भारत के आम चुनाव और निर्वाचन आयोग

राकेश कुमार आर्य
भारत में चुनावों की प्रक्रिया त्रिस्तरीय होती है । इसमें लोक सभा , विधान सभा नगर / ग्राम पंचायत के चुनाव संपन्न कराए जाते हैं । इसके अतिरिक्त मंडी समितियों के निकायों के चुनाव भी पूर्ण पारदर्शिता के साथ देश में संपन्न कराए जाते हैं । इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र में चुनावों का विशेष महत्व है । साथ ही साथ हमारे देश की विशाल जनसंख्या के कारण देश के निर्वाचन आयोग का भी निर्वाचन प्रणाली में और भारतीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण स्थान है । हमारे देश में लगभग हर वर्ष कहीं ना कहीं किसी ना किसी स्तर के चुनाव होते रहते हैं। यही कारण है कि भारत का निर्वाचन आयोग पूरे 5 वर्ष सक्रिय रहता है , और उसे अपनी निष्पक्ष भूमिका निभाने के लिए बहुत ही सजग और सावधान रहना पड़ता है। देश के राजनीतिक दल अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए कुछ ना कुछ ऐसी युक्तियां खोजते रहते हैं जो कि अलोकतांत्रिक होती हैं । उन पर नियंत्रण स्थापित रखने के लिए और उन्हें लोकतंत्रिक उपायों के माध्यम से निर्वाचन प्रक्रिया में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित करने हेतु निर्वाचन आयोग की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका बन जाती है। इस अध्याय में हम भारत की लोकसभा के अब तक के चुनावों पर और भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका पर विचार करेंगे।
स्वतंत्र भारत में लोकसभा के पहले चुनाव 1952 में आयोजित किए गए थे । देश के संविधान के अनुसार देश के निर्वाचित प्रतिनिधि पहली बार 1952 में लोकसभा में पहुंचे ।भारत में पहले दिन से ही मुख्य मुकाबला कांग्रेस बनाम अन्य दलों के मध्य रहा है । 2014 से इस स्थिति में परिवर्तन आया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण कांग्रेस का नाम देश का जन – जन जानता था । उसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस को अपने परिचय के लिए लोगों के सामने अधिक कुछ नहीं कहना पड़ा । प्रारंभ में हिंदू महासभा कांग्रेस के लिए एक अच्छी चुनौती देने वाला दल रहा था । इसी दल से जनसंघ की उत्पत्ति हुई और जनसंघ से कालांतर में भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ । संविधान में कुल 552 सदस्यों की लोकसभा के गठन का प्रावधान रखा गया है । इन 552 सदस्यों में से 530 सदस्य राज्यों के और 20 सदस्य केंद्र शासित प्रदेशों के लिए रखे गए , जबकि 2 सदस्य एंग्लो इंडियन रखे गए । जिन्हें हमारे देश का राष्ट्रपति उन परिस्थितियों में मनोनीत कर सकता है जब राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि एंग्लो इंडियन समुदाय से कोई भी व्यक्ति जनप्रतिनिधि के रूप में देश की संसद में नहीं पहुंचा है।

भारत की पहली लोकसभा 
