खान-पान

टप-टप टपक रहे महुआ की मादकता से महक रही है धरती

     आत्‍माराम यादव पीव

भारत कृषि प्रधान देश है और उसके कृषिप्रधान रहने की अपेक्षा की जा सकती है। ऐसा इसलिए कहना पड रहा है क्योंकि ग्राम्‍य जीवन में गॅवारता का बोध लिए ग्रामों के रहवासियों ने खुद को शहरी चकाचौंध में स्थापित कर ग्रामीण जीवन की लोक परम्परा और संस्कृति को अलविदा कर दिया है। मेरा जन्म शहर में हुआ है किन्तु गाँव में ननिहाल होने से गांव से गहरा नाता है और मैं आए दिन ग्रामीण सभ्यता में खुद की मौलिकता की पहचान करने हेतु आता जाता रहा हॅू। फागुन बीत गया, चैत आ गया और चैत की चाँदनी रात में चांदनी मानों हमारे दिल में ता थैया कर नाच रही हो और मैं अपने मित्रों के साथ रात्रि को गॉव के खेत वाले जंगल में महुआ के नीचे खडे महुआ के फूलों को झर-झर झरते देख रहा हॅू लगता है धरती पर रस से भरे मोती बगर रहे है तो तन-मन को महुआ के मदन रस में डूबे जा रहे है। फूले हुए महुआ की सुगंध चारों दिशाओं में ठण्‍डी सी महक लिए हवा में तैर रही है मानों  बसंत पंचमी को जनमा बसंत अब पूर्ण युवा हो गया है और वह लोभी भौरा की तरह महुआ से नेह लगाय बरस रहे मदन रस का रसास्वादन ले रहा है और महुआ भी अपने प्रेम की पुष्‍पांजली भेट कर धरा को प्रसन्न  कर रहा है।

धरती पर फूला हुआ टप-टप गिर रहा महुआ किसी रस भरे मोतियों से कम नजर नहीं आता है। आकाश में चंदा मामा अपनी प्यारी सी चितवन के साथ खिले हुए है इस रस भरे वातावरण में महुआ की मादकता प्रेमियों की उपस्थिति पर मदन रस की खुमारी में मदमस्त कर दिल की कोमल भावनाओं को भड़का रहे है और संयोग से कोई कवि हृदय मौजूद हो तो उसकी कल्‍पनाओं में वह आम की तरह बौरा जाएगा जैसे भौरा पागल हो जाता है। महुआ औषधीय गुणों से भरपूर होता है इसका उल्लेख महर्षि सुश्रुत ने करते हुए कहा है कि महुआ के फूल वीर्यवर्धक है, भूख प्यास शांत कर हस्‍टपुस्‍ट बनाने वाले है। महुआ स्वाद में मीठे है , ठण्डे है, पित्त दाह करने व परिश्रम को दूर करने वाले है। बुन्देलखण्ड में एक कहावत है कि ‘’ महुआ मेबा, बेर कलेवा, गुलगुला बडी मिठाई। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में महुआ का दवा के रूप में उपयोग होता है और लोग दबा-दारू के रूप में मरीजों को देते है। यह अलग बात है कि आज  महुआ दवा के रूप में नहीं बल्कि दारू के रूप में प्रयोग हो रहा है और लोग ‘महुआ’ को बदनाम कर कच्ची महुआ की कहकर धनकुबेर ही नहीं बल्कि राजनीति की सीढिया चढ पगला गए है।

      महुआ का जिक्र विश्व के प्रथम कविवर वाल्मीकि जी ने भी किया है ‘’पम्‍पातीरे रूहाश्‍चेमे संसक्ति मधुगन्धिन:।‘’  उन्‍हें महुआ की सुगंध इतनी सुहानी लगी जो उनके दिल में बस गयी और ‘’पम्‍पापुर ‘’ के पानी में पले पुसे महुआ के बे बिरछा पता थे कि महुअन के महावन किधर है –मधूकानां महावनम।‘’ महाकवि वाल्मीकि जी को सभी जगह महुआ दिखाई देते है तभी चित्रकूट, पंचवटी, लंका और अयोध्या में इसका जिक्र आया है। सीता जी सोने के हिरण पर रीझी तब वाल्मीकि जी जहां हिरण था वहा का हिस्‍से का जिक्र महुआ के फूल की आभा जैसा बताया है-‘मधूक निभ पार्श्:।‘ यही नहीं अठारह पुराणों के रचयिता वेदव्यास जी को भी महुआ बहुत प्यारा लगा जो उनके मन को भा गया था। महुआ की मीठी सुगंध सनी है उनका जन्म कालपी के पास व्यासटीला में हुआ, जन्मभूमि की माटी की सुगंध महुआ की सुगंध उनके मन में बसी थी महाभारत में राजकुंवर चित्रांगदा का उल्लेख करते हुए वे बोल उठते है-‘’चित्रागंदा चैव नरेन्‍द्र कन्‍या एषा सवर्णाग्रमधूकपुष्‍पे:।‘’ अर्थात यह राजकुंवर महुआ के फूलों की आभा लिए चमक रहा है।

महुआ की पहचान तो रतन पारखियों को होती है जो महुआ को जानते है। बचपन में हमने बरसात देखी है जो पानी की झड़ी लगती थी तो पन्द्रह दिन तक बरसात थमने का नाम नहीं लेती थी तब महुआ, गुड और चुना हर घर में कलेवा की तरह मिलता था। ग्रामवासियों ही नहीं अपितु ग्रामीण परिवेश को जी रहे शहरी का कल्‍याण उस समय महुआ करता था। चैत्र की शुरूआत में आज भी नये संबंत्‍सर गुडीपडवा को सभी महुआ और गुड बॉटकर महुआ के मीठे मोतियों से अपनी झोली भरते है। हजारों साल हो गए आज भी महुआ के रसीले मोतियों का बटना जारी है। ग्रामीणजन  महुआ के पेड के नीचे से इन सफेद मोतियों को एकत्र कर घर लाकर धूप में सुखाकर किशमिश के आकार का होने पर प्रयोग करते है। आजकल महुआ की धार के प्याले का चलन है और आधुनिक कवि हरिवंशराय बच्‍चन ने तो पूरी मधुशाला महुआ के फूलन की मीठी रसधार का बखान कर दिया, भले बच्‍चन ने उसे सूंधी न हो, पी न हो पर प्यास ऐसी जगी कि मधुशाला आने जाने वाला हरेक शख्स प्यास प्यास रटने लगा और उमर खय्याम ने तो प्यार से प्याला चढ़ाया और पार उतर गए।

जीवन के भीतर और बाहर महुआ की मिठास बरसती है तो महुआ की धार पीने वाला व्यक्ति अंदर से मदमस्त होता है और बाहर हवा मिठास की सुगंध लिए वातावरण को मदमस्त किए होती है। किसी का दिन मदमस्त होता है तो किसी की रात मदमस्त होती है। सूरज की किरणें जीवन की मिठास झर झर बरसा रही है, गाय का अमृत रूपी दूध, मीठे सभी पेड पौधे हमें फलों की मिठास से भरकर जीवन को आनंदमय कर रहे है। महुआ का सम्बन्ध सभी से है, महुआ सभी मनुष्यों का पालन करता था पर आज महुआ सरकार का पालन कर रहा है और सरकार की तिजोरी भर रहा है। सरकार के पालन की बात तो ठीक थी, अब महुआ सरकार नाशक भी हो गया है, दिल्ली की सरकार महुआ के श्राप के कारण जेल में है। महुआ बाबा देने में कंजूसी नहीं करता और लुटाने में भी उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। महुआ के आसपास की मादक हवा सुनसान रातों को मस्ती में भर रही है, दिन की रूनझुन हो या रात की, अथवा लालिमा लिए संध्‍या हो या उषा सभी ऊँ की मस्ती में गुंजायमान है पर जगत के प्रति मोहग्रस्त हम जैसे तुच्छ मानव महुआ के मोतियों को टप टप कर झरने वाले शब्द में भी अपना स्‍वार्थ सिद्ध कर लेते है और हमें चांदनी रात में कुछ समय के लिए आनन्‍द और मस्‍ती देकर हम पर गिरने वाले महुआ के इन सफेद मोतियों में भी भाव जाग जाता है कि चांदनी रात में महुआ तरे, मदन रस बरसे।

आत्‍माराम यादव पीव