शम्भू शरण सत्यार्थी
महात्मा गाँधी के सपनों का भारत आज हमारे सामने एक अजीब सवाल बनकर खड़ा है। जिस भारत की आजादी के लिए गाँधी ने अपना जीवन लगा दिया, क्या वह वही भारत है जिसकी कल्पना उन्होंने की थी? अंग्रेज चले गए, तिरंगा लहरा रहा है, लोकतंत्र कायम है, देश ने विज्ञान, तकनीक, उद्योग और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में लंबी यात्रा तय की है, दुनिया में भारत की आवाज पहले से अधिक मजबूत हुई है। फिर भी गाँधी के विचारों की कसौटी पर वर्तमान भारत को रखिए तो कई जगह एक गहरा टकराव दिखाई देता है। यह टकराव किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि विकास की उस दिशा से है जिसमें हम आगे बढ़ रहे हैं और उन मूल्यों से है जिन्हें गाँधी भारत की आत्मा मानते थे।
गाँधी के लिए आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति नहीं था। वे चाहते थे कि आम आदमी भय, भूख, शोषण और अपमान से भी मुक्त हो। उनका स्वराज सत्ता के हस्तांतरण तक सीमित नहीं था। उनके लिए स्वराज का मतलब था कि व्यक्ति अपने जीवन के फैसले खुद ले सके, गांव अपने पैरों पर खड़े हों, गरीब को सम्मान मिले, श्रम की प्रतिष्ठा हो, राजनीति सेवा का माध्यम बने और समाज में किसी मनुष्य को उसकी जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति के कारण छोटा न समझा जाए।
आज भारत विकास की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है। सड़कें बन रही हैं, एक्सप्रेसवे दौड़ रहे हैं, डिजिटल तकनीक गांवों तक पहुंच रही है, अंतरिक्ष में भारत अपनी क्षमता दिखा रहा है, दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत की चर्चा हो रही है। इन उपलब्धियों से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन गाँधी की दृष्टि से सवाल यह होगा कि इस विकास के साथ समाज के सबसे कमजोर आदमी की जिंदगी कितनी बदली? जिस किसान के खेत से देश का पेट भरता है, उसकी आर्थिक सुरक्षा कैसी है? जो मजदूर शहरों की इमारतें खड़ी करता है, उसका अपना घर कितना सुरक्षित है? जिस बच्चे के माता-पिता गरीब हैं, उसे शिक्षा के कितने समान अवसर मिलते हैं? जिस बुजुर्ग ने जीवन भर मेहनत की, उसके लिए स्वास्थ्य और सम्मान की व्यवस्था कितनी मजबूत है?
यहीं से गाँधी और वर्तमान भारत का पहला टकराव शुरू होता है।
गाँधी विकास के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे ऐसी विकास-व्यवस्था से सावधान करते थे जिसमें मनुष्य मशीन और बाजार के पीछे छूट जाए। आज उपभोक्तावाद हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है। जरूरत और चाहत के बीच की सीमा लगातार धुंधली होती जा रही है। विज्ञापन हमें बताते हैं कि खुश रहने के लिए हमें क्या खरीदना चाहिए। मोबाइल बदलना, कपड़े बदलना, गाड़ी बदलना और जीवनशैली बदलना आधुनिकता की पहचान मान लिया गया है। गाँधी का आग्रह इसके उलट था। वे आवश्यकता को सीमित करने, श्रम का सम्मान करने और संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग की बात करते थे। आज सवाल यह है कि क्या हम पृथ्वी के सीमित संसाधनों के साथ असीमित उपभोग की दौड़ जारी रख सकते हैं?