भारत की पहली लोकसभा का गठन 1952 में हुआ था । उस समय लोकसभा की 489 सीटों के लिए चुनाव कराया गया था । यही वह चुनाव थे जिनमें स्वतंत्र भारत के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य पंडित जवाहरलाल नेहरू को मिला था । उन्होंने 489 में से 364 सीटें जीतकर भारी बहुमत से स्वतंत्र भारत की पहली निर्वाचित सरकार का नेतृत्व किया । कुल पड़े मतों का 45% उस समय नेहरू की कांग्रेस को मिला । लोकसभा के इन चुनावों में 44. 87% लोगों ने भाग लिया था । इतनी कम संख्या से पता चलता है कि लोकसभा के चुनावों के प्रति नीरसता का भाव देश के लोगों में पहले दिन से ही रहा । यद्यपि उस समय नए-नए चुनाव देश में हो रहे थे तो अत्यधिक उत्साह लोगों में होना चाहिए था । देश के लोगों ने बड़ी संख्या में निर्वाचन प्रक्रिया में भाग न लेकर मैदान कांग्रेस के लिए खुला छोड़ दिया । कांग्रेस ने 4,76,6 5,951 मत प्राप्त किए और उसने निर्वाचन प्रक्रिया में सम्मिलित होने वाले सभी दलों को करारी पराजय दी । 
देश की पहली लोकसभा का गठन 17 अप्रैल 1952 को हुआ । पहले चुनाव में भाग लेने से पूर्व ही पंडित जवाहरलाल नेहरू के दो कैबिनेट मंत्री उनसे अलग हो गए थे । इनमें से श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अक्टूबर 1951 में जनसंघ नाम की पार्टी की स्थापना की । जबकि डॉ बी आर अंबेडकर ने अनुसूचित महासंघ की स्थापना की । अनुसूचित महासंघ को ही बाद में रिपब्लिकन पार्टी का नाम दिया गया था । यह दोनों महानुभाव नेहरू मंत्रिमंडल में प्रभावशाली मंत्री थे , परंतु नेहरू की स्वेच्छाचारिता उन्हें रास नहीं आई और उन्होंने अपनी अलग पार्टी का गठन कर लिया । इस चुनाव में आचार्य जे बी कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा परिषद और राम मनोहर लोहिया व जयप्रकाश नारायण की समाजवादी पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भाग लिया था । 489 सीटों के लिए चुनाव हुए। जिनमें 26 राज्यों का प्रतिनिधित्व किया गया था ।जी वी मावलंकर हमारे देश की पहली लोकसभा के निर्वाचित अध्यक्ष बने थे ।पहली लोकसभा ने 677 बैठकें कीं और 3784 घंटे काम करने का कीर्तिमान स्थापित किया । उसके पश्चात अब तक जितनी भी लोकसभाएं बनी हैं , उनमें किसी में भी इतनी अधिक देर तक विधायी कार्य नहीं किया गया । देश की संसद के प्रति उस समय हमारे जनप्रतिनिधियों में गंभीरता का भाव होता था और वह उत्तरदायित्वबोध से प्रेरित होते थे । यही कारण रहा कि पहली लोकसभा में इतनी अधिक बैठकें और इतने अधिक घंटे विधायी कार्य संपन्न हो सका।

दूसरी लोकसभा
भारत की दूसरी लोकसभा में भी कांग्रेस ने अपने पहली लोकसभा वाले इतिहास की पुनरावृति की । इस बार 489 सीटों के लिए चुनाव न होकर 490 सीटों के लिए चुनाव हुए थे । जिनमें से कांग्रेस ने 371 सीटें प्राप्त कीं । कुल पड़े मतों में से 5,75 ,79 ,589 मत लेकर कांग्रेस ने अपने पुराने इतिहास को और भी गर्वीले ढंग से दोहरा दिया । कुल पड़े मतों में से कांग्रेस ने 45.78% मत प्राप्त किए । इस प्रकार देश की जनता ने नेहरू जी के नेतृत्व में पुनः आस्था व्यक्त की और उन्हें अपने देश का प्रधानमंत्री बनाकर निरंतर दूसरी बार इस पद पर बैठने का अवसर प्रदान किया । 
उस समय यद्यपि कई दलों ने निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लिया ,परंतु इस सब के उपरांत भी 19% मत देश के संपन्न हुए दूसरी लोकसभा के चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने प्राप्त किया । यह एक बड़ी संख्या थी जो स्पष्ट कर रही थी कि यदि उस समय विपक्ष मजबूत रहा होता तो कांग्रेस को पराजित करने में उसे कोई कठिनाई नहीं होती । 