राजनीति

बदला गणित : अहम बिलों की राह साफ!

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

   पिछले कुछ वर्षों में केन्द्र सरकार ने कई दूरगामी नीतियाँ और योजनाएँ आगे बढ़ायीं पर जिन सुधारों के लिए ‘संवैधानिक सहमति’ या राज्यसभा में निर्णायक बहुमत चाहिए थे—वे लटकते रहे। अब हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने संसद के दोनों सदनों में ऐसा समीकरण खड़ा कर दिया है कि कई वर्षों से अटके‑ठहरे विधेयक और कुछ मौलिक संशोधन पारित होने के करीब दिखते हैं। यह बदलाव केवल संख्या का फेर नहीं; यह रणनीति, स्थानीय समीकरण और संसदीय प्रक्रियाओं के संयोजन का परिणाम है।

सबसे बड़ा नया कारक डीएमके जैसे क्षेत्रीय दलों के सम्भावित सहयोग का असर है। यदि डीएमके‑सदृश सहयोग लोकसभा में जुड़ता है तो मोदी सरकार का तर्कसंगत लोकसभा आँकड़ा लगभग 360 तक पहुँचने का परिदृश्य बनता है। इससे केन्द्र को विधायी स्थिरता और नीतिगत आगे बढ़ने की गति—दोनों में मजबूती मिलती है। किन्तु संवेदनशील संशोधनों के लिए लोकसभा से आगे राज्यसभा में भी सहमति अनिवार्य रहती है—और यही वह चुनौती रही जो पहले कई प्रमुख प्रस्तावों को रोकती आयी।

   दरअसल, भारतीय लोकतंत्र का असली माप संसद में बैठी संख्या‑गणित ही नहीं बल्कि संवैधानिक प्रक्रियाओं के भीतर जनादेश का रूप है। पिछले दशक में केन्द्र‑स्तरीय निर्णय लेने की गति और तीव्रता ने नीति‑क्षेत्रों में कई मुद्दों को आगे बढ़ाया; पर जिन सुधारों की राजनीति‑विहित प्रकृति अधिक संवेदनशील रही — जिनके लिए संविधान संशोधन या, राज्यसभा में निर्णायक बहुमत की जरूरत थी — वे लम्बित ही रहे। अब हालिया घटनाक्रम ने ऐसा राजनीतिक परिदृश्य खड़ा कर दिया है कि कई अटके हुए कानूनों के पारित होने की सम्भावना असाधारण रूप से बढ़ गयी है।

   हाल ही में राज्यसभा की 27 सीटों के चुनावों ने एनडीए के पत्ते मजबूत किये। झारखण्ड में मिली जीत और पश्चिम बंगाल में टीएमसी के चार सांसदों के इस्तीफे से एनडीए का आँकड़ा 153 से बढ़कर 157 तक पहुँचने का रास्ता खुला है; वाईएसआरसीपी के सहयोग से यह 161 तक जा सकता है—यानी संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो‑तिहाई (164) से मात्र तीन सांसदों की दूरी पर। छोटा‑सा अन्तर दिखाता है कि अब रणनीतिक दलबदल, छोटे दलों के साथ समझौते और संसदीय पञ्चविधियों का अवसर या सुव्यवस्थित मौके कैसे निर्णायक बन सकती है।

   उच्च सदन में वैधानिक दृष्टि से 164 की शर्त ‘संघीयता’ की रक्षा के लिए है। राज्यों की सहमति और व्यापक बहस यह सुनिश्चित करती है कि संवैधानिक ढाँचे में बिना व्यापक समन्वय के परिवर्तन न हों। इसलिए केवल गिनती जुटा लेना ही पर्याप्त नहीं रहेगा; किसी भी संवैधानिक संशोधन को सार्वजनिक औचित्य, संघीय सन्तुलन और न्यायालयीन समीक्षा को ध्यान में रखकर पेश करना होगा। यदि संशोधन केवल राजनीतिक सौदों, या अस्थायी अनुबन्धों पर टिका हुआ माना गया तो उसकी दीर्घकालिक वैधता पर प्रश्न उठ सकते हैं।