गाँधी के लिए गांव भारत की बुनियादी इकाई था। वे ग्राम स्वराज की कल्पना करते थे। आज गांवों में सड़क और बिजली जरूर पहुंची है, लेकिन बड़ी संख्या में ग्रामीण युवा रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर जाते हैं। गांव का किसान अपनी उपज के लिए बाजार पर निर्भर है, गांव का कारीगर मशीनों से बने सस्ते सामान से मुकाबला कर रहा है और स्थानीय रोजगार के अवसर सीमित हैं। एक तरफ हम आत्मनिर्भर भारत की बात करते हैं, दूसरी तरफ स्थानीय छोटे उत्पादकों और कारीगरों की जिंदगी बाजार की कठोर प्रतिस्पर्धा में दबती दिखाई देती है। गाँधी के चरखे का अर्थ केवल सूत कातना नहीं था। उसके पीछे स्थानीय उत्पादन, श्रम की प्रतिष्ठा और आर्थिक आत्मनिर्भरता का विचार था। आज आत्मनिर्भरता का अर्थ आधुनिक उद्योग और तकनीकी क्षमता से जुड़ गया है। दोनों में विरोध जरूरी नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में सबसे छोटे उत्पादक की जगह कहां है।
गाँधी का भारत श्रम को सम्मान देने वाला भारत था। आज भी मजदूर के बिना कोई निर्माण संभव नहीं, किसान के बिना अन्न संभव नहीं और कारीगर के बिना अनेक आवश्यक वस्तुएं संभव नहीं। फिर भी सामाजिक प्रतिष्ठा अक्सर श्रम से नहीं, आर्थिक हैसियत से तय होती है। जिस हाथ में करोड़ों की संपत्ति है, उसे समाज सम्मान देता है; जिस हाथ में दिनभर मेहनत की कठोरता है, उसे कई बार केवल मजदूरी मिलती है। गाँधी कहते थे कि कोई काम छोटा नहीं होता। वर्तमान समाज में काम की गरिमा और काम करने वाले की सामाजिक स्थिति के बीच का अंतर उनके विचारों से टकराता है।
गाँधी के सपनों के भारत में जाति आधारित भेदभाव के लिए जगह नहीं थी। वे अस्पृश्यता को सामाजिक कलंक मानते थे। आज संविधान ने समानता और सामाजिक न्याय का अधिकार दिया है और समाज में व्यापक परिवर्तन भी आया है, लेकिन जाति अभी समाप्त नहीं हुई है। विवाह से लेकर राजनीति, सामाजिक संबंधों और कई बार रोजगार तथा सामाजिक प्रतिष्ठा तक जाति की छाया दिखाई देती है। हम कानून में बराबरी लिख सकते हैं, लेकिन मनुष्य के मन में बराबरी पैदा करना कहीं कठिन काम है। गाँधी का सपना उस सामाजिक बराबरी का था जिसमें किसी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म से नहीं, उसके मनुष्य होने से तय हो।
धर्म के प्रश्न पर भी गाँधी और वर्तमान भारत के बीच एक तीखा सवाल खड़ा होता है। गाँधी धार्मिक व्यक्ति थे, लेकिन उनकी धार्मिकता दूसरे धर्म के प्रति घृणा की जमीन नहीं बनाती थी। वे सभी धर्मों के सम्मान और संवाद में विश्वास रखते थे। आज धर्म सार्वजनिक जीवन का अत्यंत प्रभावशाली हिस्सा है। धार्मिक आस्था करोड़ों लोगों के जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है और उसे होना भी चाहिए। लेकिन जब धर्म इंसान को जोड़ने के बजाय राजनीतिक या सामाजिक विभाजन का माध्यम बनता है, तब गाँधी की कल्पना का भारत चुनौती के सामने खड़ा दिखाई देता है। मंदिर और मस्जिद अपने-अपने स्थान पर रह सकते हैं, लेकिन नागरिकता और मनुष्यता का स्थान साझा होना चाहिए।
गाँधी की राजनीति में सत्य और नैतिकता केंद्रीय तत्व थे। वे राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने की कला नहीं मानते थे। आज राजनीति लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन चुनावी राजनीति में सत्ता, प्रचार, संसाधन और छवि का महत्व बहुत बढ़ गया है। राजनीतिक दल अपने-अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए प्रचार करते हैं और विरोधी पक्ष की आलोचना करते हैं। यह लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीति में तथ्य से अधिक भावनात्मक उत्तेजना महत्वपूर्ण हो जाए, जब विरोधी को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के बजाय शत्रु समझा जाने लगे और जब असहमति को सुनने की जगह उसे दबाने की प्रवृत्ति बढ़े।
