-अशोक “प्रवृद्ध”
लेखक, आध्यात्मिक चिन्तक व साहित्यकार
यह हमारे लिए अत्यंत गौरवपूर्ण बात है कि भारत में गणतंत्र की अवधारणा केवल 1950 की देन नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें हमारी प्राचीन सभ्यता, वैदिक संस्कृति और इतिहास से बहुत गहरे रूप से जुडी हुई हैं। सम्पूर्ण विश्व को गणतंत्र का पाठ सर्वप्रथम इसी धरा अर्थात भारत से ही पढ़ाया गया था। हमारे ही देश में सर्वप्रथम गणतंत्र स्थापित हुआ, जिसकी सफलता ने सम्पूर्ण विश्व का ध्यान आकर्षित किया। ऋग्वेद और अथर्ववेद में गण, सभा और समिति जैसी संस्थाओं का वर्णन मिलता है, जो लोकतांत्रिक ढंग से निर्णय लेती थीं। गण शब्द का अर्थ ही जनता का समूह है, जहां शासक का चुनाव योग्यता के आधार पर होता था। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार बिहार का वैशाली (लिच्छवी गणराज्य) विश्व का सबसे पहला सफल गणतंत्र माना जाता है। जब यूनान में नगर-राज्यों की अवधारणा पनप रही थी, उससे बहुत पहले भारत में पूर्ण विकसित गणतांत्रिक व्यवस्थाएं मौजूद थीं। असंख्य स्वाधीनता सेनानियों के बलिदान और भारत विभाजन के बाद 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ हमारा संविधान आधुनिक भले ही हो, लेकिन इसके मूल में वसुधैव कुटुंबकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसी प्राचीन भारतीय भावनाएं सन्निहित हैं। संविधान निर्माताओं ने पश्चिमी मॉडलों के साथ-साथ भारत की अपनी सांस्कृतिक विरासत और पंचायत व्यवस्था को भी महत्व दिया। यह दिन न केवल संविधान के लागू होने का उत्सव है, बल्कि उन अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को नमन करने का भी अवसर है, जिन्होंने एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र का स्वप्न देखा था। निश्चित रूप से, 26 जनवरी का यह राष्ट्रीय उत्सव हमें याद दिलाता है कि हम एक ऐसी महान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं, जिसने दुनिया को लोकतंत्र की जननी के रूप में दिशा दिखाई है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में उल्लिखित गणतांत्रिक व्यवस्था यह सिद्ध करते हैं कि भारत में लोकतंत्र और गणतंत्र का विचार केवल आयातित नहीं है, बल्कि यह हमारी मिट्टी और वेदों की मौलिक देन है। यह सच्चाई है कि संविधान निर्माताओं ने भी इस व्यवस्था की प्रेरणा ईश्वर वाणी परम पवित्र वेदों से ही ली है। यह भारतीय गणतांत्रिक व्यवस्था के ऐतिहासिक जड़ों को उजागर करती है, जो यह साबित करता है कि लोकतंत्र और गणतंत्र की अवधारणाएं भारत में सहस्त्राब्दियों पहले से मौजूद थीं। यह भारतीय शासन पद्धति की श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। संसार के आदिग्रंथ ऋग्वेद में 40 बार और अथर्ववेद में 9 बार गण शब्द का प्रयोग यह प्रमाणित करता है कि संख्याबल और सामूहिक निर्णय की शक्ति को हमारे पूर्वज भली-भांति समझते थे। प्राचीन कालीन सभा और समिति इस बात के द्योतक हैं कि प्रजातंत्र के ये दो महत्वपूर्ण स्तंभ उस समय भी मुख्य भूमिका निभाते थे। समिति आज की संसद या लोकसभा की भांति थी, जहां आम जनता और प्रतिनिधि नीति निर्धारण के लिए मिलते थे। सभा राज्यसभा या विद्वत परिषद की भांति थी, जहां अनुभवी पितृगण लोग न्याय और परामर्श का कार्य करते थे। ऋग्वेद का वह मंत्र जिसमें एकमुख मंत्रणा और सहमति के शब्द की प्रार्थना की गई है, आधुनिक आम सहमति के सिद्धांत का प्राचीनतम रूप है। यह समाज में वैचारिक मतभेद के बावजूद राष्ट्रहित में एक