11 मई 1957 को अनंतशयनम अयंगर लोकसभा के दूसरे अध्यक्ष बनाए गए । श्री अयंगर का नाम प्रधानमंत्री नेहरू और सत्य नारायण सिंहा के द्वारा प्रस्तावित किया गया था । इन्हीं चुनावों के समय फिरोज गांधी जो कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के दामाद थे , का भी उदय हुआ । उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी नंदकिशोर को 29000 मतों से पराजित कर विजय प्राप्त की । लोकसभा के दूसरे चुनावों में एक रुचिकर तथ्य यह भी रहा कि इन चुनावों में एक भी महिला प्रत्याशी नहीं थी । किसी भी दल ने यह उचित नहीं समझा कि लोकसभा के लिए कोई महिला प्रत्याशी भी भेजी जा सकती है या चुनावी मैदान में उतारी जा सकती है । 31 मार्च 1962 तक दूसरी लोकसभा ने काम किया। 

तीसरी लोकसभा 
दो लोकसभा के चुनावों में पंडित जवाहरलाल नेहरू की तूती बोल रही थी । उन्होंने यह सिद्ध कर दिया था कि वह देश के सर्वमान्य नेता हैं और उन्हें चुनौती दी जाना अभी संभव नहीं है । उनके नेतृत्व में देश ने विज्ञान , प्रौद्योगिकी ,औद्योगिक और संचार क्षेत्रों में उन्नति करनी भी आरंभ कर दी थी । देश के लोगों को लग रहा था कि उन्हें एक योग्य नेता मिल गया है, और अब स्वतंत्र भारत शीघ्र ही एक संपन्न ,समृद्ध ,सक्षम और सबल राष्ट्र के रूप में विश्व मानचित्र पर उभरेगा । नेहरू का चमत्कारिक नेतृत्व ऐसी आशाएं बांध रहा था कि यह सब कुछ संभव हो जाएगा । उन्होंने स्टील मिलों और बांधों को आधुनिक भारत के मंदिर घोषित किया और इन दोनों को अपनी नीतियों का मूल आधार बनाकर देश को उन्नति के मार्ग पर प्रशस्त किया । 
इन्हीं परिस्थितियों में 1962 में देश में तीसरे लोकसभा के चुनाव संपन्न हुए । जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू फिर देश के प्रधानमंत्री बने । इस समय तक पाकिस्तान और चीन भारत के लिए मिलकर चुपचाप एक चुनौती बन चुके थे । यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि तत्कालीन भारतीय नेतृत्व विदेश नीति के बिंदु पर पूर्णतया असावधान रहा । पाकिस्तान से निरंतर बिगड़ते संबंधों को पंडित जवाहरलाल नेहरू समझ नहीं पाए और न हीं संभाल पाए । इसके साथ साथ चीन के साथ वह मित्रता का हाथ बढ़ाते रहें और ‘हिंदी चीनी – भाई भाई ‘ का नारा लगाते हुए यह समझ बैठे कि चीन उनके लिए बड़े भाई जैसा ही है । पंडित जवाहरलाल नेहरू का यह भ्रम शीघ्र ही टूट गया । जब 1962 के अक्टूबर माह में चीन ने भारत पर सैनिक हमला कर दिया । चीन ने युद्ध का मुद्दा बनाया कि तिब्बत के पश्चिम में अक्साईचिन के विवादित क्षेत्र में 1956 – 57 में जो वह निर्माण कर रहा था वह पूर्णतया वैध था । 
अक्टूबर-नवंबर 1962 में चीन के साथ स्वतंत्र भारत का पहला युद्ध हुआ । हमारी सेना किसी भी प्रकार की तैयारी नहीं कर पाई थी । इससे पहले कि वह चीन के हमले से अपने आप को संभाल पाती या कुछ समझ पाती , बहुत कुछ ऐसा हो गया जो उसके लिए अप्रत्याशित था । चीन के इस हमले से पूर्णतया असावधान रहे हमारे रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा । भारत को अमरीकी सैन्य सहायता लेने के लिए बाध्य होना पड़ गया । युद्ध के परिणाम देखकर नेहरू जी स्वयं भी अस्वस्थ रहने लगे। 1963 में उन्हें कश्मीर में कई महीने स्वास्थ्य लाभ के लिये व्यतीत करने पड़े । इस सब के उपरांत भी वह अपने आप को संभाल नहीं पाए और 27 मई 1964 को उनका देहांत हो गया । तब देश के एक वयोवृद्ध नेता गुलजारीलाल नंदा को 27 मई 1964 से 9 जून 1964 तक देश का अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया । 
