कविता

लोमड़ की मक्कारियाँ

लोमड़ की मक्कारियाँ, भालू का अभिमान।
श्वान भौंककर सोचता, जीतेगा मैदान॥

जंगल के ठेकेदार ये, करते खूब बखान।
खुद के दम पर कुछ नहीं, टोली पर अभिमान॥

लोमड़ बाँटे झूठ को, श्वान मचाए शोर।
भालू ताके राजपद, नीति खड़ी कमजोर॥

लोमड़ नीति सिखा रहा, भालू दे उपदेश।
श्वान भौंककर दे रहा, चरित्र का संदेश॥

शेर हटे तो राज मिले, यही सोच दिन-रात।
जंगल का हित भूलकर, करते अपनी बात॥

झूठे नारे और भीड़ है, झूठा सारा ज्ञान।
दूजों को दोषी कहे, खुद जो बेईमान॥

जो खुद जंगल लूटते, वे ही करें सवाल।
शेर हटेगा तो खुले, लूट पाट का जाल॥

लोमड़ अपनी बुद्धि से, भालू अपनी देह।
श्वान जुटाए शोर को, शेर न जाने नेह॥

एक अकेला शेर भी, रखता अपनी शान।
मिलकर उसको घेरते, कपटी, बेईमान॥

  • डॉ. प्रियंका सौरभ