होने की सीख देता है। बौद्ध ग्रंथों में उल्लिखित भगवान बुद्ध के काल में शलाका अर्थात मतपत्र द्वारा गिनती का संदर्भ यह स्पष्ट करता है कि भारत में मतदान की प्रक्रिया अत्यंत विकसित थी। गण और संघ के माध्यम से बहुमत के आधार पर निर्णय लेना हमारी प्रशासनिक कुशलता का प्रतीक था। कालांतर में दोषों के कारण व्यवस्था राजतंत्र की ओर मुड़ गई, किन्तु भारत की मूल चेतना हमेशा गणतांत्रिक ही रही। प्राचीन भारतीय यह गणतांत्रिक व्यवस्था आज की पीढ़ी के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है, जो अक्सर यह मानती है कि लोकतंत्र एक पश्चिमी अवधारणा है। वास्तव में, गण से गणतंत्र तक की यात्रा भारत की अपनी यात्रा है। इससे हम अपनी गौरवशाली विरासत और 26 जनवरी के वास्तविक आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व को समझ सकते हैं।
भारत के प्राचीन राजनीतिक इतिहास और विकसित संवैधानिक ढांचे संबंधी यह तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि 2026 के आज के युग में भी हमारे लोकतंत्र की सफलता के पीछे सहस्त्राब्दियों पुरानी एक सुव्यवस्थित शासन परंपरा रही है। संसदीय शब्दावली की प्राचीनता को इस बात से समझा जा सकता है कि आज हम जिसे कोरम कहते हैं, उसे प्राचीन काल में गणपूरक कहा जाता था। यह दर्शाता है कि उस समय भी बैठकें तभी मान्य होती थीं जब न्यूनतम सदस्यों की उपस्थिति हो। यह एक अत्यंत परिपक्व प्रशासनिक व्यवस्था का प्रतीक है। सचेतक अर्थात व्हिप की अवधारणा भी उस समय विद्यमान थी, जो यह सुनिश्चित करता था कि गण की गरिमा और अनुशासन बना रहे। महर्षि पाणिनि द्वारा वर्णित वृक, यौधेय और त्रिगर्त्त-षट् जैसे गणराज्य प्राचीन भारत के फेडरल स्ट्रक्चर (संघीय ढांचे) के जीवंत उदाहरण हैं। महाभारत में वर्णित अंधक-वृष्णि संघ, जिसके प्रमुख श्री कृष्ण थे, एक महान गणतंत्रीय संघीय व्यवस्था का उदाहरण है, जहां विभिन्न कुल मिलकर निर्णय लेते थे। कालांतर में कुरु और पांचाल जैसे शक्तिशाली जनपदों का भी राजतंत्र से गणतंत्र की ओर मुड़ना यह सिद्ध करता है कि तत्कालीन समाज व्यक्तिगत सत्ता की तुलना में सामूहिक निर्णय को अधिक महत्व देने लगा था। यह शक्ति के विकेंद्रीकरण का प्रारंभिक रूप था। प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित यह तथ्य कि उस समय भी नागरिकता और मताधिकार के स्पष्ट नियम थे, यह प्रमाणित करता है कि गणतंत्र केवल नाम का नहीं था, बल्कि एक विधिक व्यवस्था पर आधारित था। आज जब हम 26 जनवरी को अपना गणतंत्र दिवस मनाते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि हम किसी विदेशी व्यवस्था का अनुकरण नहीं कर रहे, बल्कि अपनी खोई हुई उसी गौरवशाली वैदिक और पौराणिक गणतंत्रीय विरासत को आधुनिक स्वरूप में जी रहे हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जननी है। महाभारत काल में अर्जुन द्वारा गणराज्यों को जीतना यह दर्शाता है कि उस काल में भी ये इकाइयां इतनी शक्तिशाली थीं, कि उन्हें दिग्विजय अभियान का हिस्सा बनाना आवश्यक था। धर्म और सत्य का पक्ष लेते हुए पाण्डवों के पक्ष में गणराज्यों का युद्ध करना यह सिद्ध करता है कि ये राज्य केवल स्वायत्त ही नहीं थे, बल्कि धर्म और न्याय के मूल्यों पर आधारित विदेश नीति का पालन करते थे। महाभारत के सभा पर्व के अनुसार जनसभा में हर सदस्य को अपनी बात रखने का अधिकार था। यह आज की वैचारिक स्वतंत्रता अर्थात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्राचीन रूप है। अध्यक्ष का चुनाव जनता