कविता शख्सियत

इंकलाब लिख दिया जिसने अपने खून से…”

इंकलाब लिख दिया जिसने अपने खून से…”

दहक उठी थी ज्वाला मन में

जब देश गुलामी में जकड़ा था

नन्हीं आंखों ने जलियांवाला का

वो खूनी मंजर पकड़ा था

मिट्टी को माथे से लगाकर

उसने कसम ये खाई थी

गोरी सत्ता को उखाड़ने की

उसने अलख जगाई थी

वह डरा नहीं फांसी के फंदों

 से, न बेड़ियों की झंकार से

वो गूंज उठा था इंकलाब

 बन, असेंबली की दीवार से

पिस्तौल नहीं, विचारों से उसने

क्रांति की लौ जलाई थी

सोए हुए उस भारतवर्ष में

नई चेतना फैलाई थी

न झुका कभी जुल्मों के आगे

न ही थमी कभी उसकी चाल

देशभक्ति के रंग में रंगा था

वो भारत का कर्मठ लाल

न ही उम्र की फिक्र थी उसको

न मौत का कोई ख़ौफ़ था

वतन की खातिर मर मिटने का

बस एक यही शौक था

भगत ने सुखदेव राजगुरु संग

जब फांसी का फंदा चूमा था

इंकलाब के नारों से तब

सारा भारत गूंजा था

वो छोटा सा निर्भीक बालक

भारत का अभिमान बना

जिसकी रगों में दौड़ता लहू

आज़ादी का गान बना

छोटी सी उम्र में ही भगत की

हस्ती ने रचा इतिहास नया

उसकी मौत शहादत थी जिसने

युवा रक्त को जगा दिया

उठो, हिंद के वीर जवानों !

उसके बलिदान को पहचानो

देशप्रेम ही धर्म है अपना

बस इस बात को तुम जानो !!!

 स्मृति श्रीवास्तव