लेख

शिक्षा मंत्री का इस्तीफा किसी की हार नहीं बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था में सुधार का अवसर

डा. नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी

भारतीय लोकतंत्र में शायद ही कोई ऐसा विषय हो जो कुछ ही दिनों में राजनीति का अखाड़ा न बन जाए। सड़क पर उठने वाली हर आवाज़ कुछ ही समय बाद सत्ता और विपक्ष के बीच रस्साकशी का विषय बन जाती है लेकिन कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिन्हें राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय राष्ट्रीय दृष्टि से देखना चाहिए। NEET को लेकर उठा छात्र आंदोलन और उसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी ऐसा ही प्रश्न है। यदि कभी किसी मंत्री का इस्तीफ़ा होता है तो उसे न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत पराजय माना जाना चाहिए और न राहुल गांधी अथवा विपक्ष की विजय। यदि उस घटना से शिक्षा व्यवस्था अधिक पारदर्शी, अधिक उत्तरदायी और अधिक विश्वसनीय बनती है, तभी उसका वास्तविक अर्थ होगा।

भारत में डॉक्टर बनने का सपना केवल छात्र का सपना नहीं होता। उसके साथ एक किसान का खेत जुड़ा होता है, एक मजदूर की अधूरी इच्छाएँ जुड़ी होती हैं, एक माँ के गहने गिरवी रखे होते हैं और एक पिता की पूरी सेवा-निवृत्ति की जमा पूँजी दाँव पर लगी होती है। ऐसी स्थिति में यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं, तो केवल प्रश्नपत्र नहीं, करोड़ों परिवारों का विश्वास भी कटघरे में खड़ा हो जाता है। इसलिए यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल की देन नहीं था; इसकी जड़ें उन विद्यार्थियों की पीड़ा में थीं जो अपनी मेहनत का न्याय चाहते थे।

इस आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण सत्य उजागर किया कि आज का भारतीय विद्यार्थी पहले की तरह मौन नहीं है। वह प्रश्न पूछता है। वह सूचना का अधिकार भी जानता है और संवैधानिक अधिकार भी। वह अदालत का दरवाज़ा भी खटखटाता है और लोकतांत्रिक विरोध भी करता है। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक व्यवस्था पर विश्वास रखते हुए उससे जवाब भी माँगता है लेकिन यहीं से राजनीति अपना रंग दिखाने लगती है।

छात्रों की माँग थी कि परीक्षा प्रणाली निष्पक्ष हो, दोषियों पर कार्रवाई हो और भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों। धीरे-धीरे यह आंदोलन राजनीतिक दलों की उपस्थिति से घिरने लगा। सत्ता पक्ष इसे सीमित प्रशासनिक त्रुटि सिद्ध करने में लगा रहा, जबकि विपक्ष ने इसे सरकार की व्यापक विफलता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। लोकतंत्र में दोनों का अधिकार है लेकिन प्रश्न यह है कि इस पूरी बहस में छात्र कहाँ रह गया?

आज भारतीय राजनीति का बड़ा दुर्भाग्य यह है कि लगभग हर राष्ट्रीय मुद्दा अंततः नरेंद्र मोदी के समर्थन या विरोध में बदल जाता है। शिक्षा का प्रश्न भी उसी ध्रुवीकरण का शिकार होता दिखाई दिया। अनेक विपक्षी नेताओं ने छात्रों की पीड़ा को मुखरता से उठाया, जो उनका लोकतांत्रिक दायित्व भी था। किंतु अनेक अवसरों पर ऐसा भी लगा कि शिक्षा सुधार की चर्चा से अधिक राजनीतिक लाभ-हानि की गणना हो रही है। यदि किसी छात्र आंदोलन का अंतिम उद्देश्य केवल सरकार को घेरना रह जाए तो छात्र हित धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चला जाता है।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि सरकार आलोचना से ऊपर है। लोकतंत्र में बहुमत सरकार को अधिकार देता है, किंतु नैतिक उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं करता। यदि परीक्षा प्रणाली में कहीं गंभीर चूक हुई है, तो सरकार का कर्तव्य है कि वह दोषियों की पहचान करे, संस्थागत सुधार करे और जनता का विश्वास पुनः अर्जित करे। किसी भी लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति अपनी भूल स्वीकार कर उसे सुधारने की क्षमता होती है।