9 जून 1964 को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में लाल बहादुर शास्त्री ने देश की बागडोर संभाली। लाल बहादुर शास्त्री देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री सिद्ध हुए , लेकिन उन्ही के समय में पाकिस्तान ने चीन की नीतियों का अनुकरण करते हुए और भारत को दुर्बल समझते हुए भारत पर 1965 में हमला कर दिया । लाल बहादुर शास्त्री ने देश का सफल नेतृत्व किया और पाकिस्तान को करारी पराजय झेलनी पड़ी । तब रूस ने मध्यस्थता करते हुए दोनों देशों को अपने ताशकंद नामक शहर में वार्ता के लिए आमंत्रित किया । पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान और भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रूस ने अपनी उपस्थिति में वार्ता कराई । वार्ता के परिणाम स्वरूप 10 जनवरी 1966 को भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए । इस समझौते को लाल बहादुर शास्त्री ने दबाव में स्वीकार किया था । जिस पर उन्हें हस्ताक्षर करते हुए दुख हो रहा था । संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में मृत्यु हो गई । तब फिर से देश का अगला प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा को बनाया गया । जिन्होंने 11 जनवरी 1966 से 24 जनवरी 1966 तक दूसरी बार इस पद का दायित्व संभाला। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के. कामराज के सक्रिय प्रयासों के चलते पंडित जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को देश का अगला प्रधानमंत्री 24 जनवरी 1966 को बनाया गया । उन्हें कांग्रेस के मोरारजी देसाई जैसे मजबूत इरादे के नेता ने कड़ी टक्कर दी । परंतु वह अपने प्रयासों में सफल नहीं हो सके । इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था को दो युद्धों का सामना करना पड़ा । जिससे देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी। इसके अतिरिक्त मिजो आदिवासी विद्रोह , अकाल , श्रमिक अशांति ,रुपए के अवमूल्यन और निर्धनता की बदहाली ,पंजाब में भाषाई आंदोलन और धार्मिक अलगाववाद कुछ ऐसी समस्याएं खड़ी हो गई थीं जिन्होंने देश में अव्यवस्था उत्पन्न कर दी थी । पहली बार ऐसा लग रहा था कि देश के लोगों को देश के भीतर बढ़ती इन बीमारियों ने अपने नियंत्रण में लेने का कुचक्र चलना आरंभ कर दिया है । 1947 में देश जिन अपेक्षाओं और आशाओं के साथ आगे बढ़ा था वह कुछ अब झटका सा खाता हुआ अनुभव होने लगा था।

चौथी लोकसभा
चौथी लोकसभा के चुनाव के समय कांग्रेस की स्थिति बड़ी दयनीय हो चुकी थी । निर्वाचन आयोग के लिए इस समय परीक्षा की घड़ी थी । 1965 और उससे पहले 1962 में हुए दो युद्धों के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर जो विपरीत प्रभाव पड़ा था उससे अभी देश दो चार हो रहा था । इसके अतिरिक्त कांग्रेस में भीतरी कलह भी बहुत अधिक बढ़ गया था ।मोरारजी देसाई के नेतृत्व में कांग्रेस के लोग अलग गुट बना रहे थे और वह श्रीमती इंदिरा गांधी को काम करने में बाधा डाल रहे थे । मोरारजी देसाई अपने आप में एक मजे हुए तेजतर्रार नेता थे । वह श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने को किसी भी मूल्य पर तैयार नहीं थे । ऐसे में 1967 में आजादी के बाद जब चौथे आम चुनाव हुए तो स्पष्ट था कि देश राजनीतिक रूप से संक्रमण काल से गुजर रहा था । अब तक कांग्रेस 73% सीटें चुनावों में जीतती आई थी , परंतु अब उसे पहली बार अपनी 60% सीटें लोकसभा के चुनाव में गँवानी पड़ गईं। 