गाँधी के लिए असहमति लोकतंत्र और सार्वजनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थी। वे स्वयं सत्ता और समाज दोनों से असहमति व्यक्त करते थे। आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को बोलने का मंच दिया है। यह लोकतंत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसी मंच पर अफवाह, आधी-अधूरी जानकारी, घृणा और झूठ भी तेजी से फैलते हैं। गाँधी के लिए सत्य केवल बोलने की चीज नहीं था, वह जीवन की साधना था। आज सूचना की बाढ़ में सत्य की पहचान करना पहले से अधिक कठिन हो गया है। हर व्यक्ति अपनी पसंद के तथ्य चुन सकता है और अपनी पसंद की दुनिया बना सकता है। ऐसे समय में गाँधी का सत्य हमारे सामने और बड़ा प्रश्न बनकर आता है।
गाँधी की अहिंसा का टकराव भी हमारे समय से है। हिंसा केवल बंदूक और लाठी से नहीं होती। भाषा भी हिंसक हो सकती है। शब्द भी किसी समुदाय, व्यक्ति या विचार के खिलाफ नफरत पैदा कर सकते हैं। सोशल मीडिया की भाषा में कई बार विरोध के बजाय अपमान और तर्क के बजाय गाली दिखाई देती है। राजनीतिक मतभेद व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल जाते हैं। समाज में यह प्रवृत्ति बढ़ेगी तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होगा। गाँधी की अहिंसा हमें केवल हाथ रोकने की नहीं, भाषा और विचार में भी संयम रखने की चुनौती देती है।
गाँधी प्रकृति के साथ संतुलन की बात करते थे। आज विकास की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता। गरीब देश और गरीब समाज विकास के बिना आगे नहीं बढ़ सकते। लेकिन विकास की कीमत यदि जंगलों की कटाई, नदियों के प्रदूषण, भूजल के संकट और हवा की खराब होती गुणवत्ता से चुकानी पड़े तो आने वाली पीढ़ियों के सामने कठिन प्रश्न खड़े होंगे। गाँधी का मूल सवाल आज भी प्रासंगिक है—हम कितना उपभोग करें और किस कीमत पर? प्रकृति केवल संसाधन नहीं है; वह जीवन का आधार है।
गाँधी महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी का अवसर देने के पक्षधर थे। आज भारतीय महिलाओं ने शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, खेल, राजनीति, उद्योग और अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन महिला की स्वतंत्रता का प्रश्न अभी भी पूरी तरह हल नहीं हुआ है। आर्थिक निर्भरता, घरेलू हिंसा, सुरक्षा, शिक्षा और समान अवसर जैसे प्रश्न मौजूद हैं। गाँधी के सपनों का भारत वह होगा जहां महिला को केवल सम्मान की भाषा में नहीं, निर्णय लेने की वास्तविक स्वतंत्रता में बराबरी मिले।
शिक्षा के क्षेत्र में भी गाँधी का विचार आज के भारत से सवाल करता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना और नौकरी पाना नहीं था। वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो व्यक्ति को जीवन, श्रम और समाज से जोड़ सके। आज शिक्षा तेजी से प्रतिस्पर्धा और रोजगार से जुड़ती जा रही है। यह जरूरी है, क्योंकि युवा को रोजगार चाहिए। लेकिन शिक्षा यदि संवेदना, तर्क और सामाजिक जिम्मेदारी पैदा नहीं करती तो वह अधूरी रह जाती है। एक व्यक्ति बहुत पढ़ा-लिखा होकर भी जातिवादी, असहिष्णु और असंवेदनशील हो सकता है। इसलिए डिग्री और शिक्षा में फर्क समझना जरूरी है।
गाँधी के सपनों का भारत शायद आज के भारत की हर उपलब्धि को नकारने वाला भारत नहीं होता। वे विज्ञान के विरोधी नहीं थे। वे आधुनिकता के विरोधी नहीं थे। उनका सवाल आधुनिकता की दिशा को लेकर था। वे पूछते कि तकनीक किसके लिए है? विकास किसके लिए है? अर्थव्यवस्था किसके लिए है? सत्ता किसके लिए है? और सबसे महत्वपूर्ण—इस पूरी व्यवस्था में आखिरी व्यक्ति कहां खड़ा है?