इस पूरे आंदोलन का एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष भी सामने आया, जिसने इसकी नैतिक शक्ति को कुछ हद तक क्षति पहुँचाई। अधिकांश छात्र अत्यंत शांतिपूर्ण ढंग से अपनी माँगें रख रहे थे। उनके हाथों में पुस्तकों का भविष्य था, राजनीति का झंडा नहीं किंतु जैसे-जैसे आंदोलन लंबा चला, कुछ स्थानों पर ऐसे तत्व भी सक्रिय दिखाई दिए जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध अत्यंत अशोभनीय, अभद्र और व्यक्तिगत स्तर की गालियों का प्रयोग किया। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार संविधान देता है, लेकिन गाली देने का अधिकार कोई संविधान नहीं देता। विचार का उत्तर विचार है, अपशब्द नहीं।

ऐसे नारे केवल प्रधानमंत्री का अपमान नहीं करते बल्कि उस आंदोलन की गरिमा भी कम कर देते हैं जिसके केंद्र में लाखों छात्रों का भविष्य हो। इससे सरकार को यह कहने का अवसर भी मिलता है कि आंदोलन अपनी मूल दिशा से भटक गया है। किसी भी जनांदोलन में जब तर्क की जगह अपशब्द और संवाद की जगह उत्तेजना ले लेती है, तब सबसे अधिक नुकसान उसी आंदोलन को होता है।

यहीं विपक्ष की भूमिका भी गंभीर समीक्षा की माँग करती है। विपक्ष का दायित्व छात्रों की आवाज़ को संसद तक पहुँचाना था, उन्हें न्याय दिलाने का प्रयास करना था और शिक्षा सुधार की ठोस रूपरेखा प्रस्तुत करनी थी। लेकिन कुछ अवसरों पर ऐसा प्रतीत हुआ कि कुछ राजनीतिक दल इस आंदोलन को शिक्षा सुधार से अधिक मोदी विरोध के राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। लोकतंत्र में सरकार का विरोध पूरी तरह वैध है, किंतु यदि प्रत्येक छात्र आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन का मंच बन जाए, तो लोकतांत्रिक विमर्श अपनी दिशा खो देता है।

हालाँकि पूरे विपक्ष को एक ही दृष्टि से देखना भी न्यायोचित नहीं होगा। लोकतंत्र में ऐसे जनप्रतिनिधि भी हैं जो टकराव नहीं, संवाद की राजनीति में विश्वास रखते हैं। राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा द्वारा विभिन्न जन आंदोलनों में संवाद स्थापित करने के प्रयास इसकी मिसाल रहे हैं। सोनम वांगचुक के अनशन के दौरान संवाद का वातावरण बनाने में उनकी भूमिका यह संकेत देती है कि लोकतंत्र केवल विरोध से नहीं, मध्यस्थता और सहमति से भी चलता है। यदि छात्र आंदोलनों में भी ऐसी संवादपरक राजनीति को बढ़ावा मिले, तो समाधान अधिक शीघ्र और स्थायी हो सकते हैं।

सरकार की भूमिका का दूसरा पक्ष भी उल्लेखनीय है। लोकतंत्र की कसौटी केवल चुनाव नहीं होते, बल्कि विरोध सहने की क्षमता भी होती है। तीखे आरोप, लगातार प्रदर्शन, न्यायिक प्रक्रिया और मीडिया की आलोचना के बीच भी संवैधानिक ढाँचा चलता रहा। इसे लोकतांत्रिक सहनशीलता के रूप में देखा जा सकता है। किंतु सहनशीलता का अर्थ केवल विरोध को सहना नहीं, बल्कि विरोध के कारणों को समझना भी है। यदि लाखों विद्यार्थी व्यवस्था पर विश्वास खोने लगें, तो किसी भी सरकार के लिए यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।