राजनीतिक अस्थिरता का प्रभाव प्रदेशों के विधानसभा चुनाव पर भी पड़ा , जब कई प्रदेशों में कांग्रेस को संविदा सरकार बनाने के लिए विवश होना पड़ा । इतना ही नहीं कांग्रेस की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को अपनी अल्पमत सरकार को चलाने के लिए सीपीआईएम का सहारा लेना पड़ा । उन्हें अपने दल के भीतर विरोधी गुट को शांत करने के लिए मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री और वित्त मंत्रालय का दायित्व देना पड़ा । कांग्रेस की दुर्बलता का लाभ उठाते हुए मोरारजी देसाई इतने पर भी संतुष्ट नहीं थे । वह अभी कुछ और लेना चाहते थे ‘ कुछ और ‘ – की लड़ाई के चलते कांग्रेस का विभाजन हो गया । 12 नवंबर 1969 को अनुशासनहीनता के नाम पर इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को पार्टी से चलता कर दिया । इंदिरा गांधी अपनी सरकार को दूसरों की बैसाखी के आधार पर बहुत अधिक देर तक चलाने के पक्ष में नहीं थी । फलस्वरूप उन्होंने 1 वर्ष पूर्व ही लोकसभा के चुनाव करा दिए। बिहार ,केरल ,ओडीशा ,मद्रास ,पंजाब , पश्चिम बंगाल में गैर कांग्रेसी सरकार बन गई थी । कांग्रेस से मोरारजी देसाई के निष्कासन के पश्चात कांग्रेस का विभाजन हो गया । मोरारजी देसाई के नेतृत्व में कांग्रेस ( ओ ) अर्थात ऑर्गेनाइजेशन और कांग्रेसी ( आई )अर्थात इंदिरा — दो गुटों में कांग्रेस बँट गई । यह कांग्रेस के लिए बहुत ही नाजुक क्षण थे । ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस की नेता श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा चुनाव कराना सचमुच बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य था । अतः इंदिरा गांधी ने उस चुनौती को स्वीकार किया और उन्होंने देश में आम चुनाव करा दिया । यहां पर यह ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि जब देश राजनीतिक संक्रमण काल से गुजर रहा था , तो उस समय देश के राजनीतिक दल कांग्रेस के स्थान पर अपने आप को प्रतिस्थापित कर सकते थे । इसके विपरीत उन्होंने ऐसा कोई कार्य नहीं किया और सत्ता के लालच में आकर संविदा सरकारों के फेर में पड़ गए। जिसका अंतिम लाभ श्रीमती इंदिरा गांधी को मिला । यदि इस समय विपक्ष एकजुट होकर सत्ता परिवर्तन के लिए संघर्ष कर लेता तो इतिहास कुछ दूसरा होता ।
चौथी लोकसभा में कांग्रेस को कुल 283 सीटें मिली थी । कांग्रेस नेहरू के समय में आजादी में अपने दिए गए योगदान को लोगों के सामने रख रख कर उसके आधार पर जीत प्राप्त करती आ रही थी । उसका काम कम बोल रहा था , स्वतंत्रता संघर्ष में उसके द्वारा दिया गया योगदान अधिक बोल रहा था । कांग्रेस ने देश के इतिहास का इस प्रकार से बदलाव कर दिया था ,जिसमें उसकी अपनी भूमिका महत्वपूर्ण लगती थी । यही कारण रहा कि अभी तक के चुनावों में कांग्रेस गांधी के बलिदान को और स्वतंत्रता संघर्ष में अपने योगदान को भुनाती चली गई ।जब पांचवा लोकसभा चुनाव आया तो उस समय परिस्थितियां परिवर्तित हो चुकी थी। 

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