– डॉ. प्रियंका सौरभ
आज का समय अभिव्यक्ति का समय है। सोशल मीडिया, ब्लॉग, डिजिटल मंच और स्वयं-प्रकाशन के साधनों ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का अवसर दिया है। यह लोकतांत्रिक दृष्टि से सकारात्मक परिवर्तन है, क्योंकि अब विचार केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं रहे। किंतु इसी परिवर्तन के बीच एक गंभीर प्रश्न भी उभरकर सामने आया है—क्या हम लिखने की अपेक्षा पढ़ने से दूर होते जा रहे हैं? प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड का यह कथन कि “भारत पाठकों की अपेक्षा लेखकों की संख्या अधिक होने के संकट में है” केवल एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी नहीं, बल्कि हमारे साहित्यिक और सामाजिक परिवेश का सटीक विश्लेषण है।
वास्तव में आज साहित्य के क्षेत्र में रचनाकारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। हर दिन हजारों कविताएँ, लेख, कहानियाँ और विचार सोशल मीडिया पर साझा किए जाते हैं। अनेक लोग स्वयं को कवि, लेखक या विचारक के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर गंभीर पाठकों की संख्या लगातार घटती दिखाई देती है। लोग अपनी रचना पर “वाह-वाह” तो चाहते हैं, पर दूसरों की रचनाओं को पढ़ने, समझने और उस पर विचार करने का धैर्य कम होता जा रहा है। यह स्थिति साहित्य के लिए चिंताजनक है, क्योंकि किसी भी स्वस्थ साहित्यिक परंपरा का आधार केवल लेखक नहीं, बल्कि सजग पाठक भी होते हैं।
पठन संस्कृति किसी भी समाज की बौद्धिक परिपक्वता का संकेत होती है। पढ़ना केवल शब्दों को देखना नहीं, बल्कि विचारों के संसार में प्रवेश करना है। एक अच्छा पाठक अनेक दृष्टिकोणों को समझता है, संवेदनशील बनता है और समाज के प्रति अधिक जागरूक होता है। लेकिन आज मोबाइल स्क्रीन और त्वरित मनोरंजन ने गहन अध्ययन की आदत को कमजोर कर दिया है। लोग छोटी-छोटी पोस्ट, तात्कालिक प्रतिक्रियाएँ और सतही सामग्री पढ़ने तक सीमित हो गए हैं। पुस्तकों के साथ बिताया जाने वाला समय लगातार कम हो रहा है।
डिजिटल युग ने जहाँ अभिव्यक्ति को सरल बनाया, वहीं साहित्य की गंभीरता को भी प्रभावित किया है। पहले लेखक बनने के लिए लंबे अध्ययन, निरंतर अभ्यास और साहित्यिक अनुशासन की आवश्यकता होती थी। लेखक वर्षों तक पढ़ता था, जीवन को समझता था और फिर अपनी अनुभूतियों को शब्द देता था। आज स्थिति कुछ अलग है। सोशल मीडिया पर कुछ पंक्तियाँ लिखकर तुरंत प्रतिक्रिया प्राप्त हो जाती है। लाइक और शेयर की संख्या को ही कई लोग साहित्यिक गुणवत्ता का प्रमाण मान लेते हैं। परिणामस्वरूप लेखन में गहराई की अपेक्षा तात्कालिक लोकप्रियता अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
यह भी सच है कि आज के दौर में पढ़ने की बजाय दिखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। लोग पुस्तक पढ़ने से अधिक अपनी पुस्तक प्रकाशित कराने में रुचि लेने लगे हैं। साहित्यिक मंचों पर भी कभी-कभी वास्तविक रचना की अपेक्षा प्रचार और समूहबंदी अधिक दिखाई देती है। ऐसे वातावरण में गंभीर पाठक स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है। साहित्य केवल तालियों या प्रशंसाओं का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के विचार और संवेदनाओं का दर्पण होता है। यदि पाठक ही कम हो जाएँ, तो साहित्य का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
भारतीय समाज में पठन संस्कृति के कमजोर होने के कई कारण हैं। शिक्षा प्रणाली भी उनमें से एक है। हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ाई का उद्देश्य अधिकतर परीक्षा तक सीमित हो गया है। विद्यार्थियों को अंक प्राप्त करने की दौड़ में इस प्रकार उलझा दिया जाता है कि वे साहित्य को आनंद या चिंतन के रूप में नहीं, बल्कि बोझ के रूप में देखने लगते हैं। पुस्तकालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। गाँवों और छोटे कस्बों में अच्छी पुस्तकों तक पहुँच आज भी सीमित है। जब समाज में पढ़ने का वातावरण ही कमजोर होगा, तब स्वाभाविक रूप से पाठकों की संख्या घटेगी।