इस आंदोलन ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सामने कई गहरे प्रश्न रख दिए हैं। क्या परीक्षा प्रणाली इतनी सुरक्षित है कि कोई भी प्रतिभाशाली छात्र निश्चिंत होकर परीक्षा दे सके? क्या तकनीकी व्यवस्था इतनी मजबूत है कि किसी प्रकार की अनियमितता की संभावना न्यूनतम हो? क्या उत्तरदायित्व तय करने की स्पष्ट व्यवस्था है? क्या स्वतंत्र परीक्षा नियामक संस्थाओं को और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता नहीं है? इन प्रश्नों के उत्तर केवल मंत्री बदलने से नहीं मिलेंगे; इनके लिए संस्थागत सुधारों की आवश्यकता होगी।

आज आवश्यकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा सुधार आयोग गठित हो, आधुनिक साइबर सुरक्षा तंत्र विकसित किया जाए, प्रश्नपत्र निर्माण और वितरण की प्रक्रिया को पूरी तरह तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाया जाए, शिकायतों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित किया जाए तथा दोषियों के विरुद्ध ऐसी कठोर कार्रवाई हो जो भविष्य के लिए नज़ीर बन सके। शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति-निर्भर नहीं, प्रणाली-निर्भर होनी चाहिए।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह आंदोलन एक संकेत छोड़ गया है। आने वाले समय में युवा मतदाता केवल जातीय समीकरणों और चुनावी नारों से प्रभावित नहीं होगा। वह शिक्षा, रोजगार, पारदर्शिता और अवसर की समानता को भी मतदान का आधार बनाएगा। इसलिए सत्ता और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि छात्र अब केवल वोट बैंक नहीं हैं; वे जागरूक नागरिक हैं।

यदि इस पूरे घटनाक्रम का निष्कर्ष केवल इतना निकाला जाए कि किसी मंत्री का इस्तीफ़ा हो गया या नहीं हुआ, तो यह आंदोलन अपने उद्देश्य से भटक जाएगा। असली प्रश्न किसी व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का है। मंत्री बदलने से शिक्षा नहीं बदलती; शिक्षा तब बदलती है जब संस्थाएँ मजबूत होती हैं, जवाबदेही तय होती है और व्यवस्था जनता का विश्वास जीतती है।

इसलिए धर्मेंद्र प्रधान का संभावित इस्तीफ़ा न तो मोदी की व्यक्तिगत हार माना जाना चाहिए और न राहुल गांधी की राजनीतिक विजय। यदि इससे भारतीय शिक्षा व्यवस्था अधिक ईमानदार, अधिक पारदर्शी और अधिक उत्तरदायी बनती है, तभी यह लोकतंत्र की जीत होगी। अन्यथा एक मंत्री जाएगा, दूसरा आ जाएगा, सरकारें बदल जाएँगी, विपक्ष बदल जाएगा, लेकिन यदि विद्यार्थियों का विश्वास नहीं लौटा तो हार पूरे राष्ट्र की होगी।

इतिहास सत्ता परिवर्तन को कुछ वर्षों तक याद रखता है, किंतु शिक्षा सुधार को पीढ़ियों तक। इसलिए आज आवश्यकता राजनीतिक विजय पताकाएँ फहराने की नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था निर्मित करने की है जहाँ किसी विद्यार्थी को यह भय न रहे कि उसकी वर्षों की मेहनत किसी अनियमितता की भेंट चढ़ जाएगी। यदि यह आंदोलन उस दिशा में पहला निर्णायक कदम बनता है, तभी इसकी वास्तविक सफलता मानी जाएगी।

नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी