और मायावती इन्हीं आंदोलन के अगुआ रहकर मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में मंत्री बने। यही वह दौर रहा, जिसमें धनबल और बाहुबल का राजनीति में पर्दापण हुआ तथा अपराध का राजनीतिकरण एवं राजनीति का अपराधीकरण हुआ। कांग्रेस और भाजपा भी इससे अछूते नहीं रहे। रही-सही कसर 24 जुलाई 1991 को संरचनागत समायोजन के बहाने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारत में व्यापार का जो समझौता हुआ, उसने देश की आर्थिक आजादी को लगभग 500 साल के लिए गिरवी रख दिया। नतीजतन हम नव-उपनिवेश के गुलाम होते जा रहे हैं। इन कंपनियों की आवारा पूंजी, पूंजीवाद के विस्तार और प्राकृतिक संपदा की लूट में लगी हुई है। उपभोग की संस्कृति बेलगाम होती जा रही है। इससे मुक्ति विरासत में मिली ज्ञान परंपरा से ही की जा सकती है, जो केंद्र सरकार की प्राथमिकता में है।
प्रमोद भार्गव