-अशोक “प्रवृद्ध”
लेखक, आध्यात्मिक चिन्तक व साहित्यकार
झारखंड में होली की अत्यंत प्राचीन, वृहत व वैविध्यपूर्ण परंपराएं हैं। यहां इसे मुख्य रूप से फगुआ के नाम से जाना जाता है, जिसमें आदिवासी और गैर आदिवासी सदान संस्कृतियों का सुंदर संगम दिखता है। झारखंड की कुछ विशिष्ट होली परंपराओं में फगुआ, भगता, बाहा और आदिवासी- गैरआदिवासी मिश्रित परंपराएं शामिल हैं। इन सभी कार्यक्रमों में आदिवासी और गैरआदिवासी समुदाय बढ़ -चढ़कर हंसी- ख़ुशी के साथ हिस्सा लेते हैं। होलिका दहन के दिन ग्रामीण जंगल से सेमल की डाली लाकर गाड़ते हैं और उसे जलाते हैं। इसके चारों ओर मांदर और नगाड़े की थाप पर फगुआ नृत्य किया जाता है। इसे फाग अथवा फग्गू काटना कहते हैं। कई जनजातीय क्षेत्रों में रंगों के बजाय लाल मिट्टी से होली खेलने की परंपरा है, जो प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाती है। संताल समुदाय इसे फूलों का त्यौहार अथवा बाहा पर्व के रूप में मनाता है। इसमें रंग के बजाय सादे पानी और सखुआ (साल) के फूलों का प्रयोग किया जाता है। झारखंड के गुमला जिले में होली का स्वरूप प्रकृति पूजन और आदिवासी संस्कृति के गहरे रंगों में रंगा होता है। यहां इसे केवल रंगों का त्यौहार नहीं, बल्कि नववर्ष के आगमन और सुख-समृद्धि के अनुष्ठान के रूप में मनाया जाता है। गुमला के ग्रामीण क्षेत्रों में होलिका दहन को संवत जलाना या फगुआ काटना कहा जाता है। गांव के पाहन (पुरोहित) जंगल से सेमल की एक टहनी लाते हैं और उसे गांव के सार्वजनिक स्थान पर गाड़ते हैं। इसके चारों ओर पुआल और लकड़ियां इकट्ठा की जाती हैं। पाहन द्वारा विशेष पूजा-अर्चना के बाद इसे जलाया जाता है। दहन के अगले दिन सुबह लोग होलिका की राख को अपने माथे पर लगाते हैं। इसे संवत की भस्म माना जाता है, जो बीमारियों और बुरी नजर से बचाती है। पाहन और गांव के बुजुर्ग जलती हुई अग्नि की लपटों की दिशा देखकर यह भविष्यवाणी करते हैं कि इस साल मानसून कैसा रहेगा और खेती कैसी होगी? ऐसा प्रायः सभी गांवों में होता है। गुमला सहित झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में उरांव, मुंडा आदि आदिवासी समुदाय होली के समय बाहा मनाते हैं। इसमें कृत्रिम रंगों के बजाय सखुआ (साल) के फूलों का प्रयोग होता है। महिलाएं और पुरुष पारंपरिक वेश-भूषा पहनकर मांदर और नगाड़े की थाप पर सामूहिक नृत्य करते हैं। गुमला जिले के सिसई प्रखंड के प्राचीन ग्राम मुरुनगुर वर्तमान मुर्गु के चरणनाथ (चिरैयानाथ) मन्दिर, समीप ही स्थित नागफेनी और दोइसागढ़ के कपिलनाथ मन्दिर, पालकोट के दशभुजी मन्दिर का इतिहास झारखंड के गौरवशाली नागवंशी शासन की कहानियों से भरा हुआ है। होली के समय यहां विशेष पूजा होती है। मान्यता है कि मुगलों के द्वारा ध्वंसित मुरुनगुर के चरणनाथ शिव मन्दिर में प्रस्तर निर्मित शिवलिंग की स्थापना करने वाले नागवंशी राजा दुर्जन शाल मुरुनगुर क्षेत्र में स्वयं होली की शुरुआत करते थे। आज भी स्थानीय ग्रामीण संवत जलाने के बाद यहां माथा टेकने आते हैं। होली के पूर्व यहां पन्द्रह दिनों तक विशाल जतरा (मेला) लगता था, जो अब बंद हो चूका है। मुर्गु (मुरुनगुर) में होली के ठीक बाद होने वाला भगता परब बूढ़ा बाबा भी अब कब की बात हो चुकी है, जो चिरैयानाथ को ही समर्पित होता था। गांव के बुजुर्गों के अनुसार बाबा चिरैयानाथ मुरुनगुर की सीमाओं की रक्षा करते हैं। यहां का फाऊग बगीचा में आयोजित होने वाला होलिका दहन अर्थात पहला संवत कटना बाबा की अनुमति और पाहन की पूजा के बिना अधूरा माना जाता है। दुर्जन शाल के ही वंश में जन्मे राजा रघुनाथ शाह ने दक्षिणी कोयल नदी के तट पर जगन्नाथ महाप्रभु मन्दिर का निर्माण विक्रम संवत 1761 में की थी और उड़ीसा के जगन्नाथपूरी से जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को हाथिओं से लाकर स्थापना की थी। रघुनाथ शाह भी अपने पूर्वज दुर्जन शाल की भांति अपने समय में स्वयं यहां होली उत्सव की शुरुआत करते थे। गुमला, रांची आदि जिले की होली बिना धुस्का रोटी और देसी चना घुघनी के अधूरी है। बकरे की मांस अर्थात मटन के साथ धुस्का और चावल के विभिन्न व्यंजन भी होली के मुख्य खान-पान हैं। चावल और दाल का तला हुआ पकवान धुस्का और चने की घुघनी झारखंड के सबसे लोकप्रिय व्यंजन हैं। इस दिन लोग एक-दूसरे के घर जाकर पुआ और पारंपरिक पेय का आनंद लेते हैं। गांव की टोलियां घर-घर जाकर फगुआ गीत गाती हैं और बदले में उन्हें अनाज या उपहार दिए जाते हैं। होली के बाद भरनो, सिसई और घाघरा आदि गुमला के कई इलाकों में होली जतरा अर्थात मेला का आयोजन होता है। यह सामाजिक मेल-मिलाप का सबसे बड़ा केंद्र होता है, जहां पारंपरिक खेलों और नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। गुमला की होली अर्थात फगुआ और बाहा नृत्य की परंपराएं केवल उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी और सदान संस्कृति की आत्मा हैं। यहां के गीतों और नृत्यों में प्रकृति के प्रति गहरी कृतज्ञता छिपी है। बाहा का अर्थ संताली, मुंडारी और हो भाषाओं में फूल होता है। गुमला के सटे अन्य क्षेत्रों में बाहा पर्व फाल्गुन महीने में नई कलियां खिलने पर मनाया जाता है। यहां नृत्य की शैली सामूहिक नृत्य है, जहां पुरुष और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में मांदर और ढोल की थाप पर कदम मिलाते हैं। नृत्य के दौरान साल (सखुआ) के फूलों को कान के पीछे लगाने की परंपरा है, जो दैवीय आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। बाहा नृत्य के दौरान महिलाएं साल के पेड़ों को गले लगाती हैं, जो वनों के संरक्षण और प्रकृति के साथ मानव के प्रेमपूर्ण संबंधों को दर्शाता है। इस उत्सव के तीसरे दिन लोग एक-दूसरे पर रंगहीन पानी छिड़ककर होली खेलते हैं।
गुमला की भांति ही इससे सटे लोहरदगा, रांची, खूंटी, सिमडेगा आदि जिलों में भी होली का पर्व आदिवासी- गैरआदिवासी सम्मिश्रित रूप से मनाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक लोहरदगा जिले के बरही गांव में रंगों के बजाय ढेला अर्थात पत्थरों से होली खेली जाती थी, जिसे आज भी लोग ढेला मार होली के नाम से याद करते हैं। अब यह परंपरा लुप्तप्राय है, परंतु यह मान्यता है कि खंभे अर्थात सत्य के प्रतीक को उखाड़ने वालों पर पत्थर बरसाए जाते हैं, लेकिन भक्त प्रह्लाद की तरह उन्हें चोट नहीं लगती। गुमला, हजारीबाग, पलामू और आस-पास के क्षेत्रों में होलिका दहन की अग्नि में हरा चना (बुटझंगरी) और गेहूं की बालियां भूनने की परंपरा है। इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करना नए साल का प्रथम निवाला माना जाता है। कुछ वर्ष पूर्व तक बोकारो जिले के दुर्गापुर गांव में होली नहीं मनाई जाती थी। लोक कथाओं के अनुसार इस दिन उत्सव मनाने से गांव में विपत्तियां आने का भय रहता है। होली के दौरान फगुआ नामक विशिष्ट लोक संगीत गाया जाता है, जिसमें राधा-कृष्ण के प्रेम और बसंत के आगमन का वर्णन होता है। इसमें मांदर, ढोल और नगाड़ा मुख्य वाद्य यंत्र होते हैं। सिसई के कुदरा, बेड़ो, तमाड़ और बुंडू क्षेत्रों में होली के आस-पास भगता परब मनाया जाता है, जिसमें भक्त बुढ़ा बाबा की पूजा करते हैं। इसमें श्रद्धालु दहकते अंगारों पर चलते हैं और हवा में झूलते हुए साहसिक प्रदर्शन करते हैं। यह शक्ति की उपासना और महादेव (शिव) के प्रति समर्पण का पर्व है। मान्यता है कि इससे गांव में महामारी नहीं फैलती और खुशहाली आती है।
झारखंड के रांची, जमशेदपुर आदि प्रमुख शहरों में होली का उत्सव परंपरा और आधुनिकता का एक अनूठा मिश्रण है। जमशेदपुर अपनी औद्योगिक पहचान के कारण मिनी इंडिया कहलाता है, इसलिए यहां की होली बहुत ही विविधतापूर्ण होती है। जमशेदपुर (टाटानगर) की होली को कॉस्मोपॉलिटन होली कहा जाता है। टेल्को और बिष्टुपुर में बड़ी-बड़ी हाउसिंग सोसायटियों में सामूहिक होलिका दहन होता है। जमशेदपुर में हास्य कवि सम्मेलन की पुरानी परंपरा है, जो होली की पूर्व संध्या पर आयोजित होते हैं। यहां बंगाली समुदाय डोल जात्रा, पंजाबी समुदाय होला मोहल्ला और बिहारी-झारखंडी समुदाय फगुआ को एक साथ मनाते हैं। मैरीन ड्राइव और जुबली पार्क आदि क्षेत्रों में होली के दिन युवाओं की भारी भीड़ और विशेष रेन डांस इवेंट्स देखे जाते हैं। राजधानी रांची में आदिवासी और शहरी संस्कृति का मेल दिखता है। नगे बाबा आश्रम आदि रांची के पुराने इलाकों में पारंपरिक तरीके से होली खेली जाती है। यहां ढुड्डा अर्थात मिट्टी और पानी का कुंड बनाकर होली खेलने की पुरानी रस्म आज भी कुछ मोहल्लों में जीवित है। धुर्वा और रातू जैसे क्षेत्रों में गांव का पाहन (पुरोहित) जनजातीय अनुष्ठान के रूप में होलिका दहन की रस्म निभाता है। जलती हुई लकड़ी की दिशा देखकर आने वाले साल की फसल और बारिश का अनुमान लगाया जाता है। रांची में होली के दिन घर-घर में धुस्का, मटन और पुआ बनाने की विशेष परंपरा है, जो यहां के खान-पान की पहचान है। दुमका और आस-पास के जिलों में आदिवासी समुदाय बाहा मनाते हैं। इसमें पुरुष और महिलाएं सखुआ के फूलों को कान पर लगाकर नाचते हैं। यहां पानी की होली को बहुत महत्व दिया जाता है। बाहा के दौरान घर की दहलीज को धोया जाता है और बड़े-बुजुर्गों के पैर पखारकर आशीर्वाद लिया जाता है। हजारीबाग, धनबाद और झरिया जैसे कोयला क्षेत्रों में होली का जोश बहुत अधिक होता है। यहां होरिला नामक गीतों की टोलियां मोहल्लों में घूमती हैं। हजारीबाग में लोग होली के बाद पहाड़ी पर स्थित मंदिरों में जाकर गुलाल अर्पित करते हैं।
झारखंड के गुमला, लोहरदगा और सिमडेगा क्षेत्रों में फगुआ गीतों का विशेष महत्व है। इन्हें आमतौर पर नागपुरी भाषा में गाया जाता है। फगुआ गीतों में अक्सर बसंत ऋतु के आगमन, प्रकृति के सौंदर्य और राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन होता है। इन गीतों के साथ मांदर, ढोल, नगाड़ा और झांझ का प्रयोग प्रमुखता से होता है, जो वातावरण में एक अद्भुत ऊर्जा भर देते हैं। गुमला के गैर-आदिवासी सदान समुदायों में जोगीरा गाने की भी लंबी परंपरा है। गांव के चौराहे पर लोग इकट्ठा होते हैं और ऊंचे स्वर में जोगीरा गाकर हंसी-मजाक और व्यंग्य के साथ त्यौहार का आनंद लेते हैं। फगुआ नृत्य और बाहा उत्सव विभिन्न समुदायों को एकजुट करते हैं, जहां लोग अपने आपसी मतभेद भुलाकर सामूहिक पहचान का जश्न मनाते हैं। गुमला और इसके पड़ोसी क्षेत्रों में फगुआ काटना, बाहा, भगता परब और होली जतरा केवल आयोजन नहीं, बल्कि आस्था और रोमांच का अद्भुत संगम हैं। वर्तमान में भी इन परंपराओं को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में भारी उत्साह देखा जा रहा है। सामुदायिक संचार माध्यमों में भी इनकी धूम है।