यही गाँधी की सबसे कठिन कसौटी है।
आज हम दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की आकांक्षा रखते हैं। यह आकांक्षा स्वाभाविक है। लेकिन किसी राष्ट्र की महानता केवल उसकी जीडीपी, मिसाइलों, अंतरिक्ष अभियानों या ऊंची इमारतों से तय नहीं होती। राष्ट्र की असली ताकत इस बात से भी तय होती है कि उसके सबसे कमजोर नागरिक का जीवन कितना सुरक्षित और सम्मानजनक है।
गाँधी के सपनों का भारत कोई बीता हुआ अतीत नहीं है। वह भविष्य की एक नैतिक चुनौती है। वह हमसे पूछता है कि क्या विकास के साथ संवेदना भी बढ़ रही है? क्या तकनीक के साथ इंसानियत भी बढ़ रही है? क्या आर्थिक ताकत के साथ सामाजिक न्याय भी मजबूत हो रहा है? क्या लोकतंत्र के साथ असहमति का सम्मान भी बचा हुआ है? क्या धार्मिक आस्था के साथ दूसरे धर्म के प्रति सम्मान भी कायम है? क्या राष्ट्रवाद के साथ नागरिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा भी सुरक्षित है?
इन सवालों का उत्तर आसान नहीं है। भारत ने बहुत कुछ हासिल किया है और बहुत कुछ हासिल करना बाकी है। इसलिए गाँधी को केवल महात्मा कहकर श्रद्धांजलि देने से ज्यादा जरूरी है कि उनके सवालों का सामना किया जाए।
दो अक्टूबर को हम गाँधी की तस्वीर पर माला चढ़ाते हैं। उनके पसंदीदा भजन गाते हैं। स्वच्छता की बात करते हैं। भाषण देते हैं। लेकिन गाँधी शायद हमसे यह पूछते कि तस्वीर पर माला चढ़ाने के बाद हम अपने व्यवहार में क्या बदलेंगे?
यदि हम गरीब को देखकर नजर फेर लेते हैं, कमजोर को दबाते हैं, असहमति से घबराते हैं, झूठ को अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं, जाति और धर्म के नाम पर मनुष्य को बांटते हैं और प्रकृति को केवल मुनाफे की वस्तु समझते हैं, तो गाँधी की तस्वीर हमारे घर में भले मौजूद हो, गाँधी हमारे जीवन में नहीं हैं।
गाँधी के सपनों का भारत कोई ऐसा भारत नहीं था जिसमें गरीबी को महिमामंडित किया जाए या आधुनिक विकास को रोक दिया जाए। उनका सपना ऐसा भारत था जिसमें विकास का अंतिम लाभ मनुष्य तक पहुंचे और मनुष्य विकास का साधन मात्र बनकर न रह जाए।
शायद आज गाँधी को समझने का सबसे सही तरीका यही है कि हम उनसे सहमत होने की मजबूरी न रखें, लेकिन उनके सवालों से बचें भी नहीं।
क्योंकि गाँधी का सबसे बड़ा सपना कोई चरखा नहीं था। वह था—ऐसा भारत जिसमें सबसे कमजोर आदमी भी सिर उठाकर कह सके कि यह देश मेरा है।
और शायद आज के भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल भी यही है—क्या हमारी विकास यात्रा उस आखिरी आदमी तक पहुंच रही है?
जब तक इस सवाल का जवाब अधूरा है, तब तक गाँधी का सपना भी अधूरा है।
शम्भू शरण सत्यार्थी