परिवारों की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। पहले घरों में अखबार, पत्रिकाएँ और पुस्तकें पढ़ने की परंपरा होती थी। बच्चे अपने माता-पिता और बुजुर्गों को पढ़ते देखकर प्रेरित होते थे। आज अधिकांश परिवारों में मोबाइल और टेलीविजन ने पुस्तकों की जगह ले ली है। बच्चों को तकनीक तो मिल रही है, लेकिन पुस्तकों के प्रति लगाव कम होता जा रहा है। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी में धैर्यपूर्वक पढ़ने की आदत विकसित नहीं हो पा रही।
हालाँकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि आज का सारा लेखन निरर्थक है। डिजिटल मंचों ने अनेक नए और प्रतिभाशाली रचनाकारों को अवसर दिए हैं। ऐसे लोग भी सामने आए हैं जिन्हें पारंपरिक प्रकाशन संस्थानों में अवसर नहीं मिल पाता था। समस्या लेखकों की संख्या बढ़ने में नहीं, बल्कि पाठकों की संख्या घटने में है। यदि समाज में पढ़ने की संस्कृति मजबूत हो, तो अधिक लेखक होना साहित्य के लिए शुभ संकेत माना जाएगा। लेकिन जब हर व्यक्ति केवल स्वयं को पढ़वाना चाहता हो और दूसरों को पढ़ने की इच्छा कम हो जाए, तब साहित्यिक संतुलन बिगड़ने लगता है।
साहित्य केवल लिखने से जीवित नहीं रहता। वह पाठकों के मन में जीवित रहता है। प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, निराला, हरिवंश राय बच्चन या रस्किन बॉन्ड आज इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि पीढ़ियाँ उन्हें पढ़ती रही हैं। यदि पाठक न हों, तो श्रेष्ठतम साहित्य भी अलमारियों में बंद होकर रह जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि समाज में पठन संस्कृति को पुनर्जीवित किया जाए।
विद्यालयों में पुस्तक पठन को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रहने के बजाय विद्यार्थियों को कहानी, कविता, जीवनी और विचार साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। पुस्तक मेलों, साहित्यिक गोष्ठियों और पुस्तकालयों को अधिक सक्रिय बनाया जाना चाहिए। डिजिटल माध्यमों का उपयोग भी सकारात्मक रूप से किया जा सकता है। यदि सोशल मीडिया पर सतही सामग्री की जगह सार्थक साहित्य को बढ़ावा मिले, तो नई पीढ़ी का रुझान पढ़ने की ओर बढ़ सकता है।
लेखकों की भी एक जिम्मेदारी है। उन्हें केवल लोकप्रियता के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि गंभीर अध्ययन और आत्ममंथन को महत्व देना चाहिए। अच्छा लेखक वही बन सकता है जो पहले अच्छा पाठक हो। बिना पढ़े गहराईपूर्ण लेखन संभव नहीं है। साहित्य में स्थायित्व तात्कालिक प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि विचारों की प्रामाणिकता और संवेदनशीलता से आता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “लिखने” और “पढ़ने” के बीच संतुलन स्थापित करें। अभिव्यक्ति का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन ग्रहण करने की क्षमता भी उतनी ही आवश्यक है। समाज तभी बौद्धिक रूप से समृद्ध बनता है जब उसमें विचारों का आदान-प्रदान हो, संवाद हो और पढ़ने की संस्कृति जीवित रहे।
रस्किन बॉन्ड का कथन हमें आत्मचिंतन का अवसर देता है। यह केवल साहित्यकारों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। यदि हम पुस्तकों से दूर होते गए और केवल त्वरित प्रतिक्रियाओं तक सीमित रह गए, तो हमारी संवेदनाएँ और विचार दोनों कमजोर पड़ जाएँगे। इसलिए समय की मांग है कि हम फिर से पुस्तकों की ओर लौटें, पढ़ने को आदत नहीं बल्कि संस्कृति बनाएँ और यह समझें कि एक अच्छा समाज केवल अच्छे लेखकों से नहीं, बल्कि अच्छे पाठकों से भी बनता है।