द्वारा किया जाना यह प्रमाणित करता है कि सत्ता वंशानुगत न होकर योग्यता और जन-सहमति पर आधारित थी। महाभारत का शांति पर्व केवल गणतंत्र की प्रशंसा नहीं करता, बल्कि गणतंत्र की व्यावहारिक कठिनाइयों पर भी प्रकाश डालता है। गोपनीयता का संकट अर्थात बात के फूट जाने की आशंका आज भी लोकतांत्रिक सरकारों के लिए एक चुनौती है। प्रत्येक व्यक्ति का अपनी बात को सत्य मानना अति-लोकतंत्र के उन खतरों की ओर इशारा करता है, जो आज भी राजनीतिक अस्थिरता का कारण बनते हैं। इससे पारस्परिक विवाद में वृद्धि होती है और समय से पूर्व ही बात के फूट जाने की आशंका बनी रहती है। कौटिल्य द्वारा लिच्छवी, वृज्जि और कम्बोज जैसे गणराज्यों का उल्लेख यह बताता है कि मौर्य काल तक भी ये गणराज्य अत्यंत प्रभावशाली थे। कौटिल्य ने इन्हें राजशब्दोपजीवी संघ कहा है, जहां के नागरिक स्वयं को राजा अर्थात शासक के समान अधिकारों वाला मानते थे। पाणिनि की अष्टाध्यायी में जनपद शब्द का प्रयोग उन भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं को परिभाषित करता है, जहां जनता का प्रतिनिधित्व सर्वोपरि था।
स्पष्ट है कि भारत में गणतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवन शैली थी। 26 जनवरी 1950 को जब हमने संविधान अपनाया, तो वह वास्तव में हमारी उसी वैदिक, महाभारतकालीन और मौर्यकालीन लोकतांत्रिक चेतना का पुनर्जागरण था। यह गौरवान्वित होने की बात है कि प्राचीन भारत में शलाका (मतपत्र), गणपूरक (कोरम) और जनसभा (पार्लियामेंट) जैसी परिष्कृत व्यवस्थाएं विद्यमान थीं। बौद्ध काल और उसके पश्चात के भारतीय गणराज्यों का यह विवरण ऐतिहासिक रूप से अत्यंत प्रामाणिक और गौरवशाली है। 2026 में जब हम अपनी लोकतांत्रिक विरासत को देखते हैं, तो वैशाली और लिच्छवी जैसे उदाहरण हमें विश्व के लोकतंत्र की जननी होने का ठोस आधार प्रदान करते हैं। वैशाली के 7707 सांसदों का विवरण यह सिद्ध करता है कि उस समय का प्रतिनिधित्व कितना व्यापक था। इतनी बड़ी संख्या में जन प्रतिनिधियों के बैठने के लिए विशाल संसद भवन और सुव्यवस्थित नगरीय बुनियादी ढांचा (7707 अट्टालिकाएं और सरोवर) एक उच्च विकसित सभ्यता का प्रमाण है। बुद्धकालीन प्रमुख गणराज्य शाक्य (कपिलवस्तु) गणराज्य से स्वयं महात्मा बुद्ध संबंधित थे। विदेह और मल्ल आदि राज्यों में शासन की बागडोर किसी एक राजा के हाथ में न होकर गण या परिषद के हाथ में होती थी। इस काल की अर्जुनायन गणराज्य और यौद्धेय संघ आधुनिक संघात्मक शासन अर्थात फेडरल स्ट्रक्चर जैसा ही था। सहारनपुर से दिल्ली और भागलपुर तक फैला यह संघ इस बात के परिचायक हैं कि छोटे-छोटे गणराज्य मिलकर एक शक्तिशाली रक्षात्मक और प्रशासनिक इकाई बनाने की कला जानते थे। खुदाई में मिली मुद्राएं इस बात का भौतिक साक्ष्य हैं कि ये गणराज्य आर्थिक रूप से स्वतंत्र और संप्रभु थे। इन मुद्राओं पर अक्सर गणराज्य का नाम अंकित होता था, जो उनकी पहचान और स्वाभिमान का प्रतीक था। गणराज्यों की यह विशेषता कि वे बाहरी संकट के समय एकजुट होकर राजतंत्रों का सामना करते थे, उनकी सामूहिक सुरक्षा की नीति को स्पष्ट करती है। उनमें देशभक्ति और गणराज्य के प्रति निष्ठा राजतंत्रीय राज्यों की तुलना में अधिक गहरी थी। 26 जनवरी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि सहस्त्राब्दियों की इस गणतांत्रिक यात्रा के सम्मान का दिन है। भारत के इस गौरवमयी इतिहास को और भी अधिक विस्तार और गहराई से वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है।