   विरोध की स्थिति वर्तमान में फुर्तीली नहीं दिखती। इण्डिया नाम से चर्चित ‘इण्डी अलायंस’ कई मोर्चों पर आन्तरिक असंगति और नेतृत्व‑समन्वय की चुनौतियों से जूझ रहा है। पिछले दो सालों के दलबदल और इस्तीफे यही संकेत देते हैं कि स्थानीय हित, व्यक्तिगत रणनीतियाँ और संसाधन‑आश्वासन कई बार किसी बड़े राजनीतिक तरह‑तरह के समन्वय से ज़्यादा प्रभावी होते हैं। विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि उसने एक ठोस, सम्मिलित और जनता‑केन्द्रित वैकल्पिक योजना प्रस्तुत नहीं की—और जब तक वह यह नहीं कर पाता, केन्द्र छोटे दलों और स्थानीय समीकरणों के माध्यम से समीकरण बदलकर आगे बढ़ सकता है।

   एनडीए द्वारा अपनायी जा सकने वाली व्यावहारिक रणनीतियाँ स्पष्ट हैं : मसलन, छोटे दलों तथा निर्दलीय सांसदों को स्थायी या अस्थायी सहयोग के लिए प्रलोभन देना; संसदीय प्रक्रियाओं में उपस्थितियों का प्रबन्धन, वॉकआउट जैसी तकनीक का उपयोग; तथा राज्यों को केन्द्र‑वित्तीय या परियोजना‑सम्बन्धी लाभ देकर सहयोग सुनिश्चित करना। इन तरीकों से गणित बदला जा सकता है और कई महत्वपूर्ण बिलों को पारित कराया जा सकता है पर यह नीति‑विकल्प केवल अल्पकालिक सफलता देता है; इससे संस्थागत भरोसे और संघीय सन्तुलन पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।

   यदि केन्द्र को वह बहुमत सुलभ होता है तो किन विधानों पर शीघ्रता से काम हो सकता है—यह कुछ हद तक स्पष्ट भी है : परिसीमन (delimitation), प्रशासनिक सुधार, सुरक्षा‑विधि, कुछ आर्थिक‑विनियमन कदम और नीतिगत वैचारिकता जिनमें अस्पष्टता से राज्यसभा में बाधा रही है। संवैधानिक संशोधन जिनका प्रभाव संघीय ढाँचे पर गहरा होगा, वे अधिक सतर्कता और व्यापक संवाद माँगेंगे। इन मामलों में सार्वजनिक और न्यायिक बहस अपरिहार्य होगी।

   यहाँ नौबत केवल गणित की जीत की नहीं; साथ में बड़ी जिम्मेदारी भी आयी है। संसद के माध्यम से जो भी बड़े बदलाव पास होंगे—उनकी वैधता, पारदर्शिता और जनहित परोक्ष परीक्षण होंगे। यदि परिवर्तन – विचारशील संवाद, राज्यों के साथ समन्वय और ठोस कानूनी औचित्य से जुड़े होंगे, तो वे टिकाऊ और लोक‑हित में साबित होंगे अन्यथा, आज की तेज़ी कल के संवैधानिक विवादों और सामरिक प्रतिरोधों का बीज बन सकती है।

   निष्कर्षतः, संसद का नया समीकरण — लोकसभा में बढ़ती स्थिरता और राज्यसभा के समीकरणों का केन्द्र‑अनुकूल झुकाव — बहुप्रतीक्षित कानूनों और संशोधनों को पास कराने का अवसर देता है पर यह अवसर तभी सार्थक होगा जब उसे सिर्फ संख्या का खेल मानकर नहीं, बल्कि संविधानिक मर्यादा, पारदर्शिता और व्यापक जन‑संहति के साथ भुनाया जाए। राजनीतिक चातुर्य से मिली विजय तभी वास्तविक जीत मानी जाएगी जब वह संस्थागत मजबूती और लोकतांत्रिक वैधता के साथ जुड़ी रहे।

     डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर